बजट 2018- आपकी जेब पर कैसे और कितना असर?
एक फरवरी को वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का साल 2018-19 का अनुमानित आय-व्यय का ब्यौरा संसद और देश के सामने रखा.
सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के मामले में चीन और जापान के बाद एशिया में भारत का नंबर आता है.
दुनिया की बात करें तो अमरीका 20,200 अरब डॉलर की जीडीपी के साथ पहले स्थान पर और चीन 13,120 अरब डॉलर की जीडीपी के साथ दूसरे स्थान पर है, जबकि भारत 2,650 अरब डॉलर की जीडीपी के साथ सातवें स्थान पर है.
सरकार का अनुमान है कि आने वाले साल में उसे राजस्व प्राप्तियों (कर राजस्व, गैर कर राजस्व), पूंजी प्राप्तियों (कर्जों की वसूली, उधार और अन्य देनदारियों) से 24 लाख 42 हज़ार 213 करोड़ रुपये की कमाई होगी.
-(कर राजस्व- इनकम टैक्स, कॉरपोरेट टैक्स, एक्साइज़, कस्टम, सर्विस टैक्स)
-(ग़ैर कर राजस्व- कर्ज़ पर ब्याज, निवेश पर डिविडेंड)
क्या आम बजट के बीच खो गया है रेल बजट?
पिछले साल यानी 2017-18 के मुक़ाबले इस वित्त वर्ष में 2 लाख 24 हज़ार 463 करोड़ रुपये अधिक खर्च होने का अनुमान लगाया गया है.
आम बजट के सियासी मायने क्या हैं?
राजकोषीय घाटा
हर बार की तरह इस बार भी व्यय का आंकड़ा आय से अधिक है और यही राजकोषीय घाटा है.
राजकोषीय घाटा जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद का 3.3 फ़ीसदी (6 लाख 24 हज़ार 276 करोड़ रुपए) रहने का अनुमान है. इस घाटे को सरकार कर्ज लेकर पाटती है.
बजट 2018: क्या महंगा हुआ और क्या सस्ता
इनकम टैक्स पर असर
बजट में टैक्स दरों में किसी तरह के बदलाव नहीं किया गया है. यानी ढाई लाख तक की कमाई पर पहले की तरह कोई टैक्स नहीं लगेगा. पाँच लाख रुपये तक की आमदनी पर 5 प्रतिशत टैक्स चुकाना होगा.
बजट 2018 में इनकम टैक्स पर लगने वाले सेस को बढ़ाकर 3 फीसदी से 4 फीसदी कर दिया गया है. अब तक इनकम टैक्स पर 3 फीसदी सेस लगता है. इस 3 फीसदी सेस में 2 फीसदी एजुकेशन सेस और 1 फीसदी सीनियर सैकंडरी एजुकेशन सेस शामिल है. अब इसे बढ़ाकर कुल 4 फीसदी कर दिया गया है.
यह बदलाव आयकर के हर स्लैब के तहत आने वाले करदाताओं पर असर डालेगा. इस बदलाव के बाद 15 लाख रुपये कमाने वाले लोगों पर 2,625 रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा.
5 से 10 लाख रुपये तक कमाने वाले लोगों को 1,125 रुपये अधिक टैक्स चुकाना होगा. ढाई से 5 लाख रुपये तक कमाई वाले लोगों को 125 रुपये अधिक टैक्स देने होंगे.
स्डैंडर्ड डिडक्शन का कितना असर?
वेतनभोगियों और पेंशनभोगियों को 40 हजार रुपये स्टैंडर्ड डिडक्शन का लाभ दिया गया है, लेकिन साथ ही 40 हज़ार के बदले अभी तक ट्रांसपोर्ट की मद में मिलने वाले 19,200 रुपये और मेडिकल खर्च के 15000 रुपये की सहूलियत को खत्म कर दिया गया है.
यानी कुल मिलाकर फ़ायदा हुआ 5800 रुपये पर लगने वाले टैक्स का. मतलब अगर आप 5 प्रतिशत के आयकर टैक्स के दायरे में आते हैं तो इस कदम से आपका टैक्स बचा मात्र 290 रुपये. 10 फ़ीसदी का टैक्स भर रहे हैं तो आपके 1160 रुपये बचेंगे और अगर 30 फ़ीसदी का टैक्स दे रहे हैं तो आप 1740 रुपये बचाएंगे.
