Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

वीजी सिद्धार्थ ने कैसा खड़ा किया था सीसीडी का साम्राज्य

वीजी सिद्धार्थ
Getty Images
वीजी सिद्धार्थ

कैफ़े कॉफ़ी डे के संस्थापक वीजी सिद्धार्थ हेगड़े की रहस्यमय हालात में मौत के बाद उनकी पत्नी मालविका हेगड़े सीसीडी की कमान संभाल सकती हैं.

मालविका पहले से ही कंपनी के बोर्ड में हैं. हालांकि ये भी कहा जा रहा है कि मालविका को पति की मौत के सदमे से बाहर निकलने में वक़्त लगेगा इसलिए सब कुछ इतनी आसानी से संभव नहीं है.

मालविका ने बेंगलुरु यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और देश के पूर्व विदेश मंत्री एसएम कृष्णा की बेटी हैं.

सिद्धार्थ हेगड़े सीसीडी के चेयरपर्सन और मैनेजिंग डायरेक्टर थे. सिद्धार्थ हेगड़े की मौत की पुष्टि के बाद सीसीडी ने बुधवार को अंतरिम रूप से पूर्व आईएएस अधिकारी एसवी रंगनाथ को कंपनी की कमान सौंपी है.

इसके साथ ही कंपनी बोर्ड ने नितिन बागमाने को अंतरिम चीफ़ ऑपरेटिंग ऑफिसर नियुक्त किया है.

सिद्धार्थ हेगड़े ने सीसीडी को अपने संघर्ष और प्रतिभा के दम पर खड़ा किया था. भारतीय समाज में हर कसौटी पर सिद्धार्थ एक सफल शख़्स थे. लेकिन उनकी मौत ने सफलता और सुकून के संबंधों को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है.

वीजी सिद्धार्थ
Getty Images
वीजी सिद्धार्थ

सिद्धार्थ ने तीन साल पहले दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि बिज़नेसमैन रिटायर नहीं होते बल्कि वो मरते हैं. लेकिन सिद्धार्थ ने तीन साल पहले जब ये बात कही थी तो उन्हें अहसास नहीं रहा होगा कि उनकी मौत निराशा के अंधेरे में होगी. या फिर वो ऐसे व्यवसायी हैं जो ख़ुद को ही ख़त्म कर लेंगे.

सिद्धार्थ ने मंगलुरु के सेंट एलेयॉसिस से अर्थशास्त्र की पढ़ाई की थी. वो जब युवा थे तो कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित थे. ग्रैजुएशन के दिनों में ही कार्ल मार्क्स की किताब दास कैपिटल पढ़ ली थी. इसे पढ़ने के बाद वो कार्ल मार्क्स से काफ़ी प्रभावित हुए थे.

हालांकि आगे चलकर रूस की कम्युनिस्ट पार्टियों से उन्हें निराशा हुई और इस विचारधारा से मोहभंग हुआ. युवा सिद्धार्थ में एक किस्म की बेचैनी थी और वो कम्युनिस्ट विचारधारा से आगे निकल 1996 में कॉफ़ी के ज़रिए पूंजीवादी व्यवस्था में घुसे.

दास कैपिटल पढ़ने वाला व्यक्ति पूंजीवादी व्यवस्था में आकर कॉफ़ी की प्याली में तूफ़ान लाना चाहता था. लेकिन उनके भीतर का तूफ़ान इतना अस्थिर था कि मंगलवार को नेत्रावती नदी में हमेशा के लिए शांत हो गया.

सिद्धार्थ हेगड़े की कहानी मध्यवर्ग के एक आम व्यक्ति की कहानी है. वो अपनी टीचर की कही बातों से परेशान होता है तो कभी प्रेरित होता है. वो पिता से वैचारिक मतभेद रखता है तो पौराणिक कहानियों से प्रेरणा लेता है. सिद्धार्थ ने 2016 में आउटलुक मैगज़ीन को दिेए इंटरव्यू में स्कूल के दिनों के ऐसे ही एक वाक़ये का ज़िक्र किया था.

