छत्तीसगढ़ की महान विभूति रेशमलाल जांगड़े को क्यों भुला दिया? योगदान याद दिलाने बेटे को करनी पड़ी पिता पर PHD !
रायपुर, 15 अप्रैल। छत्तीसगढ़ के गौरवशाली इतिहास में एक नाम रेशमलाल जांगड़े का भी है। रेशमलाल जांगड़े ना केवल आजाद भारत की पहली लोकसभा में निर्वाचित सांसद थे, बल्कि वह भारतीय संविधान सभा के सदस्य, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, समाज सुधारक भी थे। इतना ही नहीं वह विधायक और मंत्री भी रहे हैं। इतनी सारी उपलब्धियां होने के बावजूद छत्तीसगढ़ के इस महान विभूति के परिजन आज भी उनके सम्मान की लड़ाई लड़ने के लिए मजबूर हैं। रेशमलाल जांगड़े के बेटे हेमचन्द्र जांगड़े ने हाल ही में अपनी पीएचडी पूरी की है। आपको जानकर अचंभा होगा कि उन्होंने यह पीएचडी अपने पिता पर ही की है, क्योंकि वह चाहते हैं कि छत्तीसगढ़ की अगली पीढ़ी भी उनके पिता के बारे में जाने , क्योंकि ना तो किसी पाठ्यपुस्तक में उनके बारे में जानकारी है और ना सरकार ने किसी चौक चौराहे का नाम रेशमलाल जांगड़े पर रखा है।

पिता की उपेक्षा से आहत हैं हेमचंद्र जांगड़े
रेशम लाल जांगड़े के पुत्र हेमचंद्र जांगड़े का कहना है कि भाजपा हो या कांग्रेस दोनों ही पार्टियों ने उनके पिता को भुला दिया है। छत्तीसगढ़ में जब भाजपा की सरकार थी तब भी उन्होंने अपने पिता रेशम लाल जांगड़े के नाम से किसी स्कूल, कॉलेज, मार्ग इत्यादि का नाम रखे जाने की मांग की थी। लगातार यह मांग करते रहे कि पाठ्यपुस्तकों में रेशमलाल जांगड़े के बारे में पढ़ाया जाये, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हो पाया है। हेमचंद्र जांगड़े अब बिलासपुर सिम्स का नाम अपने पिता के नामपर रखने की मांग कर रहे हैं।

सतनामी थे, इसलिए उन्हें भुलाया गया: हेमचंद्र
हेमचन्द्र जांगड़े का कहना है कि केंद्र की सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आजादी के अमृत महोत्सव के दौरान भी स्वतंत्रता सेनानी रहे रेशमलाल जांगड़े और उनके परिवार को याद नहीं किया। छत्तीसगढ़ के पहले निर्वाचित सांसद रहे रेशम लाल जांगड़े अपने आप में एक मिसाल थे। उन्होंने कभी निर्दलीय रहकर, कभी कांग्रेस, तो कभी भाजपा में रहते हुए चुनाव जीता, वह 30 सालों तक राजनीति में सक्रिय रहे, लेकिन कभी पद का मोह नहीं किया और ना ही संपत्ति बनाई। उनके छोटे बेटे हेमचंद का कहना है कि पार्टियों और सरकारों ने उन्हें इसलिए भुला दिया है क्योंकि वह सतनामी थे।

अपने पिता पर ही कर डाली पीएचडी
रेशमलाल जांगड़े एक प्रख्यात दलित चिंतक भी थे। वर्ष 1956 में उन्होंने अस्पृश्यता निवारण कानून लोकसभा से पारित कराया था। पहली लोकसभा में सांसद रहते हुए वह कई संसदीय समितियों के सदस्य भी रहे और संसद में प्रमुखता से बात रखते थे। उनके पुत्र हेमचन्द्र जांगड़े ने अपने पिता पर ही पीएचडी कर ली है। संभवतः देश में ऐसा पहला मामला होगा जब किसी पुत्र ने अपने पिता पर पीएचडी की हो। हेमचन्द्र का कहना है कि उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वह केंद्र सरकार और छत्तीसगढ़ सरकार के उदासीन रवैये से आहत थे।
हेमचंद्र जांगड़े ने बताया कि उनके पिता ने सांसद रहते हुए अपने वेतन से गरीब बच्चो को पढ़ाने के लिए कई छात्रावासों का संचालन किया। उन्होंने समाजिक कुप्रथाओं और छुआछुत का घोर विरोध करते हुए समाज सुधार के लिए काफी काम किया। उन्होंने पदयात्रा करके बाबा गुरु घासीदास के संदेशों और सिद्धांतों का प्रचार किया था। रेशमलाल जांगड़े ही वह व्यक्ति रहे जिन्होंने पूरे भारतवर्ष में छुआछूत के खिलाफ सबसे अधिक प्रकरण दर्ज कराया था। वर्ष 2010 में छत्तीसगढ़ सरकार ने उन्हें दलित चेतना पुरस्कार से नवाजा था, तो वहीं साल 2012 को तत्कालीन राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने संसद के केन्द्रीय कक्ष में उनका लोकसभा सांसद के रूप में सम्मान भी किया था ।












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