मूत्र की सिंचाई से पैदा फसलों को खाएंगे आप

नई दिल्ली, 04 मई। कुछ साल पहले भारत के केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा था कि वह अपने बगीचे के पौधों को अपने पेशाब से सींचते हैं. तब इसे लेकर भारत में बड़ी चर्चा हुई थी. आपको शायद यह जान कर हैरानी हो कि दुनिया के कई देशों में पेशाब से सिंचाई के लिए तंत्र बनाने पर काम हो रहा है. वैज्ञानिक यह पता लगाने में जुटे हैं कि दुनिया की भूख मिटाने में इस तरह की कोशिश का कितना फायदा हो सकता है.
इंजीनियर फाबियन एस्कुलियर बागवानी में अपनी दादी मां के गैरपारंपरिक तौर तरीके को कभी नहीं भूल सके. वास्तव में इसने उन्हें अपना करियर बनाने की प्रेरणा दी. पौधों की खाद के रूप में इंसान के पेशाब का इस्तेमाल आज के औद्योगिक जमाने में बचकानी सी बात लगती है. हालांकि रसायनों पर निर्भरता और पर्यावरण में प्रदूषण घटाने के तरीके खोज रहे कुछ रिसर्चर इंसान के पेशाब की क्षमताओं में काफी दिलचस्पी ले रहे हैं.

खाने में नाइट्रोजन, पोटैशियम और फॉस्फोरस
एस्कुलियर फ्रांस में ओसीएपीआई रिसर्च प्रोग्राम चलाते हैं. वो भोजन तंत्र और मानव कचरे के प्रबंधन पर रिसर्च कर रहे हैं. पौधों को पोषण की जरूरत होती है, जैसे कि नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटैशियम. एस्कुलियर का कहना है, हमारे खाने में ये सारी चीजें होती हैं "जिन्हें हम पेशाब के जरिए शरीर से बाहर निकालते हैं." वैज्ञानिकों को लगता है कि यह एक बढ़िया मौका बन सकता है.
करीब एक शताब्दी से खेती में इस्तेमाल हो रहे उर्वरकों में कृत्रिम नाइट्रोजन होता है. इसने उपज बढ़ाने में मदद की है जिसके कारण कृषि उत्पादन बढ़ा और बढ़ती मानव आबादी का पेट भरने में सफलता मिली. हालांकि जब इसका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर होने लगा तो यह नदियों और दूसरे जलमार्गों तक पहुंचने लगा और शैवालों, मछलियों के साथ ही दूसरे जलीय जीवों की मौत का कारण बन गया.
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प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक इसी बीच खेतों से निकला अमोनिया गाड़ियों के धुएं से मिल कर खतरनाक वायु प्रदूषण पैदा करने लगा.
रासायनिक उर्वरक शक्तिशाली ग्रीन हाउस गैस नाइट्रस ऑक्साइड का भी उत्सर्जन करते हैं और जलवायु परिवर्तन में योगदान करते हैं. हालांकि यह प्रदूषण सीधे खेतों से ही नहीं आता. यूनाइटेड स्टेट्स रिच अर्थ इंस्टीट्यूट की जूलिया काविची बताती हैं, "आधुनिक समय में स्वच्छता के जो तौर तरीके हैं वे पोषक तत्वों से प्रदूषण के प्राथमिक स्रोत हैं."

इसके साथ ही काविची ने यह भी कहा कि गंदे पानी में मिलने वाले 80 फीसदी नाइट्रोजन और आधे से ज्यादा फॉस्फोरस का स्रोत पेशाब है. उनका यह भी कहना है कि रासायनिक खाद की जगह पेशाब का इस्तेमाल करने के लिए उसमें कई गुना वजन डालना होगा यानी उसे भारी बनाने की जरूरत होगी.
काविची ने यह भी बताया, "कृत्रिम नाइट्रोजन का उत्पादन ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन का बड़ा स्रोत है, और फॉस्फोरस सीमित है उसके स्रोत का नवीनीकरण नहीं हो सकता, ऐसे में पेशाब इस्तेमाल करने वाले तंत्र, मानव मल के प्रबंधन और कृषि उत्पादन के लिए एक लंबे समय तक चलने वाला मॉडल पेश करते हैं."
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पेशाब को जमा करने का तंत्र
2020 में एक स्टडी के दौरान संयुक्त राष्ट्र के रिसर्चरों ने पता लगाया कि गंदे पानी में सैद्धांतिक रूप से दुनिया भर की कृषि के लिए 13 फीसदी नाइट्रोजन, फासफोरस और पोटैशियम की मांग को पूरा करने की क्षमता है. हालांकि पेशाब को इस्तेमाल करना उतना भी आसान नहीं है जितना कहा जा रहा है.
बहुत पहले ऐसा होता था जब शहरी मल को दूसरे जानवरों के मल के साथ खाद के रूप में इस्तेमाल करने के लिए खेतों तक लाया जाता था लेकिन रासायनिक विकल्पों ने धीरे धीरे उनकी जगह लेनी शुरू कर दी. आज आप इसे जमा करने के बारे में सोचें तो आपको शौचालयों और सीवेज सिस्टम के बारे में दोबारा विचार करना होगा. स्वीडन में 1990 के दशक में इस पर एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया. इसके लिए सबसे पहले इको विलेज की पहचान की गई थी. अब इस तरह के प्रोजेक्ट स्विट्जरलैंड, जर्मनी, अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, इथियोपिया, भारत, मेक्सिको और फ्रांस में चलाए जा रहे हैं.
स्विट्जरलैंड की इयवैग एक्वैटिक रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिसर्चर टोव लार्सन बताती हैं, "इकोलॉजिकल खोजों और खासतौर से मूत्र को अलग करने जैसी खोजों को इस्तेमाल करने में बहुत ज्यादा वक्त लगता है." लार्सन ने बताया कि शुरुआत में पेशाब को अलग करने वाले टॉयलेट भद्दे और अव्यवहारिक माने गए और बदबू के कारण इन्हें लेकर चिंता जताई गई. हालांकि उन्हें नये मॉडल से काफी उम्मीदे हैं.