वीजी सिद्धार्थ
Getty Images
वीजी सिद्धार्थ

सिद्धार्थ ने इस इंटरव्यू में बताया था, ''मैं अज़रा मिस को कभी भूल नहीं सकता. एक दिन वो मुझे पकड़कर रोने लगीं. मैं समझ नहीं पा रहा था कि कैसे रिएक्ट करूं. मुझे याद है कि उनसे लगातार पूछता रहा कि क्या हुआ है. वो बहुत ही दुखी थीं. रघु और अशोक भी वहां आ गए और उन्होंने भी पूछा कि क्या हुआ है. उन पर कोई असर नहीं हुआ. कुछ देर में उन्होंने हमलोग की तरफ़ देखा और कहा कि तुमलोग ठीक से पढ़ने के लिए और कोशिश क्यों नहीं करते हो? हमलोग पूरी तरह से अवाक रह गए.''

''हम समझ नहीं पा रहे थे कि हँसे या रोएं. लेकिन हम सबने उन्हें आश्वस्त किया कि अब ठीक से पढ़ाई करेंगे. उस दिन हम सबमें कई तरह के भाव मन में मचल रहे थे. अज़रा मिस काफ़ी प्रगतिशील थीं. ये तब की बात है जब मुस्लिम महिलाओं के लिए पढ़ाई आसान नहीं थी. अज़रा मिस ने न केवल पढ़ाई की बल्कि उन्होंने चिकमंगलूर में एक स्कूल भी शुरू किया. वो हम पर चिल्ला भी सकती थीं लेकिन नहीं पता कि उसका असर हमलोग के ऊपर कितना होता. उनके रोने का असर हमलोग पर बहुत हुआ. यह हम सभी के लिए सबक़ था कि चीख़ने से अच्छा है दिल से रो ले लेना.''

सिद्धार्थ के पिता नहीं चाहते थे कि वो कोई नया व्यवसाय शुरू करें. उनका मन था कि कोई सम्मानजनक नौकरी कर लें. हालांकि बिज़नेस शुरू करने का फ़ैसला कर लिया तो पिता ने ही 7.5 लाख रुपए की मदद दी.

सिद्धार्थ को पता था कि उनके पिता ने 7.5 लाख रुपए ख़ून पसीने की कमाई से दिए थे इसलिए वो चाहते थे कि किसी भी सूरत में डूबे नहीं. इससे बचने के लिए सिद्धार्थ ने पाँच लाख रुपए का एक प्लॉट ख़रीद लिया. सिद्धार्थ का मानना था कि प्लॉट की क़ीमत कम नहीं होती और 7.5 लाख की रक़म उस प्लॉट को बेचकर किसी भी वक़्त पिता को लौटा सकते हैं.

सीसीडी
Getty Images
सीसीडी

सिद्धार्थ ने एक इंटरव्यू में बताया था कि वो अपने करियर में सबसे ज़्यादा आभार महेंद्रभाई के हैं. सिद्धार्थ ने कहा है, ''साल 1983 था. मैंने बेलगाम से बस ली और बॉम्बे के लिए निकल गया. होटल में एक कमरा लिया जिसमें टॉइलेट साझा था. अगले दिन महेंद्रभाई कम्पानी से मिलने के लिए निकला. उनके बारे में मैंने एक इन्वेस्टेमेंट मैगज़ीन में पढ़ा था. मैं उनसे ट्रेनिंग लेना चाहता था. लेकिन दिक़्क़त ये थी कि उनसे कभी बात नहीं हुई थी.''

सिद्धार्थ कहते हैं, ''नरीमन पॉइंट पर तुलसीआनी चेंबर उनके दफ़्तर पहुँचा तो मेरे पास उनसे मिलने के लिए कोई अप्वाइंटमेंट नहीं था. जब उनके दफ़्तर में प्रवेश किया दो दो एलिवेटर देख अंदर से रोमांचित हुआ. तब तक मैंने एलिवेटर इस्तेमाल नहीं किया था. छठे फ्लोर पर महेंद्रभाई के सेक्रेटरी से मिलने पहुंचा. यह मेरे लिए अच्छा था कि वो तमिल थे. महेंद्रभाई ने मिलने का मौक़ा दिया. मैंने महेंद्रभाई के साथ स्टॉक मार्केट को समझा. उन्होंने मेरे ऊपर काफ़ी भरोसा किया और उनसे बहुत कुछ सीखा.''