वरिष्ठ नागरिकों पर मेहरबानी
-डिपॉज़िट से प्राप्त आय पर टैक्स छूट की सीमा (5 गुना) 10 हज़ार रुपये से बढ़ाकर 50 हजार रुपये कर दी गई है. (आरडी, एफ़डी पर भी छूट)
-प्रधानमंत्री वय वंदना योजना मार्च 2020 तक जारी रहेगी. योजना के अंतर्गत निवेश की वर्तमान सीमा को साढ़े सात लाख रुपये से बढ़ाकर 15 लाख रुपये कर दिया गया है. दस साल तक 8 प्रतिशत का निश्चित ब्याज.
-धारा 80डीडीबी के अंतर्गत वरिष्ठ नागरिकों और अति वरिष्ठ नागरिकों को गंभीर बीमारी के मामले में मेडिकल ख़र्च के लिए आयकर छूट सीमा बढ़ाकर एक लाख रुपये.
-धारा 80डी के अंतर्गत स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम या मेडिकल खर्च के लिए टैक्स छूट 30 हज़ार रुपये से बढ़ाकर 50 हजार रुपये
महिलाओं के लिए ईपीएफ़ 8 फ़ीसदी
-पहली बार नौकरी करने जा रही महिलाओं के लिए अधिकतम 8 फ़ीसदी कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) योगदान
-पहले तीन सालों के लिए सुविधा
-महिलाओं की टेक-होम सैलरी बढ़ेगो
-सरकार से ईपीएफ़ में मिलेगा 12 फ़ीसदी का योगदान
लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स का असर
-रियल एस्टेट (प्रॉपर्टी), शेयर, शेयरों से जुड़े उत्पाद यानी म्यूचुअल फंड पर लगेगा
-एक साल से अधिक की अवधि में मिले मुनाफ़े पर
-एक लाख से अधिक के मुनाफ़े पर 10 प्रतिशत टैक्स
-अगर आपका मुनाफ़ा डेढ़ लाख है तो सिर्फ़ (डेढ़ लाख- एक लाख) 50 हज़ार रुपये पर ही लगेगा
दोहरी मार
शेयरों का कारोबार करने वालों पर जेटली के इस कदम से दोहरी मार पड़ी है.
शेयरों पर सिक्योरिटी ट्रांजेक्शन टैक्स (एसटीटी) पहले से ही है. इसे बरकरार रखते हुए लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स लगाया गया है. यही नहीं सरकार 15 प्रतिशत का शॉर्ट टर्म गेन टैक्स भी पहले ही वसूल रही है.
आयुष्मान भारत
-सरकार ने बजट में नेशनल हेल्थ प्रोटेक्शन स्कीम की घोषणा की है. ये इंश्योरेंस मॉडल पर काम करेगी. यानी योजना का लाभ उठाने वाले ग़रीबों का इश्योरेंस किया जाएगा और बीमार पड़ने की स्थिति में उनका अस्पतालों में कैशलेस इलाज़ होगा.
इस योजना को 'मोदीकेयर' भी कहा जा रहा है और ये राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना का ही विस्तृत रूप है. इसमें पहले 30 हज़ार रुपये तक का इलाज़ हो सकता था, जिसे अब 1500 फ़ीसदी से अधिक बढ़ाकर प्रति परिवार पांच लाख रुपये कर दिया गया है.
अनुमान है कि प्रत्येक परिवार के लिए इंश्योरेंस का प्रीमियम 1100 रुपये होगा और केंद्र सरकार इस पर 11 हज़ार करोड़ रुपये खर्च करेगी.
हेल्थ और वेलनेस सेंटर
देशभर में डेढ़ लाख से ज्यादा हेल्थ और वेलनेस सेंटर खोले जाएंगे, जो जरूरी दवाएं और जांच सेवाएं मुफ्त उपलब्ध कराएंगे.
