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Minority Status for Hindus: केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से मांगा समय, कहा-'मामला संवेदनशील, वक्त लगेगा'

सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय और अन्य की तरफ से एक याचिका लगाई गई थी। इस याचिका के जरिए देश के विभिन्न राज्यों में हिंदुओं सहित अन्य धर्मों के आंकड़ों को प्रस्तुत कर अल्पसंख्यक श्रेणी में शामिल करने मांग की गई थी। जिस पर केंद्र सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा सौंपा है। केंद्र सरकार की तरफ से कहा गया है कि हिंदुओं सहित अन्य धर्मों के अल्पसंख्यकों की पहचान करने के लिए उसे और समय चाहिए। क्योंकि यह मामला संवेदनशील है और इसके दूरगामी प्रभाव होंगे।

supreme court

इन राज्यों ने भेज दी है केंद्र को रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट को दिए अपने हलफनामे में केंद्र सरकार ने कहा है कि 14 राज्यों और 3 केंद्रशासित प्रदेशों ने इस मुद्दें पर अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। जबकि अन्य राज्यों की तरफ से अभी इस पर कोई जानकारी नहीं साझा की गई है। जिन 14 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश की तरफ से इस संबंध में जानकारी साझा की गई है, उनमें पंजाब, मिजोरम, मेघालय, मणिपुर, ओडिशा, उत्तराखंड, नागालैंड, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, गोवा, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, लद्दाख, दादरा और नगर हवेली, दमन और दीव, चंडीगढ़ शामिल हैं।

इन राज्यों की तरफ से अभी नहीं साझा की गई है जानकारी
अपने हलफनामे में केंद्र सरकार ने कहा कि 19 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अभी भी विभिन्न हितधारकों से परामर्श करने की प्रक्रिया में हैं। इसलिए इन राज्यों को अपने विचार भेजने के लिए रिमाइंडर दिया गया है। साथ ही केंद्र सरकार ने कहा है कि बचे हुए राज्यों की रिपोर्ट जल्द से जल्द मिल सके, इसको लेकर कई बैठक भी की जा चुकी है। कुछ राज्य सरकारों व केंद्र शासित प्रदेशों ने मामले पर अपनी राय बनाने से पहले सभी हितधारकों के साथ गहन परामर्श करने के लिए अतिरिक्त समय का अनुरोध किया है।

केंद्र सरकार की तरफ से राज्य सरकारों से अनुरोध किया गया था कि मामले की तात्कालिकता को देखते हुए वे इस संबंध में हितधारकों के साथ तेजी से कार्य करें और रिपोर्ट जल्द से जल्द सौंपे। इस मामले में संबंधित राज्य के अल्पसंख्यक विभाग और केंद्र अल्पसंख्यक विभाग को भी सूचना दी गई है। लेकिन यह मुद्दा गंभीर और संवेदनशील है। यही वजह है कि इसमें समय लग रहा है।

केंद्र ने अगस्त में भी मांगा था समय
इस मुद्दे पर केंद्र सरकार ने कोर्ट से अगस्त महीने में भी समय मांगा था। उस दौरान भी केंद्र सरकार की तरफ से कहा गया था कि उसे राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों से चर्चा के लिए थोड़ा समय चाहिए। वहीं, इससे पहले मामले में सुप्रीम कोर्ट ने लेट-लतीफी के लिए केंद्र सरकार की खिंचाई भी की थी। इस दौरान कोर्ट ने कहा था कि अल्पसंख्यकों की पहचान के मुद्दे को एक समाधान की आवश्यकता है। क्योंकि अलग-अलग स्टैंड लेने से उन्हें मदद नहीं मिल रही है।

कोर्ट की फटकार पर केंद्र ने दिया था ये जवाब
सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद केंद्र ने कहा था कि अल्पसंख्यकों को अधिसूचित करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। इस संबंध में कोई भी निर्णय राज्यों और अन्य हितधारकों के साथ चर्चा के बाद लिया जाएगा। पिछले हलफनामे में सरकार ने कहा था कि राज्य सरकारें उक्त राज्य के भीतर एक धार्मिक या भाषाई समुदाय को अल्पसंख्यक समुदाय घोषित कर सकती हैं।

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