हेमंत सोरेन के दोबारा सीएम बनने पर बीजेपी झारखंड में क्यों देख रही है मौका?

Jharkhand Vidhan Sabha Chunav: हेमंत सोरेन ने जेल से जमानत पर छूटने के कुछ ही दिनों बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी पर वापसी कर ली है। झारखंड की राजनीति के जानकारों के मुताबिक राज्य में यह सत्ता परिवर्तन जितना आसान माना जा रहा था, उतना आसान हुआ नहीं।

अलबत्ता चंपई सोरेन ने झारखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकारी अध्यक्ष और पार्टी संस्थापक शिबू सोरेन के बेटे के लिए सिंहासन खाली कर दिया, लेकिन पढ़ने वालों को उनके दिल और मन की भावनाओं को पढ़ने और समझने में दिक्कत नहीं हुई।

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चंपई के मन में पल रहा है असंतोष!
चंपई सोरेन ने पार्टी और नेतृत्व से किसी तरह की बगावत का संकेत तो नहीं दिया है, लेकिन उनकी जिस तरह से विदाई की गई है,वह असहजता वे छिपा भी नहीं पा रहे हैं। मसलन, चंपई का कहना है कि उन्होंने राज्य सरकार में विभिन्न पदों पर नियुक्तियों की कोशिशें शुरू कीं, लेकिन अगर नियुक्ति पत्र देने का भी समय मिल जाता तो उन्हें एक तरह का संतोष मिलता।

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आदिवासी कार्ड खेलना चाहती है बीजेपी!
चंपई झारखंड आंदोलन से पैदा हुए एक मंजे हुए आदिवासी चेहरे हैं। जबसे शिबू सोरेन के परिवार के लिए उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाया गया है, विपक्षी बीजेपी लगातार इसे राज्य के आदिवासी समुदाय का अपमान बता रही है।

हेमंत की स्वार्थ की राजनीति सामने आई- मरांडी
जैसे झारखंड बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने अंग्रेजी अखबार ईटी से कहा, 'जिस वक्त हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली, यह स्पष्ट हो गया कि उनकी पार्टी में उनके परिवार के सदस्यों के अलावा कोई सीएम नहीं बन सकता। राज्य में चुनाव के सिर्फ तीन ही महीने बचे हुए हैं, सत्ता के लिए उनका (हेमंत) प्रेम उनकी स्वार्थ की राजनीति को दिखाता है।'

पार्टी सूत्रों के मुताबिक बीजेपी सात बार के एमएलए और 'कोल्हान टाइगर' (चंपई पार्टी में इस नाम से लोकप्रिय हैं) को मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने को बड़ा मुद्दा बनाना चाहती है, ताकि उस आदिवासी वोट पर पकड़ मजबूत हो, जिसकी दुहाई जेएमएम और इंडिया ब्लॉक के नेता देते रहे हैं।

'इंडिया ब्लॉक की चिंता- सिर्फ सत्ता और परिवारवाद'
झारखंड में भाजपा के चुनाव प्रभारी और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान का आरोप है, 'जेएमएम और पूरे इंडिया ब्लॉक के नेताओं की चिंता सिर्फ सत्ता और परिवारवाद है। झारखंड में यह साबित हो गया है कि सिर्फ हेमंत सोरेन के परिवार का ही कोई मुख्यमंत्री बनेगा और अन्य लोग प्रदेश का नेतृत्व करने की आकांक्षा नहीं पाल सकते। आने वाले विधानसभा चुनावों में झारखंड की जनता इन पार्टियों को सबक सिखाने जा रही है।'

भाजपा को कई राज्यों में आदिवासी बेल्ट में मिला है फायदा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी ने सभी प्रदेशों के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में अपना जनाधार बढ़ाने की तमाम कोशिशें की हैं। आदिवासियों पर केंद्रित अनेकों योजनाएं लागू की गई हैं। पहली आदिवासी महिला द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति के पद पर बिठाया गया है। छत्तीसगढ़ से लेकर मध्य प्रदेश,ओडिशा, गुजरात और तेलंगाना तक में भाजपा को इसका जबर्दस्त फायदा मिला है।

लेकिन, झारखंड में आदिवासियों के लिए आरक्षित सभी पांच सीटें इस लोकसभा चुनाव में भाजपा हार गई है। जबकि, 14 सीटों में से बीजेपी को 8 और उसकी सहयोग एजेएसयू को 1 सीट मिली है। ऐसे में विरोधी दल की ओर से एक आदिवासी मुख्यमंत्री को चुनाव से ठीक पहले इस तरह से कुर्सी से हटाने में भाजपा को अपने लिए बहुत ज्यादा उम्मीद दिख रही है।

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