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बनारस जंक्शन: विधवाओं और वेश्याओं की नगरी काशी

बनारस जंक्शन। रोटी कपड़ा मकान जिस तरह से इन्सान की मूलभूत जरूरत है उसी तरह से धर्म और काम दोनों मन और शरीर की बढ़त के लिए आवश्यक है। धर्म से विचारों को पोषण मिलता है और काम से शरीर की आवश्यकताएँ पूरी होती हैं, पर ये दोनों ही बातें विरोधाभास है लेकिन कुछ ऐसे स्थान भी है जहाँ इनका संगम मिलता है ; जैसे बनारस।

अंग्रजों के समय से मशहूर है

बनारस जिसे हम धर्म की नगरी कहते हैं वहां सदियों से तवायफ कल्चर भी चलता था, अंग्रेजों के समय वाराणसी में इस तवायफ कल्चर को काफी अधिक पसंद किया गया था। कहते हैं कि यहाँ पर औरतों से देह व्यापार का काम अंग्रेजों के समय में बहुत अधिक बढ़ गया था। इससे पहले भारतीय लोग इस काम को खुलेआम नहीं करते थे।

औरतों की स्थिति खराब

अधिकतर लोग जो तवायफ का नृत्य देखने आते थे वह काफी ऊँचे लोग होते थे लेकिन बाद में औरतों की स्थिति खराब हो गयी और यह तवायफ कल्चर खत्म होने लगा तो यही औरतें बाद में देहव्यापार के काम को करने लगी। धीरे-धीरे यह रेड लाइट एरिया उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा देह का बाजार बन गया।

मणिकर्णिका पर होता है नगर वधुओं का नाच

बहुत से लोग भारत की इस प्राचीन परंपरा से अनभिज्ञ हैं लेकिन ये सच है कि सदियों से बनारस के महाश्मशान घाट पर चैत्र माह में आने वाले नवरात्रों की सप्तमी की रात पैरों में घुंघरू बांधी हुई वेश्याओं का जमावड़ा लगता है। एक तरफ जलती चिता के शोले आसमान में उड़ते हैं तो दूसरी ओर घुंघरू और तबले की आवाज पर नाचती वेश्याएं दिखाई देती हैं।

महोत्सव में थिरकने के लिए नगर वधुएं तैयार हुईं

कहा जाता है कि पंद्रहवीं शताब्दी में अकबर के नवरत्नों में से एक राजा मानसिंह ने काशी के देव भगवान शिव के मंदिर की मरम्मत करवाई। इस शुभ अवसर पर राजा मानसिंह बेहतरीन कार्यक्रम का आयोजन करना चाहते थे लेकिन कोई भी कलाकार यहां आने के लिए तैयार नहीं हुआ। शमशान घाट पर होने वाले इस महोत्सव में थिरकने के लिए नगर वधुएं तैयार हो गईं। इस दिन के बाद धीरे-धीरे कर यह परंपरा सी बन गई और तब से लेकर अब तक चैत्र के सातवें नवरात्रि की रात हर साल यहां श्मशान महोत्सव मनाया जाता है।

संगीत और नृत्य की प्राचीनतम रियासतें है यहाँ

प्रासंगिक है कि वाराणसी के कुछ इलाके वेश्यावृत्ति के लिए कुख्यात है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि पहले वहां कभी 'तन' का सौदा नहीं होता था, केवल संगीत और नृत्य के ताल गूंजा करते थे। उन दिनों गाने-बजाने और नृत्य व मुजरे की भी एक मर्यादा होती थी। उस जमाने की हुस्नाबाई, धनेसरा बाई, रसूलन बाई, सिद्धेश्वरी बाई, गिरजा देवी, फिल्म अभिनेत्री नरगिस की मां जद्दनबाई और छप्पन छुरी के नाम से मशहूर जानकी बाई का नाम संगीत के क्षेत्र में आज भी याद किया जाता है।

विधवाओं का नहीं है कोई ठौर

वहीँ इन्ही नगर वधुओं की भांति बनारस में रह रहीं सैंकडो विधवायें पिछले कई वर्षों से समाज की मुख्यधारा से दूर एक गुमनाम जिंदगी बिता रही हैं। इनमें अधिकतर विधवाएं पंचिम बंगाल की हैं, जो पति की मौत के बाद परिवार से निकाल दी गर्इं और देश के कई हिस्सों में भटकने के बाद वृंदावन और बनारस के विभिन्न आश्रमों में पहुंची या खुद परिवार द्वारा यहां जबरन पहुंचा दी गई।

ऐसी महिलाओं की संख्या करीब चार करोड के आसपास

एक अनुमान के अनुसार पति की मौत के बाद अभिशाप समझ कर परिवार द्वारा निकाली गई ऐसी महिलाओं की संख्या करीब चार करोड के आसपास है। बड़ी संख्या में यह विश्वनाथ मन्दिर के आसपास और गंगा के घाटों पर अपने जीवन के भीषण क्षण काटती मिल जाएंगी।

इन्हें देनी होगी समाज में जगह

गौरतलब है की ये दोनों ही महिलाएं समाज के घटिया रीति रिवाजों के कारण मुख्य धारा से जुड़ नहीं पा रही। अफ़सोस की बात है की धर्म की इस नगरी में नारी की एक ओर तो पूजा होती है और दूसरी ओर तिरस्कार।

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