टैक्स पर भी आर्थिक मंदी का बुरा असर, डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन में आई भारी गिरावट
नई दिल्लीः केंद्र सरकार भले ही मंदी को स्वीकार नहीं कर रही हो लेकिन मंदी का असर सरकार के सामने अलग-अलग रूप में सामने आ रहा है। ऑटो सेक्टर में मंदी का असर दिखने के बाद अह सरकार के राजस्व पर भी मंदी का असर दिखने लगा है। साल 2019-2020 के पहले साढ़े पांच महीने में नेट डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन यानी कि शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह में भारी गिरावट देखने को मिल रही है। आंकड़ों के अनुसार अप्रैल से सितंबर माह के बीच नेट डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन केवल 4.4 लाख करोड़ रहा है। यह बढ़ोत्तरी केवल पांच फीसदी रही है।

शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह में कमी आने से सरकार की मुश्किलें बढ़ गई हैं। सरकार ने बजट अनुमान में 13.35 लाख करोड़ रुपये अर्जित करने का अनुमानित लक्ष्य रखा है। अनुमानित रकम को पाने के लिए बाकी बचे वक्त में सरकार को वर्तमान राशि से दोगुना राशि राजस्व के तौर पर अर्जित करना होगा। हालांकि मंदी के दौर में ये बहुत ही मुश्किल है। खबरों के अनुसार आर्थिक मंदी की वजह से एडवांस टैक्स कलेक्शन में बढ़ोत्तरी एक अंक यानी की 6 प्रतिशत में ही सिमट रही है। जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह बढ़ोत्तरी 18 प्रतिशत थी। इससे यह साफ पता चल रहा है कि मंदी का बुरा असर डायरेक्ट टैक्स पर भी पड़ रहा है।
आर्थिक मंदी और साथ ही डायरेक्ट टैक्स संग्रह में कमी के दौरान सरकार का राजकोषीय लेखा-जोखा भी गड़बड़ा गया है। ऐसे में सरकार के लिए जीडीपी का 3.3 फीसदी राजकोषीय घाटे का लक्ष्य हासिल करना चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है। 15 सितंबर प्रत्यक्ष कर संग्रह के लिए एक महत्वपूर्ण समय सीमा है क्योंकि यह अग्रिम कर भुगतान के लिए कुल चार किस्तों में से दूसरे को चिह्नित करता है और जब तक, कंपनियों को अपने कर देयता का 45% भुगतान करना आवश्यक होता है। कंपनियां क्रमशः 15 दिसंबर और 15 मार्च को होने वाली अगली दो किश्तों में अपनी देयता का 30% और 25% का भुगतान करती हैं।
बता दें कि आर्थिक मंदी के कारण देश की बड़ी ऑटो कंपनियां प्रोडक्शन बंद करने को मजबूर हैं। उद्योग से जुड़े लोग मंदी के लिए जीएसटी को एक खास कारण मान रहे हैं। और जीएसटी दर में कटौती की मांग कर रहे हैं। कर संग्रह उम्मीद से कम रहने की वजह मांग में गिरावट और कुल वृद्धि में कमी है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर घटकर पांच प्रतिशत पर आ गई है जो इसका छह साल का निचला स्तर है।
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