औरंगाबाद के प्राचीन सूर्य मंदिर पहुंचे राहुल गांधी और तेजस्वी, जाने मंदिर का इतिहास और खास बातें
Sun Temple Aurangabad Bihar: राहुल गांधी इन दिनों बिहार दौरे पर हैं और 17 अगस्त से सासाराम से अपनी 'वोटर अधिकार यात्रा' चला रहे हैं। उनकी यात्रा सोमवार (18 अगस्त) को औरंगाबाद पहुंची, जहां उन्होंने प्रसिद्ध सूर्य मंदिर में दर्शन किए। इस दौरान राहुल गांधी के साथ बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और RJD नेता तेजस्वी यादव समेत इंडिया गठबंधन के कई नेता भी मौजूद रहे।
यह प्राचीन सूर्य मंदिर अपनी खासियत के लिए जाना जाता है। अन्य सूर्य मंदिरों की तरह यह पूर्वाभिमुख नहीं बल्कि पश्चिमाभिमुख है। मंदिर की वास्तुकला और ऐतिहासिक महत्व इसे बिहार के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल करते हैं। नेताओं ने मंदिर में देश और राज्य में सुख-शांति तथा समृद्धि की कामना की।

मंदिर में दर्शन कर बिहार की प्रगति की मंगलकामना की
बिहार विधानसभा में नेताप्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने मंदिर में दर्शन करते हुए फोटो शेयर करते हुए लिखा कि, बिहार के औरंगाबाद जिला अंतर्गत देव स्थित सूर्य देवता को समर्पित सूर्य मंदिर में दर्शन कर बिहार की प्रगति, समृद्धि और खुशहाली की मंगलकामना की। इस प्राचीन सूर्य मंदिर की यह विशेषता है कि मंदिर अन्य सूर्य मंदिरों की तरह पूर्वाभिमुख न होकर पश्चिमाभिमुख है।
मंदिर का स्वर्णिम इतिहास: देव सूर्य मंदिर
देवार्क सूर्य मंदिर, जिसे केवल देवार्क या देव सूर्य मंदिर के नाम से जाना जाता है, बिहार के औरंगाबाद जिले में स्थित है। यह मंदिर सूर्य देवता को समर्पित है और अपनी विशेष पश्चिमाभिमुख संरचना के लिए प्रसिद्ध है, जो इसे अन्य सूर्य मंदिरों से अलग बनाती है।
इतिहासकार मानते हैं कि इसका निर्माण छठी से आठवीं सदी के बीच हुआ, हालांकि कुछ पुराणिक मान्यताओं के अनुसार इसे त्रेता या द्वापर युग में बनाया गया था। परंपरागत कथाओं के अनुसार इसे कृष्ण के पुत्र साम्ब द्वारा निर्मित बारह सूर्य मंदिरों में से एक माना जाता है। इसके अलावा, देवी अदिति की कथा और त्रिदेव आदित्य भगवान की स्थापना भी मंदिर के महत्व को दर्शाती है।
मंदिर का निर्माण एक रात में भगवान विश्वकर्मा ने की थी
देवार्क सूर्य मंदिर के निर्माण को लेकर कई मान्यताएं प्रचलित हैं। प्रचलित कथा के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने केवल एक रात में किया था। वहीं, पुरातात्विक अनुसंधानों के आधार पर मंदिर के बाहर पाई गई पाली लिपि में लिखित शिलालेख से अनुमान लगाया गया है कि इसका निर्माण आठवीं से नौवीं सदी के बीच हुआ।
मंदिर के नामकरण और निर्माण को लेकर विभिन्न अनुश्रुतियां प्रचलित हैं, लेकिन पुरातात्विक प्रमाण इसके प्राचीन होने की पुष्टि करते हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार पर लगे शिलालेख से यह भी ज्ञात होता है कि इसकी शिल्प कला में नागर शैली, द्रविड़ शैली और वेसर शैली का मिश्रित प्रभाव देखा जा सकता है। इन शिल्प तत्वों के आधार पर भी स्पष्ट होता है कि मंदिर का निर्माण छठी से आठवीं सदी के बीच हुआ था।
मंदिर का स्वरूप
देवार्क सूर्य मंदिर का शिल्प उड़ीसा के कोणार्क सूर्य मंदिर से मिलता-जुलता है। यह मंदिर दो प्रमुख भागों में विभाजित है।
- गर्भगृह - इसके ऊपर कमलनुमा शिखर और शिखर पर सोने का कलश स्थित है।
- मुखमंडप - इसके ऊपर पिरामिडनुमा छत है, जिसे सहारा देने के लिए नक्काशीदार पत्थरों के स्तंभ बनाए गए हैं।
सभी हिन्दू मंदिरों के विपरीत, देव सूर्य मंदिर पश्चिमाभिमुख है। यही विशेषता इसे श्रद्धालुओं के लिए अधिक फलदायी और मनोकामना पूर्ण बनाती है।
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छठ पूजा में श्रद्धालुओं की रहती है भारी भीड़
देवार्क सूर्य मंदिर का धार्मिक महत्व और आस्था का केंद्र सालों से बना हुआ है। मंदिर में वर्ष भर श्रद्धालु आते रहते हैं, लेकिन सबसे विशेष समय होता है छठ पूजा का अवसर, जब बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश सहित देश के विभिन्न हिस्सों से लाखों श्रद्धालु यहां एकत्र होते हैं। इस दौरान मंदिर परिसर और आसपास का क्षेत्र पूरी तरह श्रद्धालुओं से भरा रहता है, और दर्शनार्थियों की भारी भीड़ देखने को मिलती है।
श्रद्धालु इस अवसर पर सूर्य देव की आराधना करते हैं, उनका व्रत करते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। पूजा के दौरान अर्घ्य समर्पित करना सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान माना जाता है, जिसमें सूर्य देव को जल अर्पित किया जाता है। मान्यता है कि मंदिर में अर्घ्य समर्पित करने वाले श्रद्धालु अपने मनोवांछित फल प्राप्त करते हैं।
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