इतिहास के पन्नों से- रमजान और संसद मार्ग मस्जिद
नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) संसद भवन परिसर से जब आप निकलकर संसद मार्ग पर पहुंचते हैं तो उसकी नाक पर ही है संसद मार्ग मस्जिद। रमजान के दिनों में ये बेहद गुलजार हो जाती है। इधर नमाज पढ़ने वालों की भीड़ लगी रहती है। इसका निर्माण कब हुआ, इस सवाल का तो कोई जवाब नहीं दे पाता है पर ये हर हालत में करीब सौ साल तो पुरानी होगी ही। यानी नई दिल्ली के बनने के साथ ये भी बनी।
इधर ही आते हैं नमाज पढ़ने पूर्व राष्ट्रपति एजेपी अब्दुल कलाम, बहुत से केन्द्रीय मंत्री, सांसद, पत्रकार, वरिष्ठ सरकारी अफसर वगैरह। एक दौर में मौलाना आजाद, रफी अहमद किदवई, आरिफ मोहम्मद खान और दूसरे दिग्गज मुसलमान नेता इधर ही आकर नमाज अदा करते थे।
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रूहानियत का अहसास
यहां पर अंदर आते ही आपको एक तरह के सुकून का अहसास होता है। सारे माहौल में रूहानियत है। लगता है आप खुदा से सीधा साक्षात्कार कर रहे हैं। इसी के एक तरफ देश के पूर्व राष्ट्रपति फखर्रूद्दीन अली अहमद की मजार भी है।
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वे भी राष्ट्रपति बनने से पहले और बाद में भी नमाज पढ़ने के लिए आते रहे। कहते हैं कि वे राष्ट्रपति बनने के बाद भी इधर आकर यहां से जुड़े लोगों से गुफ्तुगू करने का कम से कम कुछ देर के लिए तो वक्त निकाल ही लेते थे।
दो दर्जन मस्जिदें
दरअसल नई दिल्ली में करीब दो दर्जन मस्जिदें हैं। इनमें से एक ये भी है,जिसे संसद मार्ग मस्जिद भी कहा जाता है। इसका डिजाइन बिलकुल आधुनिक है। उसमें कोई इस्लामिक या मुगलकाल का आर्किटेक्चर नहीं दिखता। मस्जिद के आसपास सफाई की खासी उम्दा व्यवस्था है।
करीबी नाता
दिल्ली को करीब से जानने वाले फिरोज बख्त अहमद कहते हैं कि संसद मार्ग मस्जिद हालांकि कोई बहुत विशाल नहीं है, पर इसका नई दिल्ली से खासा करीबी संबंध है। ये नई दिल्ली के निर्माण के समय ही बनी होगी। जब नई दिल्ली का निर्माण हो रहा होगा तब इधर काम करने वाले मुसलमानों को नमाज अदा करने की सुविधा देने के लिए इसका निर्माण किया गया होगा।













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