स्विस कंपनी लाउफेन एंड इयवेग के बनाये मॉडल इन चिंताओं को दूर करते हैं. इसमें एक कीप लगी होती है जो पेशाब को अलग कंटेनर में ले जाती है. पेशाब को जमा करने के बाद प्रॉसेस किया जाता है. आमतौर पर पेशाब बीमारियों का वाहक नहीं होता है. ऐसे में विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि इसे कुछ समय के लिए ऐसे ही रखा जा सकता है. हालांकि इसे पाश्चराइज करने का विकल्प भी है. इसके बाद इसे गाढ़ा करने या फिर तरल को सुखाने के कई तरीके हैं. इसके जरिये इसका आयतन और खेतों तक ले जाने का खर्च भी घट जाता है.
पेशाब के नाम पर मिचली आती है
दूसरी चुनौती है लोगों की अतिसंवेदनशीलता से पार पाना. फ्रांस में सार्वजनिक योजना बनाने वाली एजेंसी पेरिस ए मेट्रोपोल अमेनेजमेंट से जुड़े जिसलां मर्सिये कहते हैं, "यह विषय लोगों को अंदर तक छू जाता है." एजेंसी फ्रांस की राजधानी में एक इको डिस्ट्रिक्ट तैयार कर रही है जिसमें दुकान और 600 घर शामिल हैं. यहां पेशाब को जमा कर शहर की हरियाली को खाद देने में इस्तेमाल किया जायेगा.
उनकी नजर ऐसे बड़े घरों या दफ्तरों पर है जो शहर की मुख्य नालियों से नहीं जुड़े हैं. यहां तक कि रेस्तरां से भी. पेरिस में 211 ऐसे रेस्तरां हैं जहां पानी का इस्तेमाल नहीं होता और जो पेशाब जमा करते हैं. रेस्तरां मालिक फाबियान गांदोसी बताते हैं, "हमें काफी सकारात्मक फीडबैक मिला है. लोग थोड़े हैरान हुए लेकिन उन्होंने देखा कि पारंपरिक सिस्टम की तुलना में फर्क बहुत मामूली है."
हालांकि बड़ा सवाल यह है कि क्या लोग अगले स्तर पर जाने के लिए तैयार हैं. यानी क्या वो पेशाब से सींची गई फसलों को खाने के लिए तैयार हैं. इस मसले पर हुई एक स्टडी बताती है कि लोगों का रुख देशों के हिसाब से अलग अलग है. उदाहरण के लिए चीन, फ्रांस और युगांडा में इसे लोग ज्यादा स्वीकार रहे हैं लेकिन पुर्तगाल और जॉर्डन में कम.
कृत्रिम उर्वरकों की कीमतें फिलहाल यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के कारण बढ़ गई हैं. इस युद्ध के कारण दुनिया के देश खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने में भी जुटे हैं. मर्सियर जैसे लोग मान रहे हैं कि यह एक मौका है जब इस विषय को ज्यादा से ज्यादा लोगों के सामने रखा जा सकता है.
कई जानकारों का मानना है कि अभी बहुत सी बाधाओं को पार करना होगा, हालांकि वे यह भी मान रहे हैं कि पानी की कमी और बढ़ती आबादी को लेकर आई जागरुकता से लोगों का मन बदल सकता है. मानवविज्ञानी मरीन लेग्रां का कहना है, "हम यह समझना शुरू कर चुके हैं कि पानी कितना अनमोल है तो उसमें शौच करना अब अस्वीकार्य है."
एनआर/आरपी (एएफपी)
Source: DW
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