'मां भारती की रक्षा के लिए बार-बार जन्म लूंगा', वो वीर सपूत जो 19 की उम्र में चूम गया फांसी का फंदा
नई दिल्ली, 24 जुलाई। भारत का इतिहास वीर सपूतों की गाथाओं से भरा पड़ा है। देश में ऐसे बलिदानी हुए हैं जिन्होंने एक नहीं अपने कई जन्म मां भारती की रक्षा के लिए न्योछावर करने के संकल्प से साथ बलिदान दिया है। लेकिन कई बार हम उनके इतिहास से वंचित रह जाते हैं और वे सच्ची श्रद्धांजिल से वंचित रह जाते हैं। हम आज एक ऐसे ही वीर बलिदानी के बार में बताने जा रहे हैं, जिन्होंने उस उम्र में देश के लिए अपना बलिदान दे दिया जब लोग अपने बारे में सोचना शुरू नहीं करते।

वीर सपूत करतार सिंह सराभा
ये इतिहास है कि एक छोटी-सी उम्र में मां भारती के प्रति अपना सबकुछ अर्पण कर देने वाले वीर सपूत करतार सिंह सराभा का। जिन्होंने महज 19 साल की उम्र में फांसी के फंदे को चूम लिया और मां भारती की रक्षा के लिए कुर्बान हो गए। करतार को स्वतंत्रता आंदोलन का 'अभिमन्यु' भी कहा जाता है।'मां भारती की स्वतंत्रता के लिए बार-बार जन्म लूंगा।' ये थे अंतिम समय में ये बलदानी ने के अंतिम शब्द।
1915 में करतार ने दी कुर्बानी
16 नवंबर 1915 की वो काली तारीख है। जब इस वीर सपूत ने दुनिया से विदा ले ली। लेकिन अपने पीछे वो आग वो चिनगारी छोड़ गया जो देश के आजाद कराने के लिए काफी थी। उन्होंने इसी दिन किसी की अधीनता स्वीकार से बजाय फांसी के फंदे को चूम लेना पसंद किया।
बंगभंग विरोधी आंदोलन से हुए थे प्रभावित
करतार सिंह सराभा का जन्म 24 मई, 1896 को हुआ था। उनका जन्म स्थान पंजाब में लुधियाना के सराबा गांव है। करतार सिंह जिस विद्यालय में दाखिला लिया था वो उस समय उड़ीसा बंगाल राज्य के अंतर्गत आता था। जिसका अंग्रेजों ने विभाजन करने का निर्णय ले डाला था। बंगाल विभाग के विरोध में उस वक्त बंगभंग आंदोलन चल रहा था। करतार सिंह सराभा भी इस आंदोलन में शामिल हो गए। बाद में अंग्रेजों ने उन्हें बंदी बना लिया।
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गदर समाचार पत्र में बने सम्पादक
25 मार्च, 1913 को अमेरिका के ओरेगन प्रान्त में भारतीयों की एक बहुत बड़ी सभा लाला हरदयाल ने कहा कि मुझे ऐसे युवकों की आवश्यता है जो भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण दे सकें। इस दौरान उनके सामान सबसे पहले करतार सिंह सराभा ने उठ कर उनका साथ देने का बात कही। बाद में 1 नवंबर, 1913 को गदर नाम का समाचार-पत्र का प्रथम अंक प्रकाशित हुआ। इस समाचार पत्र के पंजाबी संस्करण के सम्पादक का कार्य करतार सिंह सराभा को सौंपा गया।
सराभा को खोज रहे थे अंग्रेज
21 फरवरी 1915 को करतार और अन्य क्रांतिकारियों ने पूरे भारत में अंग्रेजों के विरोध की योजना बनाई थी। 16 फरवरी को ब्रिटिश सरकार को इसकी भनक लग गई। बंगाल तथा पंजाब से बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां हुईं। ऐसे में करतार काबुल चले गए। लेकिन बाद में उन्होंने सोचा छिपकर रहने से अच्छा है मैं अपने देश में रहूं भले ही क्यों न कुर्बा हो जाऊं। इसके बाद वे वजीराबाद की फौजी छावनी में चले गये। जहां उन्होंने ये कह दिया कि भाइयों अंग्रेज विदेशी हैं। हमें मिल कर अंग्रेजों के शासन को समाप्त कर देना चाहिए। जिसके बाद अंग्रेजों ने उन्हें बंदी बना लिया।
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19 की उम्र में फांसी के फंदे को चूम गए सराभा
सराभा को बंदी बनाने के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने उन के विरुद्ध हत्या, डकैती और सरकार के खिलाफ षड्यंत्र रचने के अभियोग लगाए। उन पर लाहौल षडयंत्र के नाम पर मुकदमा चलाया गया जिसमें कुल 63 क्रांतिकारियों को अभियुक्त बनाया गया था। अदालत में सराभा ने कहा 'मैं भारत में क्रांति लाने का समर्थक हूं। मुझे मृत्युदंड दिया जायेगा तो मैं अपने आपको सौभाग्यशाली समझूंगा। क्योंकि पुनर्जन्म के सिद्धांत के अनुसार मेरा जन्म फिर से भारत में होगा और मैं मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए काम कर सकूंगा। करतार सिंह सराभा मां भारती के वो वीर सपूत थे जो भारत के युवाओं के लिए प्रेरणा हैं।












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