सीमांचल के जिलों में 100 लोगों पर 120 आधार, डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन बना सिरदर्द, फर्जीवाड़े पर बहस तेज
Bihar SIR: बिहार में इन दिनों चुनावी दस्तावेजों को लेकर एक अलग ही जद्दोजहद चल रही है। गर्मी, बारिश और सरकारी दफ्तरों की भीड़ के बीच लोग घंटों लाइन में खड़े हैं, कुछ के हाथ में अधूरे फॉर्म हैं तो कुछ जरूरी कागजों की तलाश कर रहे हैं। वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने की इस खास मुहिम ने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हर मतदाता के पास वाकई वे दस्तावेज हैं, जो चुनाव आयोग ने तय किए हैं?
पटना जैसे शहरी इलाकों में यह प्रक्रिया कुछ आसान नजर आती है, जहां आधार कार्ड से फॉर्म स्वीकार किए जा रहे हैं। लेकिन सीमांचल और दूरदराज के गांवों में कहानी कुछ और है। यहां लोग अपने हक के लिए संघर्ष कर रहे हैं। किसी के पास जन्म प्रमाण पत्र नहीं है तो कोई जमीन के कागज दिखाने में संकोच कर रहा है। कुछ को जाति प्रमाण पत्र तक पहुंचने में कई चक्कर काटने पड़ रहे हैं। वहीं सीमांचल के जिलों में आबादी से ज्यादा आधार कार्ड होने की बात भी सामने आई है।

57% मतदाताओं ने भरे फॉर्म
बिहार में वोटर लिस्ट के Special Intensive Revision (SIR) अभियान ने रफ्तार पकड़ ली है। अब तक राज्य के कुल 7.89 करोड़ पंजीकृत मतदाताओं में से करीब 4.5 करोड़ (57%) लोगों ने नामांकन फॉर्म भर दिए हैं। हालांकि इस प्रक्रिया के दौरान शहरी और ग्रामीण इलाकों के बीच बड़ा फर्क सामने आया है।
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पटना में आधार कार्ड से काम चल रहा, सीमांचल में नहीं
राजधानी पटना और आसपास के इलाकों में चुनाव कर्मी आधार कार्ड के आधार पर फॉर्म स्वीकार कर रहे हैं। लेकिन सीमांचल और अन्य ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसा नहीं हो रहा। वहां पर मतदाताओं से जन्म प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र या भूमि संबंधित दस्तावेज मांगे जा रहे हैं।
विकल्प के तौर पर मांगे जा रहे राशन कार्ड और वोटर ID
शहरों में कुछ मतदाताओं ने बताया कि उन्हें फॉर्म भरकर साइन करने और वोटर ID, आधार या राशन कार्ड की कॉपी जमा करने को कहा गया है। जबकि चुनाव आयोग ने जिन 11 दस्तावेजों को जरूरी बताया है, उनमें आधार और राशन कार्ड शामिल नहीं हैं। इसे लेकर विपक्षी इंडिया गठबंधन ने विरोध भी दर्ज कराया है।
सीमांचल में प्रमाण पत्रों की भारी कमी
किशनगंज, पूर्णिया, अररिया और कटिहार जैसे सीमांचल के जिलों में यह प्रक्रिया सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण साबित हो रही है। यहां पर बड़ी संख्या में लोगों के पास कोई वैध दस्तावेज नहीं हैं। ब्लॉक ऑफिसों के बाहर लंबी-लंबी कतारें देखी जा रही हैं, जहां लोग निवास प्रमाण पत्र बनवाने के लिए आवेदन दे रहे हैं। सिर्फ किशनगंज में ही जुलाई के पहले हफ्ते में 2 लाख से ज्यादा आवेदन हो चुके हैं।
पूर्वी चंपारण में सख्ती, आधार नहीं मान्य
पूर्वी चंपारण जिले के ग्रामीण इलाकों में चुनाव अधिकारियों ने साफ कर दिया है कि आधार कार्ड मान्य नहीं है। मतदाता पंजीकरण के लिए जन्म प्रमाण पत्र जरूरी है। यदि किसी के पास यह नहीं है, तो जाति प्रमाण पत्र, भूमि आवंटन पत्र या पारिवारिक रजिस्टर की प्रति मांगी जा रही है।
गांव छोड़ चुके परिवार, दस्तावेज नहीं मिल रहे
कई परिवार लंबे समय से शहरों में जाकर बस चुके हैं। गांव में उनके सदस्य अब नहीं रहते, जिससे दस्तावेज जुटाना मुश्किल हो गया है। जो लोग कहीं और काम कर रहे हैं, उन्हें भी फॉर्म भरने में परेशानी हो रही है।
जमीन के कागज देने से कतरा रहे कई लोग
ऐसे ग्रामीण मतदाता जिनके पास जन्म प्रमाण पत्र या शैक्षणिक प्रमाण पत्र नहीं हैं, वे अपनी जमीन के दस्तावेज देने से हिचकिचा रहे हैं। इससे उनका नाम वोटर लिस्ट में शामिल होने से छूट सकता है।
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सामान्य आंकड़ों से अलग दिखा सीमांचल
बिहार में आधार कार्ड से जुड़े हालिया आंकड़ों ने सबको हैरान कर दिया है। राज्य में जहां औसतन 94% आधार सैचुरेशन है, वहीं सीमांचल के मुस्लिम बहुल जिलों में यह आंकड़ा 120 फीसदी से भी ज्यादा है। किशनगंज, कटिहार, अररिया और पूर्णिया जैसे जिलों में हर 100 लोगों पर 120 से अधिक आधार कार्ड दर्ज हैं।
किशनगंज में 126% सैचुरेशन
किशनगंज, जहां मुस्लिम आबादी करीब 68% है, वहां आधार सैचुरेशन 126% दर्ज किया गया है। इसी तरह कटिहार (44%) और अररिया (43%) में 123%, जबकि पूर्णिया (38%) में 121% का आंकड़ा सामने आया है। सवाल ये उठता है कि आखिर ये अतिरिक्त आधार कार्ड किसके नाम से बने हैं और क्यों?
एक व्यक्ति-एक आधार, तो फिर इतनी संख्या कैसे?
आधार योजना की मूल भावना "एक व्यक्ति - एक आधार" रही है। ऐसे में जनसंख्या से अधिक आधार कार्ड होना हैरानी की बात है। क्या ये डुप्लिकेट कार्ड हैं? या फिर यह संकेत हैं कि कुछ गैर-नागरिकों को भी आधार जारी कर दिए गए?
सीमा से सटे इलाके, बढ़ती चिंताएं
सीमांचल का भूगोल इस मुद्दे को और गंभीर बना देता है। ये जिले नेपाल और पश्चिम बंगाल की सीमा से लगे हैं और बांग्लादेश भी ज़्यादा दूर नहीं है। ऐसे में यहां अवैध रूप से बसे लोगों की मौजूदगी पहले से ही चर्चा में रही है।
फर्जी दस्तावेज़ों पर बने आधार?
कुछ सोशल मीडिया पोस्ट्स में दावा किया गया है कि इन जिलों में बांग्लादेशी घुसपैठिए फर्जी दस्तावेज़ों के जरिए आधार कार्ड बनवा रहे हैं, जिनमें कुछ स्थानीय नेताओं और कट्टरपंथी संगठनों की भूमिका भी बताई जा रही है। हालांकि इन दावों के पुख्ता प्रमाण नहीं हैं, फिर भी आंकड़े सवाल जरूर खड़े करते हैं।
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