बनारस जंक्शन: शिव के सेना के बलशाली सैनिक हैं 'नागा'
बनारस जंक्शन। पिछली दफा जब मेरा बनारस जाना हुआ तो इलाहबाद में कुम्भ मेला चल रहा था। कहते है की इलाहबाद में संगम से लाया गया जाल काशी में विश्वनाथ जी को अर्पण किया जाता है तभी कुम्भ की डुबकी का फल मिलता है। ऐसे में बनारस में भी उतनी ही भीड़ दिखती थी जितनी इलाहबाद में, इस भीड़ में सबसे अधिक कौतूहल का विषय थे नागा साधु।
आज आपको इनके जीवन के बारे में कुछ बताती हूँ..जिसे पढ़कर आपको बहुत अचरज होगा...
कौन होते हैं यह नागा बाबा
नागा साधु हिन्दू धर्मावलम्बी साधु हैं जो पूरी तरह से निर्वस्त्र रहते हैं, यह युद्ध कला और योग में माहिर हैं, 8वीं शताब्दी में इनकी स्थापना अदि गुरु शंकराचार्य ने की थी। ये साधु अलग अलग अखाड़ों में रहते हैं।वस्त्र न पहनने के कारण इन्हें दिगम्बर भी कहा जाता है।
कैसे बनते हैं नागा साधु
कोई भी आम आदमी जब नागा साधु बनने के लिए आता है, तो सबसे पहले उसके स्वयं पर नियंत्रण की स्थिति को परखा जाता है। उससे लंबे समय ब्रह्मचर्य का पालन करवाया जाता है। दीक्षा देने से पहले यह तय कर लेते हैं की वह व्यक्ति मोह; इच्छा और वासना से पूरी तरह मुक्त हो।
करना होता है खुद का पिंडदान
दीक्षा के पहले जो सबसे महत्वपूर्ण कार्य है, वह है खुद का श्राद्ध और पिंडदान करना। इस प्रक्रिया में साधक स्वयं को अपने परिवार और समाज के लिए मृत मानकर अपने हाथों से अपना श्राद्ध कर्म करता है। इसके बाद ही उसे गुरु द्वारा नया नाम और नई पहचान दी जाती है।
वस्त्रों को त्यागना पड़ता है
नागा साधुओं को किसी भी तरह के कोई वस्त्र पहनने की अनुमति नहीं है। यदि किसी करणवश पहनने हो तो वे गेरुए रंग का सिर्फ एक वस्त्र धारण कर सकते हैं, भस्म और रुद्राक्ष ही उनका श्रुंगार होता है, उन्हें अपनी चोटी का त्याग करना पड़ता है, वह या तो अपने सर पर कोई बाल न रखें या पूरी जटा धारण करे।
भोजन भिक्षा मांग कर केवल एक ही समय करना होता है
भोजन भिक्षा मांग कर केवल एक ही समय करना होता है और एक साधु अधिकतम सात घरों से भिक्षा ले सकता है | यदि उसे सात घरों से भोजन ना मिले तो उसे भूखा रहना पड़ेगा। ये साधु केवल ज़मीन पर ही सोते हैं चाहे कोई भी मौसम क्यों न हो।
लिंग भंग करके बनते हैं पूरी तरह से नागा
इस प्रक्रिया के लिए उन्हें 24 घंटे नागा रूप में अखाड़े के ध्वज के नीचे बिना कुछ खाए-पीए खड़ा होना पड़ता है। इस दौरान उनके कंधे पर एक दंड और हाथों में मिट्टी का बर्तन होता है। इस दौरान अखाड़े के पहरेदार उन पर नजर रखे होते हैं। इसके बाद अखाड़े के साधु द्वारा उनके लिंग को वैदिक मंत्रों के साथ झटके देकर निष्क्रिय किया जाता है। यह कार्य भी अखाड़े के ध्वज के नीचे किया जाता है। इस प्रक्रिया के बाद वह नागा साधु बन जाता है।
महिलायें भी होती है नागा साध्वी
महिलाओं के लिए भी यह नियम उतने ही सख्त हैं लेकिन उन्हें निर्वस्त्र रहने की आज़ादी नहीं है। उन्हें एक गेरुआ वस्त्र हमेशा धारण करना होता है ; स्नान के समय भी, बनारस के घाटों पर ये नागा साधु और साध्वी आपको तपस्या करते अक्सर मिल जाएँगे।
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