Rajiv Gandhi: जिस प्रभाकरण को राजीव गांधी ने बुलेट प्रूफ जैकेट भेंट की, उसी ने उनकी हत्या करवा दी
राजीव गांधी अपनी एवं परिवार की प्राइवेसी को लेकर बहुत आग्रही थे। उन्हें यह कतई पसंद नहीं था कि जहां भी वह जायें, वहां उनके साथ सुरक्षाकर्मी भी रहें।

आज राजीव गांधी की 32वीं पुण्यतिथि है। राजीव गांधी भारत के छठे प्रधानमंत्री थे। शुरुआती दिनों में उनकी राजनीति में ज्यादा रुचि नहीं थी। हवाई जहाज उड़ाना उनका सबसे बड़ा जुनून था। उन्होंने दिल्ली फ्लाइंग क्लब की परीक्षा पास कर कमर्शियल पायलट का लाइसेंस हासिल कर लिया था। इसके बाद वह इंडियन एयरलाइंस के पायलट भी बन गये। मगर नियति को कुछ और ही मंजूर था। भाई संजय गांधी की प्लेन क्रैश में मौत के बाद वे राजनीति में आए और अपनी मां इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव देश के प्रधानमंत्री बने।
साल 1980 में भाई की मौत के बाद उन पर राजनीति में प्रवेश करने और अपनी मां को राजनीतिक कार्यों में सहयोग करने का दवाब बन गया था। संजय गांधी की मृत्यु से खाली हुए उत्तर प्रदेश के अमेठी संसदीय क्षेत्र से राजीव गांधी ने पहली बार उपचुनाव लड़ा, इसके बाद उनका राजनीतिक सफर शुरू हुआ।
पसंद नहीं था सिक्योरिटी में रहना
राजीव गांधी को पसंद नहीं था कि जहां वह जायें, वहां उनके साथ सुरक्षाकर्मी भी रहें। 80 के दशक में भारत के गृह सचिव और अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल रहे राम प्रधान ने एक इंटरव्यू में बताया था कि 1985 में वायुसेना अध्यक्ष एयर चीफ मार्शल लक्ष्मण माधव काटरे के निधन पर राजीव अपनी पत्नी सोनिया के साथ घर से निकले। वहां काटरे के घर में कुछ समय बिताकर वह बाहर आए। इसके बाद उन्होंने अपने पास खड़े पुलिस अधिकारी से कहा कि वह बाकी कारों को उनके पीछे न आने दें। पर जब वह अपनी जीप में बैठ कर चले तो उन्होंने देखा कि सभी कारें उनके पीछे ही आ रही हैं।
फिर राजीव गांधी ने अपनी जीप को रोका। और पीछे आ रही एस्कॉर्ट कार का दरवाजा खोला और उसकी चाबी निकाल ली। वह यहीं नहीं रूके। इसके बाद उन्होंने पीछे चल रही दो और कारों की चाबी निकाली और पानी से भरे एक नाले में फेंक दी। सुरक्षाकर्मियों को समझ ही नहीं आया कि वह क्या कर रहे हैं? उस दिन किसी को पता नहीं था कि देश के प्रधानमंत्री कहां जा रहे है? राम प्रधान ने बताया कि इस घटनाक्रम के कुछ देर बाद उन्हें फोन आया कि राजीव सकुशल सात रेसकोर्स रोड पर पहुंच गए। राम प्रधान के अनुसार इन घटनाओं पर उन्होंने राजीव के पास जाकर अपना विरोध प्रकट किया था।
लिट्टे और राजीव
श्रीलंका में सक्रिय अलगाववादी गुट लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम अर्थात लिट्टे के संस्थापक वेलुपिल्लई प्रभाकरण के साथ तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने एक गुप्त बैठक की थी, जिसमें प्रभाकरण ने हिंसक आंदोलन खत्म करने का वादा किया था। पीएम राजीव गांधी से प्रभाकरण की मुलाकात वर्तमान केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कराई थी। तब वह भारतीय विदेश सेवा में कार्यरत थे।
इस मीटिंग के दौरान राजीव ने प्रभाकरण को बुलेट प्रूफ जैकेट उपहार में दी थी। हालांकि, दिल्ली से वापस श्रीलंका लौटने के बाद प्रभाकरण अपनी बात से मुकर गया। इससे नाराज होकर प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने लिट्टे का खात्मा करने के लिए श्रीलंका में भारतीय सेना भेज दी। बिना पूरी तैयारी के किए गए इस अनावश्यक एवं असफल ऑपरेशन में भारत के 1200 जवानों एवं अधिकारियों को अपना जीवन बलिदान करना पड़ा था। इसके बाद लिबरेशन टाइगर्स आफ तमिल ईलम यानी लिट्टे के प्रमुख प्रभकरण ने राजीव गांधी को मारने की साजिश रची थी।
इसके बाद 21 मई 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी की एक चुनावी रैली के दौरान एक आत्मघाती हमले में हत्या कर दी गई। यह आत्मघाती हमला धनु नाम की एक महिला ने किया था जो लिट्टे से जुड़ी हुई थी। इसने राजीव को फूलों का हार पहनाने के बाद अपने कमर में बंधे विस्फोटकों में ब्लास्ट कर दिया था। उस हमले के समय डेक्कन क्रॉनिकल, बेंगलुरु की स्थानीय संपादक नीना गोपाल राजीव गांधी के सहयोगी सुमन दुबे से बात कर रही थीं।
इस घटना के बारे में उन्होंने बताया कि सुमन से बातें करते हुए दो मिनट भी नहीं हुए थे कि मेरी आंखों के सामने बम फटा। उस दिन जल्दी-जल्दी में मैं एक सफेद साड़ी पहन कर कार्यक्रम में गई थी। बम फटते ही मैंने अपनी साड़ी की तरफ देखा तो वह पूरी तरह से काली हो चुकी थी और उस पर खून के छींटे भी पड़े हुए थे। मेरे आगे खड़े सभी लोग उस धमाके में मारे गए थे।
हत्या की पहली वर्षगांठ से पहले अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी गई थी और बाद में कुछ दोषियों को मृत्युदंड एवं अन्य को आजीवन कारावास की सजा सुना दी गई। हालांकि हाल ही में राजीव हत्या के आरोपियों को रिहा कर दिया गया है।












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