कैराना, पश्चिमी यूपी की मुस्लिम बाहुल्य सीट, जहां से हिंदू पलायन का मुद्दा चर्चा में रहा
Kairana Lok Sabha Seat: लोकसभा चुनाव 2024 के पहले चरण के चुनाव की उल्टी गिनती शरू हो चुकी है। पहले चरण का चुनाव 19 अप्रैल को होना है, वहीं लोकसभा चुनाव 7 चरणों में संपन्न होगा। पहले चरण में 21 राज्यों (केंद्र शासित प्रदेश सहित) की कुल 102 लोकसभा सीटों पर मतदान होगा।
पहले दौर में उत्तर प्रदेश की भी 8 लोकसभा (सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, नगीना, मुरादाबाद, रामपुर व पीलीभीत) सीटों पर वोट डाले जायेंगे। इन आठ सीटों पर 7 महिलाओं सहित 80 उम्मीदवार चुनावी जंग में है।

कैराना लोकसभा
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की मुस्लिम बहुल कैराना लोकसभा सीट हमेशा से ही चर्चा में रही है, चाहे वो हिंदू पलायन का मुद्दा हो अथवा अपराधी मुद्दा। इस लोकसभा के अंतर्गत 5 विधानसभा (नकुड़, गंगोह, कैराना, थाना भवन व शामली) आती है। करीब 17.5 लाख मतदाताओं वाली इस सीट पर करीब 7 लाख (लगभग 42 प्रतिशत) मुस्लिम मतदाता हैं। कैराना लोकसभा का इतिहास रहा है कि यहां से कोई भी पार्टी/उम्मीदवार जीत की हैट्रिक नहीं लगा पाया है। 1962 में इस सीट का उदय हुआ था।
1962: निर्दलीय यशपाल सिंह हुए विजयी
19 मार्च 1962 को हुए आम चुनाव में 2.94 लाख (66.5 फीसदी) लोगों ने मतदान किया। जिसमें निर्दलीय उम्मीदवार यशपाल सिंह 45.7 फीसदी वोट प्राप्त कर विजयी हुए। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के उम्मीदवार अजीत प्रसाद जैन को रिकॉर्ड 53,435 वोटों से हराया था। कांग्रेस उम्मीदवार को 27.5 फीसदी ही वोट प्राप्त हुए, जबकि समाजसेवी रामषरण ने 7.7 फीसदी वोट प्राप्त कर तीसरा स्थान प्राप्त किया।
1967: कांग्रेस उम्मीदवार कम अंतराल से हारा
यह लोकसभा चुनाव काफी रोमांचक रहा। इस रोमांचक मुकाबले में कांग्रेस उम्मीदवार अजीत प्रसाद जैन 1665 वोटों से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार गयूर अली खान से हार गये। वहीं भारतीय जनसंघ के उम्मीदवार टी. धीमन 6.8 फीसदी वोट प्राप्त कर चौथे स्थान पर रहे।
1971: कांग्रेस को मिली जीत
एक मार्च 1971 को हुए मतदान में कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार शफकत जंग को बनाया। जिन्होंने पूर्व सांसद गयूर अली खान को 72,766 वोटों से हरा दिया। कांग्रेस उम्मीदवार को 51.2 फीसदी व गयूर अली खान को 28.2 फीसदी वोट प्राप्त हुए। जबकि भारतीय जनसंघ के उम्मीदवार रामजी लाल वर्मा 9.3 फीसदी वोट प्राप्त कर तीसरे स्थान पर रहे।
1977: भारतीय लोकदल को मिली जीत
इमरजेंसी के उपरांत हुए आम चुनाव में कांग्रेस विरोधी लहर के चलते कैराना लोकसभा से सांसद शफकत जंग को यहां की जनता से बुरी तरह से नकार दिया। कांग्रेस उम्मीदवार जंग भारतीय लोक दल के उम्मीदवार चंदन सिंह से 1,46,858 वोटों से हार गये। भारतीय लोक दल को 63.6 फीसदी व कांग्रेस को 25.1 फीसदी वोट मिले।
1980: चरण सिंह की पत्नी बनी सांसद
जनता पार्टी के टूटने के उपरांत कैराना लोकसभा से पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह ने जनता पार्टी (धर्मनिरपेक्ष) से अपनी पत्नी गायत्री देवी को उम्मीदवार बनाकर मैदान में उतारा। उनका यह फैसला कारगर भी सिद्ध हुआ। गायत्री देवी कांग्रेस उम्मीदवार नारायण सिंह को करीब 59.5 हजार वोटों से हराकर सांसद बन गई।
1984: कांग्रेस ने फिर किया कब्जा
इंदरा गांधी की हत्या के बाद फैली सहानुभूति लहर के चलते कैराना लोकसभा से कांग्रेस उम्मीदवार अख्तर हसन ने 52.1 फीसदी वोट प्राप्त कर लोकदल के उम्मीदवार श्याम सिंह को करीब 98.5 हजार वोटों से कराकर पिछला हिसाब चुकता किया। लोकदल को 30.4 फीसदी वोट मिले।
