नज़रिया: आपातकाल से मिले सबक को याद रखना ज़रूरी है
अगस्त, 1976 में जबलपुर एडीएम बनाम शिवकांत शुक्ला का मुक़दमा बेहद चर्चित हुआ था, जिसे बंदी प्रत्यक्षीकरण या हेबीयस कॉर्पस तौर पर जाना जाता है.
इसमें तत्कालीन महाधिवक्ता (अटॉर्नी जनरल) नीरेन डे ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि अगर एक पुलिस वाला किसी व्यक्ति पर, चाहे आपसी रंजिश की वजह से क्यों न हो, गोली चला कर उसकी हत्या कर दे तो भी कोर्ट में अपील नहीं की जा सकती.
निश्चित तौर पर वे किसी और का नहीं बल्कि शीर्ष अदालत के सामने तत्कालीन केंद्र सरकार का विचार रख रहे थे. अदालत में हर कोई अवाक रह गया. लेकिन केवल जस्टिस एच. आर. खन्ना ने इस पर असंतोष ज़ाहिर किया जबकि बाक़ी सभी चार जज केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ बोलने का साहस नहीं जुटा सके. वो आपातकाल के काले दिन थे.
जस्टिस खन्ना को संविधान द्वारा प्रदत नागरिकों के मौलिक अधिकारों के समर्थन में खड़ा होने का खामियाजा भुगतना पड़ा, उनकी वरीयता की उपेक्षा करते हुए तत्कालीन केंद्र सरकार ने आज्ञाकारी जस्टिस एच. एम. बेग को उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया.
आपातकाल के उन काले दिनों में सुप्रीम कोर्ट करीब-करीब खामोश रहा था.
आपातकाल के उन दिनों में प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया ने भी देश के आम नागरिकों का साथ देने का ऐतिहासिक अवसर गंवा दिया था. तब की तानाशाह सरकार के आगे उन्होंने भी घुटने टेक दिए थे.
रामनाथ गोयनका का इंडियन एक्सप्रेस, द स्टेट्समैन और मेनस्ट्रीम जैसे कुछ ही मीडिया संस्थान तब अपवादों में से थे जिन्होंने सरकार की नीतियों का विरोध किया.
लालकृष्ण आडवाणी ने इसका प्रभावशाली रूप से वर्णन करते हुए कहा, "मीडिया तो रेंगने लगी जबकि उन्हें केवल झुकने को कहा गया था."
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छीने गए जनता के मूल अधिकार
आपातकाल के उन दो वर्षों के दौरान देश की यह दुखद स्थिति थी. भारतीय संविधान और यहां के क़ानून में संशोधन कर सुप्रीम कोर्ट को ऐसे किसी भी संशोधन की जांच करने से रोक दिया गया था.
इसके परिणामस्वरूप, सरकार को भारत के पवित्र संविधान और यहां के लोगों की ज़िंदगी और उनकी स्वतंत्रता के साथ कुछ भी करने की आज़ादी मिल गई थी.
ये सब कुछ किया गया आपातकाल के दौरान एक तानाशाही सरकार को बनाए रखने के इरादे से जो भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने, अपने अन्य ग़लत कामों और नाकामयाबियों के कारण जनता के क्रोध के निशाने पर थी.
जनता के मूल अधिकार छीन लिए गए, उनकी स्वतंत्रता पर रोक लगा दी गई, तानाशाही शासन के द्वारा अपने मनचाहे तरीके से संविधान को ग़लत ढंग से परिभाषित किया गया. और ये सब किया गया आपातकाल के नाम पर. आपातकाल से देश को मिले सबक से सीखने के लिए कई बातें हैं.
एक आम आदमी केवल दो वक्त की रोटी कमाने के लिए ज़िंदा नहीं रहता. अपने मूल अधिकारों को छीने जाने पर वो विद्रोह भी कर बैठता है. और यही हुआ 1977 के चुनावों में जब देश की अशिक्षित, ग़रीब जनता ने आपातकाल लगाने वालों के ख़िलाफ़ भारी मतदान किया.
25 जून 1975 को देश में आपातकाल की ग़लत घोषणा को 21 मार्च 1977 को हटा लिया गया और जनता ने कुछ ही महीनों के बाद वोट देने की अपनी ताक़त से उन काले दिनों पर अपना फ़ैसला देकर मतदान के महत्व को स्पष्ट कर दिया.
वो 21 महीने आज़ाद भारत के वास्तव में काले दिन थे.
वो नहीं भूले जा सकने वाले कड़वे अनुभव थे. उन काले दिनों को याद करके हमें निरंतर लोकतंत्र को ख़तरे में डालने वाले तथ्यों पर व्यापक विचार विमर्थ करते रहना चाहिए. क्योंकि हमें जीने के लिए केवल रोटी की दरकार नहीं है. हमें जीने के और स्वतंत्रता के कुछ निश्चित अधिकार प्राप्त हैं. उनके बगैर जीवन निरर्थक है.