सिद्धार्थ कहते हैं, ''महेंद्र भाई कर्म में भरोसा करते थे. उन्होंने मुझे एक कहानी सुनाई थी जिसे कभी नहीं भूलता. वो कहानी थी- राजस्थान में एक जैन गुरु थे. वो अपने शिष्यों के साथ जा रहे थे. जैन साधु नंगे पाँव हज़ारों किलोमीटर चलने के लिए जाने जाते हैं. वो कठिन मौसम में भी ख़ुद को वैसे ही रखते हैं. जैन साधु के बगल से ही एक राजा का दल गुज़रा. राजा को उसके आदमियों ने पालकी में उठा रखा था. एक शिष्य ने अपने गुरु से राजा के बारे में पूछा कि ये आदमी इतना प्रतिष्ठित कैसे बन गया? शिष्य ने कहा कि आप इतनी मेहनत करते हैं और कठिन ज़िंदगी जी रहे हैं और एक वो राजा है जो कितना आराम की ज़िंदगी जी रहा है. जैन साधु ने कहा कि राजा आराम की ज़िंदगी इसलिए जी रहा है क्योंकि उसने पूर्व जन्म में सुकर्म किया था. पूर्व जन्म में राजा जैन गुरु था और उसने भी इतनी ही कड़ी मेहनत की थी.''

वीजी सिद्धार्थ
Getty Images
वीजी सिद्धार्थ

सिद्धार्थ कहते हैं कि उनके लिए इस कहानी का सबक़ ये था कि आपकी मेहनत का फल मिलने में कई बार लंबा वक़्त लगता है इसलिए मेहनत से घबराना नहीं चाहिए. सिद्धार्थ ने उस इंटरव्यू में कहा है, ''बिज़नेस में बिल्कुल यह कहानी सच है. यहां तक कि वास्तविक जीवन में भी.''

सिद्धार्थ ने बाक़ी के बचे पैसे को किराए पर एक दफ़्तर लेने में लगाया. दफ़्तर में कंप्यूटर और फ़ोन लगे. इस दफ़्तर का नाम पड़ा सिवन सिक्यॉरिटीज. यह इंटर-मार्केटिंग ट्रेडिंग के लिए था. सिद्धार्थ कहते हैं कि तब ट्रेड बहुत आसान था.

सिद्धार्थ ने अपने इंटरव्यू में कहा है, ''तब इंटर मार्केटिंग से पैसे बनाना आसान था. इसके लिए बॉम्बे के दोस्तों का शुक्रगुज़ार हूं. 10 रुपए में बॉम्बे से ख़रीदो और 11 रुपए में बेंगलुरु में बेचो और 11.50 में जयपुर में. उन दिनों नफ़ा और नुक़सान फटाफट होते थे. हालांकि कभी मनहूस दिन का सामना नहीं करना पड़ा. मैंने स्टॉक मार्केट से ख़ूब पैसे कमाए. ऐसा इसलिए नहीं था कि मैं कुछ बड़ा कर रहा था बल्कि समान्य व्यापार कर रहा था.''

1985 में सिद्धार्थ ने कॉफ़ी की फसल को ख़रीदना शुरू कर दिया था. सिद्धार्थ का यह कारोबार तीन हज़ार एकड़ में फैल चुका था. सिद्धार्थ के सीसीडी के साम्राज्य की बुनियाद भी यहीं रखी गई और उसी साम्राज्य को छोड़ 29 जुलाई को चुपके से वो दुनिया को अलविदा कह गए. सिद्धार्थ अपने कर्म का फल शायद इस जन्म में नहीं बल्कि अगले जन्म में खाना चाहते थे.

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+