कश्मीरी पंडित तो फिर भी लौट जाएंगे अपने घर, लेकिन बस्तर के आदिवासियों के साथ है यह समस्या !
रायपुर, 15 अप्रैल। छत्तीसगढ़ सरकार और केंद्र सरकार का दावा है कि वह माओवादी प्रभावित इलाकों में अपनी नक्सल विरोधी रणनीति के आधार पर भारी सफलताएं अर्जित कर रही हैं। इस बीच केंद्रीय गृह मंत्रालय के सामने एक नई समस्या आ खड़ी हुई है। छत्तीसगढ़ से पलायन कर चुके करीब 55000 विस्थापित आदिवासी ग्रामीण वापस अपने राज्य में तत्काल पुनर्वास की मांग कर रहे हैं। बीते दिनों इन आदिवासियों के दल ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से मुलाकात करके अपने राज्य वापस आने की इच्छा जताई थी, जिस पर उन्हें सकारात्मक पहल किये जाने का आश्वासन भी मिला था।

दरअसल छत्तीसगढ़ में नक्सल हिंसा से प्रभावित यह आबादी अपने मूल निवास स्थान से पड़ोसी राज्यों की तरफ विस्थापित हो गई थी, सलवा जुडूम आंदोलन के दौरान नक्सलियों के खिलाफत करने के कारण उन्हें अपने गांवों से बेदखल होने के लिए मजबूर किया गया था।
छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के हजारों ग्रामीणों को माओवादियों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने की वजह से अपनी बस्तियों को छोड़ना पड़ा था। अपनी आजीविका चलाने के लिए उन्हें आंध्र प्रदेश और तेलंगाना का रुख करना पड़ा था। पिछले दो वर्षों के दौरान इन दोनों राज्यों ने हरियाली बढ़ाने के लिए लगभग आधी वन भूमि वापस लेने सबंधी कदम उठाये हैं, जिससे विस्थापित आबादी में बदल चुके छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के सामने समस्या यह है कि छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश और तेलंगाना इनका सही तरीके से पुनर्वास नहीं कर सकते हैं।
मिली जानकारी के मुताबिक बीते राज्य सरकारों ने वृक्षारोपण के लिए भूमि पर कब्जा करना शुरू कर दिया है। हालांकि मूलतः छत्तीसगढ़ के इन आदिवासियों ने अपने राज्य में पुरानी वन भूमि के बदले वन अधिकार अधिनियम के तहत वन भूमि के स्वामित्व के लिए आवेदन किया है, जिसे नक्सल हिंसा बढ़ने के कारण उन्हें छोड़ना पड़ा था। आदिवासियों का कहना है कि केंद्र सरकार कश्मीरी पंडितों या मिजोरम के आदिवासियों के पुनर्वास योजना की सुविधा देने पर विचार करती है, तो छत्तीसगढ़ के आदिवसियों के लिए भी पुनर्वास योजना की जरूरत है ताकि उनकी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुनिश्चित हो सके।
हालाकिं छत्तीसगढ़ सरकार ने आश्वासन दिया है कि यदि बस्तर के विस्थापित आदिवासी राज्य में लौटते हैं, तो उन्हें पुलिस कैम्पो के पास में शांतिपूर्ण क्षेत्रों में जमीन और अन्य सुविधाएं दी जाएंगी। लेकिन आदिवसियों को इस बात का भय है कि इससे उनकी जान का जोखिम बना रहेगा। इस बीच यह मांग बढ़ रही है कि केंद्र सरकार को तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ के साथ मिलकर आदिवासियों के पुनर्वास के लिए व्यापक नीति बनाने के लिए चर्चा शुरू करनी चाहिए।
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