Minority Status to Hindus: क्यों उठ रही है कुछ राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक दर्जा देने की मांग?
Minority Status to Hindus: हिंदुओं को कुछ राज्यों में अल्पसंख्यक का दर्जा देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है. केंद्र सरकार ने कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर राज्यों से विचार विमर्श करने के लिए समय मांगा है. केंद्र का कहना है कि यह मामला बेहद संवेदनशील है और इसके दूरगामी प्रभाव होंगे. अब तक 14 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों ने अपने विचार केंद्र को भेजे हैं.

किसने दायर की जनहित याचिका?
जून 2022 में देवकीनंदन ठाकुर की ओर से जनहित याचिका (PIL) दायर कर राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 और शैक्षिक संस्थान अधिनियम, 2004 के प्रावधान को चुनौती दी गई थी. अभी सुप्रीम कोर्ट में इसी मामले की सुनवाई कर रहा है.
इससे पहले आप पार्टी के पूर्व संस्थापक सदस्य और अब भाजपा नेता अश्वनी उपाध्याय ने भी एक जनहित याचिका दायर की थी. तब उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार से छह राज्यों में हिन्दू अल्पसंख्यकों पर स्पष्टीकरण माँगा था. इसके जवाब में केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को इस मामले पर फैसला लेने के लिए कहा था.
भारत में अल्पसंख्यक कौन है?
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, अल्पसंख्यकों की कोई मानक परिभाषा नहीं है. हालाँकि, विश्व के अधिकतर सरकारी और गैर-सरकारी संस्थान भाषा, धर्म और जातीयता के आधार पर स्वयं अल्पसंख्यकों का निर्धारण करते है. भारत के संविधान में कुछ प्रावधानों - 29 to 30 और 350A से 350B में 'minority' यानि अल्पसंख्यक शब्द का उल्लेख है लेकिन वहां भी इसकी कोई व्यवस्थित परिभाषा नहीं है. वर्ष 1976 में राज्यसभा में एक प्रश्न पूछा गया कि "भारत के संविधान में अल्पसंख्यक शब्द को परिभाषित करने का कोई विचार सरकार के अधीन है?" इस पर केंद्र सरकार ने जवाब दिया कि ऐसा कोई प्रावधान सरकार के पास नहीं है.
भारत के रजिस्ट्रार जनरल कार्यालय में भी अल्पसंख्यक की कोई तय परिभाषा नहीं है. वैसे अल्पसंख्यक एक्ट 1992 में अल्पसंख्यक की परिभाषा तो नहीं लेकिन किन्हें अल्पसंख्यक कहा जायेगा, उसकी एक अधिसूचना जारी की गयी है. आयोग के अनुसार, "केंद्र सरकार द्वारा इस एक्ट में जिन्हें अधिसूचित किया गया है उन्हें 'minority' कहा जायेगा." इस आधार पर भारत में मुसलमान, सिख, बौद्ध, ईसाई, पारसी और अंत में जैन समुदाय (जनवरी 2014 में) को अल्पसंख्यक माना गया है.
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अल्पसंख्यक निर्धारण के नियम
साल 2012 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने लोकसभा में अल्पसंख्यक जिलों को सुविधाएँ देने तथा उनके निर्धारण के तीन पैरामीटर बताये थे - (1) कुल जनसंख्या में कम-से-कम 25 प्रतिशत की पर्याप्त अल्पसंख्यक आबादी वाले जिले, (2) जिन जिलों में पूर्ण अल्पसंख्यक आबादी 5 लाख से अधिक है और अल्पसंख्यक आबादी का प्रतिशत 20 प्रतिशत से अधिक लेकिन 25 प्रतिशत से कम है, और (3) छह राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों में, जहां अल्पसंख्यक समुदाय बहुसंख्यक है, उस राज्य/संघ राज्य क्षेत्र में अल्पसंख्यक समुदाय के बहुमत के अलावा अन्य 15 प्रतिशत अल्पसंख्यक आबादी वाले जिले. जातीय आधार के अलावा देश में भाषाई आधार पर भी अल्पसंख्यकों का निर्धारण और संरक्षण दिया जाता है. इसके लिए राज्य सरकारों ने व्यवस्थित प्रावधान बनाये है.
अल्पसंख्यक कमीशन
1978 में एक अल्पसंख्यक कमीशन बनाया गया था लेकिन उसका कोई विशेष फायदा नहीं हुआ. अतः 1992 में संसद में एक बिल पेश किया गया जिसका भाजपा ने यह कहकर विरोध किया था कि देश को अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक आधार पर विभाजित करने की जरुरत नहीं है. तब कांग्रेस बहुमत में थी इसलिए बिल तो पास हो गया लेकिन उसके चलते कई समस्याएं भी सामने आने लगी. जैसे उत्तर प्रदेश में उर्दू को संरक्षित करने के नाम पर संस्कृत भाषा पर बिलकुल भी ध्यान नहीं दिया गया. चूँकि यह आयोग बाबरी विध्वंस और शाहबानो के प्रकरण के बाद मुसलमानों को कांग्रेस से जोड़ने के उद्देश्य और कथित तौर पर धर्मनिरपेक्ष दिखने के लिए बनाया गया था. इसी के चलते तुष्टिकरण की बहस भी तेजी से बढ़ने लगी.
