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मनरेगा का मज़दूर बना स्वर्ण पदक विजेता तीरंदाज़

अशोक सोरेन
Ravi Prakash/BBC
अशोक सोरेन

अशोक सोरेन के कच्चे घर की दीवारों पर कई मेडल टंगे हैं. फ्रेम की हुई अखबारों की कतरनें भी. वे अपने खेत में काम करने गए थे. वहां से लौटने के बाद हमारी बातचीत शुरू हुई.

इस दौरान उनके चाचा सोनाराम सोरेन भी हमारे साथ बैठे रहे.

अशोक सोरेन जमशेदपुर-घाटशिला रोड पर भिलाई पहाड़ी के पास देवघर गांव में रहते हैं.

ये वही अशोक सोरेन हैं, जिन्होंने साल 2008 में दक्षिण एशियाई देशों के सैफ़ आर्चरी गेम्स में भारत के लिए दो स्वर्ण पदक जीते थे.

तब अखबारों ने प्रमुखता से उनकी तस्वीरें छापी थीं. उनमें अशोक सोरेन के गले में गोल्ड मेडल है. हाथों की अंगुलियों से विक्टरी साइन बना रखा है.

लेकिन वक्त गुजरने के साथ अशोक सोरेन का तीरों से साथ छूटता गया और पेट की भूख ने उन्हें मनरेगा में फावड़ा तक पकड़ा दिया.

पिछले तीन साल से वे मनरेगा के तहत मज़दूरी कर रहे हैं. इन दिनों वे मनरेगा 'मेट' की भूमिका में हैं.

अशोक सोरेन
Ravi Prakash/BBC
अशोक सोरेन

ऐसा क्यों?

सैफ़ तीरंदाज़ी खेलों के गोल्ड मेडलिस्ट अशोक सोरेन ने बीबीसी से कहा, "घर चलाने के लिए मज़दूरी करनी पड़ती है. इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा है. मेरे पिताजी टुकलु सोरेन बचपन में ही गुजर गए. इसके बाद हम चार भाई-बहनों को पालने की ज़िम्मेदारी मेरी मां कंसावती देवी पर आ गयी. साल 2008 में जब मैंने सैफ़ तीरदांज़ी खेलों में स्वर्ण पदक जीता, उसी साल मां भी गुजर गयीं. इसके बाद घर चलाने वाला कोई नहीं था. तब मैंने तीरंदाज़ी छोड़कर मजदूरी शुरू कर दी."

अशोक सोरेन ने बताया कि मज़दूरी करते हुए उन्होंने साल 2010 में जमशेदपुर के एक कॉलेज से इंटर की परीक्षा पास कर ली. इसके बावजूद उन्हें नौकरी नहीं मिली और साल 2014 से वे मनरेगा मे मजदूरी करने लगे. इससे साल में 100 दिन के काम की गारंटी मिल गयी.

बाकी के दिनों में वे दूसरों के खेतों में मज़दूरी करते हैं. इससे मिले पैसों से उनका घर चलता है.

तीरंदाज़ी की करियर

स्थानीय पत्रकार सरताज आलम ने बीबीसी को बताया कि अशोक सोरेन ने साल 2006 में राज्य स्तरीय जूनियर तीरंदाज़ी चैंपियनशिप में पहली बार रजत रदक जीता था. साल 2007 में सीनियर लेवल की राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में उन्हें एक स्वर्ण और दो रजत पदक मिले.

साल 2008 में जमशेदपुर में सैफ गेम्स हुए तो उन्होंने भारत के लिए दो स्वर्ण पदक हासिल किया. इसके बाद उन्हें तीरंदाज़ी छोड़नी पड़ी.

कोई नौकरी दे देता

मेडल
Ravi Prakash/BBC
मेडल

अशोक सोरेन के चाचा सोनाराम सोरेन ने बीबीसी से कहा, "काश सरकार अशोक को नौकरी दे देती. इससे उन्हें घर चलाने की चिंता नहीं रहती और वे फिर से तीरंदाज़ी शुरू कर देते. क्योंकि उनकी उम्र अभी 28 साल है और वे लंबे समय तक तीरंदाज़ी कर सकते हैं."

टाटा स्पोर्ट्स कॉप्लेक्स से ट्रेनिंग

अशोक सोरेन ने अपने बड़े भाई सनातन को देखकर बचपन से ही तीरंदाज़ी शुरू कर दी थी. बाद में उन्होंने जेआरडी टाटा स्पोर्ट्स कॉप्लेक्स से तीरंदाज़ी का औपचारिक प्रशिक्षण लिया. यहां उन्हें मुफ्त में ट्रेनिंग मिल गयी. इसके बाद उन्होंने कई प्रतियोगिताओं मे हिस्सा लिया और कई पदक जीते.

अशोक सोरेन कहते हैं कि अगर मौका मिला तो वे फिर से तीरंदाज़ी करेंगे.

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