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आपातकाल के दौरान के कुछ कड़वे अनुभव मुझे भी प्राप्त हैं. विश्वविद्यालय के छात्र के रूप में वरिष्ठ नेताओं को दो महीने तक अंडरग्राउंड रहने में मदद करने के कारण मुझे 17 महीने कारावास में गुजारने पड़े.
जेल में बिताए उन दिनों का मेरे जीवन पर बहुत प्रभाव रहा. अनुभवी नेताओं और साथी कैदियों के साथ विचार विमर्श से मुझे लोगों की समस्याओं, राजनीति और देश के बारे में कई चीज़ें सीखने का अवसर मिला. इसमें सबसे ख़ास यह था कि इसने लोकतंत्र की रक्षा करने और बुनियादी स्वतंत्रता के लिए जनता के अधिकार के मेरे संकल्प को और मज़बूत बनाया.
आज देश के मौजूदा समाज में 1977 के बाद जन्मे लोगों का प्रभुत्व है. यह देश उनका है. उन्हें अपने देश के इतिहास और ख़ास कर उन दिनों लगाए गए आपातकाल के कारणों और उसके परिणामों से अवगत होने की ज़रूरत है.
1975 में जनता को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित किए जाने का कोई औचित्य नहीं था. लेकिन बेबुनियाद आंतरिक अशांति को देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा बता कर आपातकाल लगा दिया गया. वास्तव में अशांति यह थी कि देश की जनता भ्रष्ट नेताओं से ऊब चुकी थी और पूरे देश में न्यू इंडिया के लिए लोग संगठित हो कर व्यवस्था में आमूल बदलाव के लिए अपनी ज़ोरदार आवाज़ उठाने लगे थे.
संयोगवश, उन्हीं दिनों इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री के चुनाव को अवैध घोषित करने का अपना ऐतिहासिक फ़ैसला दिया.
एक जज ने यह फ़ैसला देने का साहस कैसे किया? तो इस फ़ैसले का जवाब ढूंढ़ा गया और जनता को अधिकार देने वाले संविधान और चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने और उसकी समीक्षा करने के अधिकारों से न्यायपालिका को वंचित करने के लिए आपातकाल की घोषणा हुई.
आपातकाल के दौरान पूरा देश कारागार में परिवर्तित हो गया था. विपक्ष के सभी नेताओं को रात में ही जगा कर नज़दीकी जेल में ज़बरन उन्हें डाल दिया गया.
जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फ़र्नांडिस, चौधरी चरण सिंह, मोरारजी देसाई, नानाजी देशमुख, मधु दंडवते, रामकृष्ण हेगड़े, सिकंदर बख्त, एच. डी. देवेगौड़ा, अरुण जेटली, रवि शंकर प्रसाद, प्रकाश जावड़ेकर, राम विलास पासवान, डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार को देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा बताते हुए जेल में डाल दिया गया.
राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के प्रमुख बाला साहब देवरस समेत तीन लाख से अधिक लोगों को जेल में डाल दिया गया.
नरेंद्र मोदी भी अज्ञातवास में रहे थे
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तब अज्ञातवास में रहते हुए आपातकाल के ख़िलाफ़ जन आंदोलों का नेतृत्व किया. आपातकाल की घोषणा ने देश की लोकतांत्रिक संरचना को हिला कर रख दिया. लोकतांत्रिक व्यवस्था के कमज़ोर पक्षों पर व्यापक विचार विमर्श हुआ और देश ने दोबारा कभी भी इसे नहीं लगाए जाने का प्रण किया.
यह प्रतिज्ञा तभी बनी रहेगी जब देश बार बार उस आपातकाल से मिलने वाले सबक को याद करता रहेगा. ख़ास कर, युवाओं को आज़ाद भारत के उस काले अध्याय की जानकारी और उससे मिले सबक को जानना होगा.
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था, "जब भी मैं निराशा होता हूं, तब इतिहास के पन्नों को पलटकर सत्य और प्रेम की जीत को दोहराने वाले तथ्यों का स्मरण करता हूं. इतिहास के पन्नों पर आतातायी और हत्यारे भी रहे हैं और कुछ पल के लिए वो अजेय भी दिखे लेकिन यह ख़ास ख़्याल रखें कि अंत में उनका खात्मा हुआ है. जीत हमेशा सत्य की हुई है."
हमें अपने कटु अनुभवों से सीख लेने की आवश्यकता है, ताकि न्यू इंडिया के सपने को साकार कर सकें.
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