चूँकि, अब यह आयोग अस्तित्व में है लेकिन केंद्रीय अल्पसंख्यक आयोग की कोई जोनल अथवा रीजनल ब्रांच नहीं है. उसके स्थान पर राज्यों के अपने अल्पसंख्यक आयोग है जोकि अभी 15 राज्यों और केंद्र शासित राज्यों - असम, आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, झारखण्ड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, मणिपुर, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडू, उत्तर प्रदेश, उतराखंड, और पश्चिम बंगाल में है लेकिन बाकि के राज्यों और केंद्र शासित राज्यों में नहीं है. गौर करने वाली बात है कि जहाँ हिन्दुओं की संख्या कम है वहां अधिकतर राज्यों द्वारा अल्पसंख्यक आयोग नहीं बनाये गए है. इसमें जम्मू और कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम और नागालैंड के नाम प्रमुख है.
हिन्दू अल्पसंख्यक का दर्जा और उसकी मांग
समय-समय पर कुछ राज्यों में हिन्दुओ के अल्पसंख्यक होने और उनके संरक्षण की मांग होती रही है. केंद्र सरकार ने 1996 में ही मान लिया था कि छह राज्यों - अरुणाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और पंजाब में हिन्दू अल्पसंख्यक है.
एक साल बाद कांग्रेस के राज्य सभा सांसद कर्ण सिंह ने जवाब माँगा कि क्या सरकार जिन राज्यों कें हिन्दू अल्पसंख्यक है वहां उन्हें भी वही सुविधाएँ और संरक्षण देगी जोकि अन्य अल्पसंख्यकों को प्राप्त है? तत्कालीन गृह राज्य मंत्री मकबूल डार ने गोलमोल जवाब देते हुए कहा कि सरकार जानकारी एकत्रित कर रही है.
साल 2000 में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की राज्य मंत्री मेनका गाँधी ने संसद को बताया कि अल्पसंख्यक आयोग जम्मू और कश्मीर के हिन्दुओं को अल्पसंख्यक मानने पर विचार कर रहा है. इस पर आगे कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया. लिंगयात, सिन्धी, वीरशैव, बहाई पंथों के अलावा यहूदी, मेघालय के ट्राइब्स, और गुजरात की सिद्दी समुदाय को भी अल्पसंख्यक घोषित की मांग की जा चुकी है लेकिन इस पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया.
केंद्रीय अल्पसंख्यक आयोग द्वारा अनेक प्रकार की स्टडी करवाई जाती है उसमें स्वतः संज्ञान लेते हुए हिन्दू अल्पसंख्यकों वाले राज्यों पर कोई रिसर्च नहीं है. यूपीए सरकार और वर्तमान एनडीए सरकार दोनों ने ही हिन्दु अल्पसंख्यक वाले राज्यों में हिन्दुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने से हमेशा इनकार किया है. ऐसा ही भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए कहा गया है. जब भी यह विषय उठे है तो उस पर संबंधित राज्य सरकार को ही फैसला लेने के लिए छोड़ दिया गया है.
आंकड़े क्या कहते है?
वर्तमान में भारत में आठ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश में (लदाख के आकंडे जम्मू और कश्मीर में शामिल है) हिन्दुओं की जनसँख्या 50 प्रतिशत से कम है. जिसमें जम्मू और कश्मीर सहित मिजोरम में हिन्दुओं की जनसँख्या 2001 की जनगणना के मुकाबले 2011 में कम दर्ज की गयी है. बाकि राज्यों में भी यह अपेक्षाकृत बहुत धीमी गति से बढ़ रही है. नागालैंड, लक्षद्वीप और मिजोरम में यह एकदम नगण्य होने के कगार पर पहुँच गयी है. इनके बाद मेघालय भी इस दिशा की ओर अग्रसर है.
2011 की जनगणना के अनुसार पंजाब में हिन्दुओं की जनसँख्या 38.49 प्रतिशत, अरुणाचल प्रदेश में 29.04 प्रतिशत, लद्दाख सहित जम्मू और कश्मीर में 28.44 प्रतिशत, मणिपुर में 41.39 प्रतिशत, मेघालय में 11.53 प्रतिशत, नागालैंड में 8.75 प्रतिशत, लक्षद्वीप में 2.77 प्रतिशत और मिजोरम में 2.75 प्रतिशत है.
इन राज्यों के अतिरिक्त जिले के अनुसार देखे तो भारत में 83 जिलों में हिन्दुओं की जनसँख्या 50 प्रतिशत से नीचे है. इसमें लद्दाख सहित जम्मू और कश्मीर के 11 जिले, पंजाब के 14 जिले, अरुणाचल प्रदेश के 11 जिले, नागालैंड के 8 जिले, मणिपुर के 5 जिले, मिजोरम के 8 जिले, मेघालय के 7 जिले, और लक्षद्वीप का नाम शामिल है.
साथ ही जिन राज्यों में हिन्दू बहुसंख्यक है और लेकिन कई जिलों में हिन्दू आबादी 50 प्रतिशत से कम है ऐसे राज्यों में असम के 6 जिले - धुबरी (24.74%), गोवालपारा (38.22%), बरपेटा (40.19%), नगाँव (47.80%), करीमगंज (46.70%), हाईलाकांदी (41.11%); उत्तर प्रदेश का रामपुर जिला (47.5%); सिक्किम का नार्थ जिला (39.31%); पश्चिम बंगाल के दो जिले - मालदा (49.28%) और मुर्शिदाबाद (35.92%); झारखण्ड के चार जिले - पाकुड़ (45.70%), लोहरदग्गा (28.56%), गुमला (32.70%), पश्चिमी सिंहभूम (42.77%); केरल के तीन जिले - मल्लपुरम (29.17%), एर्नाकुलम (46.53%), कोट्टायम (49.32%); अंडमान का निकोबार जिला (25.50%) प्रमुख है.
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