इन सेंटरों में गैर-संक्रामक बीमारियों और जच्चा-बच्चा की देखभाल भी होगी. इतना ही नहीं, इन सेंटरों में इलाज के साथ-साथ जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों, मसलन हाई ब्लड प्रेशर, डाइबिटीज और तनाव पर नियंत्रण के लिए विशेष प्रशिक्षण भी दिया जाएगा.
-24 ज़िला अस्पतालों को अपग्रेड कर मेडिकल कॉलेज बनाया जाएगा.
ज़मीनी हक़ीक़त
-राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने हाल में कहा था कि देश में अभी सिर्फ़ 67 हज़ार अंडरग्रेजुएट और 31 हज़ार पोस्टग्रेजुएट मेडिकल सीट
-130 करोड़ की आबादी के लिए इतने डॉक्टर अपर्याप्त हैं.
-छोटे शहरों और कस्बों में सुविधासंपन्न अस्पतालों की कमी है.
किसानों की आय बढ़ेगी
-2000 करोड़ रुपये से कृषि बाज़ार तैयार करने का एलान
-22 हज़ार ग्रामीण हाट को कृषि बाज़ार में बदला जाएगा
-500 करोड़ ऑपरेशन ग्रीन (किसान उत्पादक संगठन, प्रोसेसिंग यूनिटस्) के लिए रखे गए हैं.
-उपज पर लागत का डेढ़ गुना एमएसपी देने का वादा (नीति आयोग तय करेगा लागत पर एमएसपी का फॉर्मूला)
-देशभर में कृषि बाज़ार बनाने के लिए भारी निवेश
-किसानों को लोन के लिए 11 लाख करोड़ रुपये
-42 मेगा फूड पार्क तैयार होंगे
-सिंचाई और मत्स्य परियोजनाओं के लिए अलग से बजट
इसके अलावा, किसानों को उनकी फसल पर लागत का कम से कम डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी देने का वादा किया गया है,
क्या हैं दिक्कतें?
लेकिन ऐसे में जबकि फसलों की ख़रीद का अधिकतर काम राज्य करते हैं तो इसे कैसे लागू किया जाएगा. साथ ही ग्रामीण इलाकों में जहाँ कि छोटे किसान इंटरनेट या संचार क्रांति से भलीभांति परिचित नहीं हैं, वो ई-मंडियों का लाभ कैसे उठा पाएंगे.
कहां है नज़र
आर्थिक और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, कर्नाटक और राजस्थान में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र मोदी सरकार ने इसे अपने मास्टर स्ट्रोक के रूप में पेश किया है.
-छत्तीसगढ़ में किसानों ने वाजिब न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर प्रदर्शन किए हैं
-कर्नाटक के अधिकांश हिस्से सूखे की चपेट में हैं और सैकड़ों की संख्या में किसानों के आत्महत्या के मामले सामने आए हैं.
-मध्य प्रदेश में फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिलने की शिकायतें किसानों ने की हैं. यही वजह है कि वहां सरकार को मुख्यमंत्री भावान्तर भुगतान योजना शुरू करनी पड़ी. यानी एमएसपी और बेची गई कम कीमत में अंतर का भुगतान राज्य सरकार करेगी.
-राजस्थान में सरकारी ख़रीद बहुत कम हुई है. किसानों को व्यापारियों को अपनी फसल बेचनी पड़ी.
आदिवासियों के लिए क्या?
अनुसूचित जाति (एससी) के लिए बजट बढ़ाकर 56,619 करोड़ रुपये किया गया है, जबकि अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए धन के आवंटन को बढ़ाकर 39,135 करोड़ रुपये किया गया है.
यह आवंटन अनुसूचित जातियों के समुदाय के लिए 279 कार्यक्रमों के लिए और अनुसूचित जनजाति वर्ग के 305 कार्यक्रमों के लिए है.
जेटली ने कहा कि 2017-18 के लिए संशोधित अनुमान का निर्धारित आवंटन अनुसूचित जातियों के लिए 52,719 करोड़ रुपये व अनुसूचित जनजातियों के लिए 32,508 करोड़ रुपये था.
देश के जिन ब्लॉक्स में आदिवासी आबादी 50 फ़ीसदी से अधिक है, वहां आदिवासी बच्चों को गुणवत्ता शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए एकलव्य आवासीय स्कूल खोले जाने की भी घोषणा की गई है.
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