तेलंगाना ने बुंदेलखंड में जगाई उम्मीद
झांसी| तेलंगाना राज्य के गठन का रास्ता साफ होने के साथ ही पृथक बुंदेलखंड आंदोलन से जुड़े लोगों में आशा की नई किरण जाग उठी है। उन्हें भी लगने लगा है कि एक-न-एक दिन उनकी भी मांग मान ली जाएगी, और नए राज्य के साथ उनकी भी तस्वीर बदल जाएगी।
देश के पिछड़े इलाकों में से एक है बुंदेलखंड। यहां सुविधाएं नगण्य और समस्याएं अनंत हैं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में फैले इस इलाके की पहचान सूखा, भुखमरी, पलायन के नाम पर है।
बुंदेलखंड 13 जिलों को मिलाकर बनता है। इसमें उत्तर प्रदेश के सात जिले -झांसी, ललितपुर, जालौन, हमीरपुर, बांदा, कर्वी व महोबा- और मध्य प्रदेश के पांच जिले -टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, दमोह और सागर- आते हैं।
पृथक बुंदेलखंड राज्य के लिए लगभग चार दशक से स्वर उठते रहे हैं, मगर पहली बार संगठित तौर पर इस आंदोलन को दिशा देने के लिए उद्योगपति शंकर लाल मल्होत्रा ने 1989 में बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा का गठन किया था। इस संगठन के जरिए खास तौर पर उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में आंदोलन जोरों पर चला। इस आंदोलन से जुड़े लोगों को तेलंगाना, हरित प्रदेश के आंदोलन के समर्थकों का साथ मिला। हाल यह हुआ कि तीनों राज्यों के समर्थक एक साथ मंच पर आए।
पृथक राज्यों के समर्थकों के संयुक्त मोर्चे का भी बुंदेलखंड को समर्थन मिला, मगर मल्होत्रा के निधन के बाद वर्ष 2002 तक आंदोलन ठंडा पड़ गया। रैलियां हुईं, आंदोलन हुए मगर जनसमर्थन नहीं मिल पाया। कई लोगों ने पृथक राज्य के नाम पर अपनी राजनीतिक रोटियां भी सेंकी। कांग्रेस ने भी अपने घोषणा पत्र में पृथक राज्य का समर्थन किया, मगर बात आज तक नहीं बनी।
बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय महासचिव सूर्यप्रकाश मिश्रा कहते हैं कि तेलंगाना बनने से उम्मीद तो जगी है, मगर संघर्ष किए बगैर राज्य गठन संभव नहीं है। राज्य की बात कर लोग राजनीतिक स्वार्थ साधने लगते हैं और जनता उनका साथ नहीं देती है। आज जरूरत है कि संगठित होकर आंदोलन करें, तभी बात बनेगी।
सामाजिक कार्यकर्ता संजय सिंह का कहना है कि देश में सबसे पहले बुंदेलखंड प्रांत की मांग उठी थी और अब तेलंगाना के बनने से बुंदेलखंड के अलग राज्य बनने की संभावना प्रबल हो गई है। आज जरूरत है कि बुंदेलखंड बने और वह विकास की नई इबारत लिखे।
बुंदेलखंड राज्य की मांग करते आ रहे लोगों के लिए तेलंगाना राज्य बनने का रास्ता साफ होने के बाद नई उम्मीद जगी है और इस बात की संभावना बढ़ गई है कि पृथक राज्य का आंदोलन एक बार फिर जोर पकड़ेगा।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।













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