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Dark Web : इंटरनेट की ‘काली दुनिया’ जहां खुलेआम बिकता है आपका निजी डेटा

डार्क वेब भी इंटरनेट के अंडरवर्ल्ड की तरह ही है। हैकर्स आपके निजी डेटा को इसी डार्क वेब के जरिए बेचते हैं। साइबर एक्सपर्ट्स की मानें तो यह इंटरनेट की वह दुनिया है, जहां पर्दे के पीछे अवैध काम होते हैं।

what is Dark Web Internet where personal data is sold openly

Dark Web: क्या आपने डार्क वेब (Dark Web) का नाम सुना है? अगर आपने अब तक इसके बारे में नहीं सुना है, तो हम बता दें कि डार्क वेब को 'इंटरनेट की काली दुनिया' कहा जाता है। अगर हमें कुछ सर्च करना होता है, या कहीं ऑनलाइन पेमेंट करना होता है या किसी से वीडियो कॉल या टेक्स्ट मैसेज के जरिए बात करनी होती है, तो हम इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं।

इंटरनेट इस्तेमाल करने या वेब सर्फिंग करने के लिए हम वेब ब्राउजर का इस्तेमाल करते हैं। यह इंटरनेट की सफेद दुनिया है, जिसका एक्सेस सबके पास होता है, लेकिन इससे परे इंटरनेट की एक दुनिया है, जहां सभी गैर कानूनी काम होते हैं, जिसे डार्क वेब कहते हैं।

इंटरनेट की दुनिया का 'अंडरवर्ल्ड'

आपने फिल्मों में अंडरवर्ल्ड का नाम सुना होगा, जिसमें सभी गलत और गैरकानूनी काम होते हैं। डार्क वेब भी इंटरनेट के अंडरवर्ल्ड की तरह ही है। आए दिन डेटा लीक की कई खबरें सामने आती हैं, जिसमें आपका निजी डेटा हैकर्स के हाथ लग जाता है। हैकर्स आपके निजी डेटा को इसी डार्क वेब के जरिए बेचते हैं।

क्रिमिनल्स डार्क वेब पर आपके पर्सनल यानी निजी डेटा खरीदकर कई तरह के गैर-कानूनी काम, फ्रॉड आदि को अंजाम देते हैं। कई बार यूजर्स का निजी डेटा बेहद कम कीमत में बिकता है, तो कई डेटा की कीमत लाखों में होती हैं। आइए, जानते हैं डार्क वेब (Dark Web) का कॉन्सेप्ट कहां और कैसे आया?

तीन हिस्सों में बंटी है इंटरनेट की दुनिया

जिस तरह से हमारी रियल लाइफ वाली दुनिया जमीन, आसमान और पानी तीन हिस्सों में बंटी है, उसी तरह इंटरनेट की भी अलग-अलग दुनिया होती है। इंटरनेट की दुनिया भी ओपन वेब, डीप वेब और डार्क वेब में बंटी है। हम जिस इंटरनेट को डेली लाइफ में इस्तेमाल करते हैं वो इंटरनेट की दुनिया का छोटा सा हिस्सा मात्र है, जिसे ओपन वेब कहते हैं। हमें जो कुछ इंटरनेट पर मिलता है या दिखता है वो सब एक ओपन वेब या सर्फेस वेब के जरिए मिलता है।

साइबर एक्सपर्ट्स की मानें तो यह इंटरनेट की दुनिया का महज 5 प्रतिशत है। इंटरनेट की दुनिया का 95 प्रतिशत हिस्सा डार्क वेब कवर करता है। हम ओपन वेब या सर्फेस वेब में इसलिए कुछ देख या सर्च कर सकते हैं, क्योंकि गूगल, बिंग जैसे सर्च इंजन इन्हें इंडेक्स करते हैं। अगर, इंटरनेट पर मौजूद मटीरियल्स को इंडेक्स ही नहीं किया जाए तो क्या होगा? वो हमें नहीं दिखेगा और डार्क वेब का हिस्सा बन जाएगा।

क्या है डीप वेब (Deep Web)?

डार्क वेब को कुछ एक्सपर्ट्स डीप वेब (Deep web) भी कहते हैं। हालांकि, ये दोनों एक-दूसरे से काफी अलग हैं। डीप वेब में कुछ ऐसे डेटा भी होते हैं, जो लीगल होते हैं और इन्हें छिपाया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है, ताकि सर्च इंजन (गूगल, बिंग, याहू) आदि इसका पता न लगा सके। कंपनियां इसे यूजर की प्राइवेसी को बचाने के लिए छिपा कर रखती हैं।

जिस तरह से समुद्र के नीचे एक दुनिया होती है, जिसे डीप वाटर वर्ल्ड कहते हैं, ठीक उसी तरह से डीप वेब भी ओपन इंटरनेट के नीचे की दुनिया है। एक्सपर्ट्स की मानें तो यह इंटरनेट का इतना बड़ा हिस्सा है, जिसका कोई पता नहीं लगा सकता है कि यहां कितने वेब पेज हैं या यहां कितनी वेबसाइट्स एक्टिव हैं। डीप वेब में ही इंटरनेट की दुनिया के काले राज दफन होते हैं।

बेहद खतरनाक है डार्क वेब

डार्क वेब भी डीप वेब का ही एक हिस्सा होता है, क्योंकि यहां आपका सर्च इंजन नहीं पहुंच पाता है। इन्हें एक्सेस करने के लिए एक स्पेशल वेब ब्राउजर की जरूरत होती है। डीप वेब के अंदर होने वाली गैर-कानूनी गतिविधियां डार्क वेब के जरिए होती है। Kaspersky साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट की मानें तो डार्क वेब बहुत ही खतरनाक है, जहां कई अवैध काम होते हैं।

आम भाषा में कहा जाए तो जिस तरह समुद्र के नीचे ऐसी जगह जहां पहुंचना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है, ठीक उसी तरह डार्क वेब में जाना बहुत मुश्किल है। साइबर वर्ल्ड की इस दुनिया को अवैध कामों का ठिकाना कहा जाता है, जहां दुनियाभर के हैकर्स और साइबर क्रिमिनल्स का राज होता है। पहले डार्क वेब तक पहुंचना नामुमकिन था। हालांकि, एनक्रिप्शन और नई टेक्नोलॉजी के दौर में अब डार्क वेब तक पहुंचा जा सकता है।

लॉ एनफॉर्समेंट एजेंसियों की डार्क वेब पर नजर रहती है। आम यूजर अगर डार्क वेब में जाने की कोशिश करते हैं, तो सरकारी एजेंसियां उस पर निगरानी रखना शुरू कर देती हैं। इसलिए सामान्य यूजर्स को इससे दूर रहने की सलाह दी जाती है। डार्क वेब में एंटर करना इसलिए भी खतरनाक है, क्योंकि आपका डिवाइस जैसे कि मोबाइल, कम्प्यूटर, लैपटॉप, टैबलेट आदि इसकी वजह से अवैध या संदिग्ध सॉफ्टवेयर के शिकार हो सकते हैं।

यह भी पढ़ें: Cyber Attack on AIIMS: क्या हैं हैकिंग के प्रकार, क्यों चिंता का विषय है एम्स सर्वर की हैकिंग?

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