1988: हरपाल बनें सांसद
1988 लोकसभा चुनाव में कैराना लोकसभा पर 60.6 फीसदी मतदान हुआ। जिसमें जनता दल के उम्मीदवार हरपाल 57.4 फीसदी मतदान प्राप्त कर विजयी हुए। वहीं कांग्रेस उम्मीदवार बसीर अहमद 34.5 फीसदी वोट प्राप्त कर दूसरे स्थान पर रहे।
1991: भारतीय जनता पार्टी ने दी चुनौती
राजीव गांधी की हत्या के बाद हुए लोकसभा चुनाव में कैराना लोकसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार उदयवीर सिंह ने जनता दल के उम्मीदवार व पूर्व सांसद हरपाल को कड़ी चुनौती दी। हरपाल केवल 22,669 वोटों से विजयी हुए। कांग्रेस को जहां 43.4 फीसदी वोट मिले, वहीं बीजेपी को 39 फीसदी वोट प्राप्त हुए।
1996: समाजवादी पार्टी को मिली जीत
इस लोकसभा चुनाव में फिर बीजेपी के उम्मीदवार उदयवीर सिंह ने चुनौती तो पेश की, परंतु विजय नहीं मिली। इस बार विजय समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार मुनव्वर हसन को मिली। वहीं कांग्रेस तीसरे स्थान पर रही। समाजवादी पार्टी को 32.2 फीसदी, बीजेपी को 30.5 फीसदी व कांग्रेस को 20 फीसदी वोट प्राप्त हुए।
1998: बीजेपी ने लहराया परचम
दो बार चुनौती पेश करने के उपरांत आखिरकार बीजेपी ने जीत का स्वाद चख ही लिया। वीरेंद्र वर्मा (39.9 फीसदी) ने समाजवादी पार्टी के सांसद मुनव्वर हसन (31.3 फीसदी) को लगभग 63 हजार वोटों से शिकस्त दी।
1999: राष्ट्रीय लोकदल की जीत
बीजेपी की 13 महीने की अल्पावधि में सरकार गिरने के उपरांत हुए आम चुनाव में कैराना सीट पर राष्ट्रीय लोकदल ने जीत दर्ज की। लोकदल के उम्मीदवार अमीर आलम को 29.5 फीसदी व बीजेपी उम्मीदवार को 24 फीसदी वोट प्राप्त हुए।
2004: लोकदल की लगातर दूसरी जीत
इस बार राष्ट्रीय लोकदल की उम्मीदवार अनुराधा चौधरी ने बसपा उम्मीदवार शहनवाज को लगभग 3.42 लाख वोटों से हरा दिया। यह जीत लगभग एकतरफा हुई। लोकदल को 64.2 फीसदी, बसपा को 22.2 फीसदी व बीजेपी को मात्र 9.3 फीसदी वोट मिले।
2009: बसपा ने चखा जीत का स्वाद
पहली बार कैराना लोकसभा से बसपा को जीत मिली। बसपा पार्टी ने पूर्व सांसद मुनव्वर हसन की पत्नी तबस्सुम बेगम को यहां से अपना उम्मीदवार बनाया। तबस्सुम बेगम ने कड़े मुकाबले में बीजेपी उम्मीदवार हुकुम सिंह को लगभग 23 हजार वोटों से हरा दिया।
2014: बीजेपी ने जीता किला
बीजेपी उम्मीदवार हुकुम सिंह, जो पिछले आम चुनाव में कम अंतराल से हार गये थे, ने अबकी बार अपने प्रतिद्वंद्वी नहीद हसन (समाजवादी पार्टी) को चारों खाने चित कर दिया। हुकुम सिंह को जहां 50.6 फीसदी वोट मिले, वहीं समाजवादी पार्टी को 29.4 फीसदी ही वोट मिले।
2019: बीजेपी की लगातार दूसरी जीत
मोदी लहर के चलते इस बार भी बीजेपी उम्मीदार प्रदीप कुमार ने सपा उम्मीदवार तबस्सुम बेगम को लगभग 92 हजार वोटों से हरा दिया। वहीं कांग्रेस उम्मीदवार हरेंद्र सिंह मलिक को मात्र 6.2 फीसदी वोट मिले।
2024: क्या है समीकरण
इस बार के आम चुनाव में बीजेपी ने फिर प्रदीप कुमार को अपना उम्मीदवार बनाया है। वहीं इंडिया गठबंधन की ओर से सपा के चुनाव चिन्ह पर इकरा हसन मैदान में है। प्रदीप कुमार जहां वर्तमान सांसद है, इसके अलावा तीन बार विधायक भी रह चुके हैं।
वहीं इकरा हसन भी राजनैतिक परिवार से आती है। उनके दादा अख्तर हसन, पिता मनुव्वर हसन और मां तबस्सुम बेगम भी सांसद रह चुकी है तथा भाई नाहिद हसन लगातार 3 बार विधायक रह चुका है। इस बार इस चुनाव में सियासत व विरासत का तड़का लग रहा है। यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि ऊंट किस करवट बैठता है।
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