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सिख विरोधी दंगे, शाहबानो केस से बोफोर्स तक, राजीव गांधी के वो फैसले जो आज भी बनते हैं कांग्रेस की चुनौती

Death anniversary of Former PM Rajiv Gandhi: देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का आज (21 मई)पुण्यतिथि है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने दिल्ली स्थित वीर भूमि पहुंच कर श्रद्धांजलि अर्पित की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई अन्य नेताओं ने भी राजीव गांधी को उनकी सेवाओं और योगदान के लिए याद किया और श्रद्धांजलि अर्पित की। इस अवसर पर कांग्रेस पार्टी ने देशभर में विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया है, जिनके माध्यम से राजीव गांधी के विचारों, विज़न और राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान को याद किया जा रहा है। राजीव गांधी को आईटी और टेलीकॉम क्रांति की नींव रखने, पंचायती राज को सशक्त बनाने, और शिक्षा में नवाचार जैसे कार्यों के लिए याद किया जाता है। हालांकि, उनके कार्यकाल के दौरान कुछ ऐसी घटनाएं और विवाद भी हुए, जिसने आज भी कांग्रेस के लिए राजनीतिक चुनौती बने हुए हैं। इस रिपोर्ट में, हम राजीव गांधी के ऐसे ही प्रमुख विवादों पर नज़र डालेंगे, जिनकी गूंज आज भी भारतीय राजनीति में सुनाई देती है।

Rajiv Gandhi

राजीव गांधी के कार्यकाल से जुड़े बड़े विवाद Big controversy related to the Rajiv Gandhi

सिख विरोधी दंगे (1984 Anti-Sikh riots)

31 अक्टूबर 1984 को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हो गई। हत्या का आरोप उनके ही दो सिख अंगरक्षकों पर लगा। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश के कई हिस्सों, विशेषकर दिल्ली, कानपुर, भोपाल जैसे शहरों में सिख समुदाय के खिलाफ संगठित हिंसा भड़क उठी। जिसके बाद प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर आरोप लगा कि,उनकी सरकार ने दंगों को रोकने में लापरवाही बरती और कई जगह राजनीतिक नेताओं ने खुलेआम हिंसा भड़काने में मदद की। जिससे सैकड़ों की संख्या में सिख समुदाय के लोगों की हत्या हुई। वहीं उस दौरान पीएम राजीव गांधी का एक बयान सामने आया जिसमें उन्होंने कहा कि, 'जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती हिलती है।' इस बयान को कई लोगों ने दंगों के प्रति संवेदनहीनता के रूप में देखा। ये घटना ने भी कांग्रेस पार्टी की छवि को भारी नुकसान पहुंचाया।

ये भी पढ़ें Rajiv Gandhi: जिस प्रभाकरण को राजीव गांधी ने बुलेट प्रूफ जैकेट भेंट की, उसी ने उनकी हत्या करवा दी

शाहबानो केस (Shah Bano Case 1985)

पूर्व पीएम राजीव गांधी सरकार के समय के सबसे विवादित फैसलों में से एक शाहबानो केस रहा है। दरअसल, इंदौर की 62 वर्षीय मुस्लिम महिला शाहबानो बेगम को उनके पति ने तलाक दे दिया। गुज़ारा भत्ता पाने के लिए उन्होंने कोर्ट का रुख किया और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि शाहबानो को CrPC के तहत भत्ता मिलना चाहिए। इस फैसले का मुस्लिम संगठनों ने विरोध किया और इसे शरीयत में हस्तक्षेप बताया। तब की राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम समुदाय को संतुष्ट करने के लिए 1986 में 'मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम' पास किया, जिससे सुप्रीम कोर्ट का फैसला निष्प्रभावी हो गया। जिसके बाद उनके ऊपर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगा, जो आज तक कांग्रेस पार्टी को पीछे नहीं छोड़ पा रहा है।

बोफोर्स घोटाला (Bofors Scam 1987)

बोफोर्स घोटाला भारत के राजनीतिक इतिहास का एक ऐसा मामला है जिसने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की छवि को गहरा आघात पहुंचाया और कांग्रेस की साख पर लंबे समय तक सवाल खड़े कर दिए।

क्या है मामला?

भारत सरकार ने 1986 में स्वीडन की कंपनी बोफोर्स AB से 155 मिमी हॉवित्जर तोपें खरीदने का सौदा किया था। सौदे की कुल कीमत लगभग ₹1,437 करोड़ (लगभग 1.4 अरब रुपये) थी। स्वीडिश रेडियो (SR) ने 1987 में एक रिपोर्ट प्रसारित की, जिसमें दावा किया गया कि इस डील में बड़ी रिश्वतखोरी हुई। कहा गया कि भारत में अधिकारियों और नेताओं को करोड़ों रुपये की रिश्वत दी गई ताकि बोफोर्स को कॉन्ट्रैक्ट मिले। रिपोर्ट्स के मुताबिक, रिश्वत पाने वालों में राजीव गांधी के करीबी लोग भी शामिल थे। हालांकि कोई सीधा सबूत राजीव गांधी के खिलाफ नहीं मिला, लेकिन उनकी चुप्पी ने लोगों के बीच शक पैदा किया। कांग्रेस पर सत्ता का दुरुपयोग और पारदर्शिता की कमी के आरोप लगे जिसका खामियाजा आज भी कांग्रेस पार्टी भुगतना पड़ रहा है।

श्रीलंका में IPKF भेजना

साल 1987 में श्रीलंका के सशस्त्र विवाद को खत्म करने के लिए भारत ने अपनी इंडियन पीस कीपिंग फोर्स यानी IPKF भेजी। तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इसका हरी झंडी दी थी। शुरू में तो इसका मकसद था दोनों तरफ से शांति स्थापित करना, लेकिन जल्द ही ये मिशन विवादों में फंस गया। वहां तमिल विद्रोहियों और आम जनता के साथ झगड़े होने लगे, भारी जान-माल का नुकसान हुआ और सैन्य कार्रवाई लंबी खिंची। इससे राजीव गांधी की साख को झटका लगा। लोगों ने IPKF को वापस बुलाने की मांग भी तेज़ कर दी, और ये मामला राजीव गांधी के लिए एक बड़ा राजनीतिक सिरदर्द बन गया।

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