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Yearender 2010: भारतीय राजनीति का झरोखा

दोस्तों 2010, अब बस चंद दिनों का मेहमान है। साल के पूरे 12 महीनों ने हमें बहुत कुछ दिया है, कही खुशियों की बारिश हुई तो कहीं गम का समंदर फैला, कुछ पहलुओं ने हमें सोचने पर मजबुर किया को कुछ हिस्से हमें नया सबक सिखा गये। सबसे पहले बात राजनीति की करते है कि साल 2010 भारतीय राजनीति के लिए क्या मायने रखते हैं? किस राजनेता ने देशवासियों का दिल जीता और किस राजनेता को देखकर भारत शर्मसार हुआ?

1. बिहार विधान सभा चुनाव : साल 2010 भारतीय राजनीति में जिस नेता के लिए स्वर्ण अक्षरों में लिखा जायेगा तो वो है बिहार की सत्ता को दूसरी बार संभालने वाले नीतीश कुमार। जो बिहार में एक विकास पुरुष के नाम से उजागर हुए। बिहार में जेडीयू-भाजपा गठबंधन को मिली जीत से कई नए पहलू निकलकर सामने आए। लालू और राबड़ी की लालटेन बुरी तरह बुझ गई जबकि इस बार के विधानसभा चुनाव में राहुल की मोहक सूरत और उनके युवा दावे भी काम में नहीं आये, जिसकी वजह से कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी।

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2. झारखंड में राजनीतिक उठापटक : झारखंड की राजनीति बड़ी उठापटक की रही। पहले तो राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू था, फिर शिबू सोरेन मुख्यमंत्री बने, कुछ दिन बीतने के बाद फिर से राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। इसके बाद अर्जुन मुंडा की राज्य में तीसरी बार मुख्यमंत्री के रूप में ताजपोशी हुई।

जिसके चलते पार्टी के लोग उनके विरोधी बन बैठे और गु्स्से में आकर जगन मोहन ने पार्टी के शीर्ष नेताओं पर भी टिप्पणी कर दी जिसके चलते उन्हें कांग्रेस से हाथ धोना पड़ा । जिसके बाद जगन मोहन ने पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा देना पड़ा। इसी बीच आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के रोशैया ने स्वास्थ्य कारणों से सीम पद छोड़ा और उसके बाद किरण कुमार रेड्डी सत्ता सीन हुए।

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4. कल्याण सिंह ने सपा छोड़ी : उप्र के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने मुलायम से अपना मोह भंग कर अपने ही बनायी पार्टी में वापस लौटना उचित समझा. फिरोजाबाद सीट पर सपा की हार ने उसे बुरी तरह से हिला कर रख दिया और कल तक मुलायम-कल्याण की दोस्ती के कसीदे पढ़ने वाले कल्याण सिंह ने सपा छोड़ दी और उन्होंने जन क्रांति नाम की नई पार्टी बनाई जिसके राष्ट्रीय अध्यक्ष बनें उनके पुत्र राजवीर सिंह ।


5. अमर सिंह ने छोड़ी सपा : राजनैतिक घटनाक्रम के तहत सबसे बड़ा नाट्यक्रम जो था वो है अमरसिंह का सपा छोड़ना। दो बदन एक जान कहलाने वाले अमर-मुलायम का अलग होना पार्टी और देश के लिए बहुत बड़ी घटना थी। बाद में अमर का साथ निभा रहे पूर्व सपा नेता और फिल्म अभिनेता संजय दत्त ने भी सपा का साथ छोड़ दिया। अमर के साथ में ही जया प्रदा ने भी सपा को बॉय कह दिया।


6. आजम खां की सपा में वापसी : अमर सिंह गये तो मुलायम सिंह को अपने पुराने यारों की याद आयी जिसके चलके उन्होंने पार्टी में आजम खां को वापस बुलाने की पेशकश की और आजम भी सशर्त पार्टी मे वापस आ गये।

7. यूपीए की थू-थू : पूरे साल सत्ता सीन यूपीए सरकार लोगों और विरोधियों के निशाने पर रहीं। कभी महंगाई तो कभी भ्रष्ट्राचार के कारण लोगों के निशाने पर आयी कांग्रेस के लिए ये साल बेहद चुनौतियों भरा रहा। जम्मू-कश्मीर में शांति प्रक्रिया, नक्सलियों की लगातार जारी हिंसा, पुणे और वाराणसी में बम विस्फोट, राष्ट्रमंडल घोटाला, स्पैक्ट्रम घोटाला और आदर्श घोटाले ने जैसे य़ूपीए की नाक में दम ही कर दिया।

8. निशाने पर चिदंबरम : गृह मंत्री पी चिदंबरम ने कश्मीर समस्या के समाधान के लिए वार्ताकारों की टीम की नियुक्ति को महत्वपूर्ण घटनाक्रम मानते हुए उम्मीद जताई कि इससे राज्य में राजनीतिक प्रक्रिया शुरू करने में काफी मदद मिलेगी, लेकिन स्थिति जस की तस जैसी ही है. यही नहीं लगातार हमारे जवानों को मौत की नींद सुलाने वाले नक्सलियों के चलते देश में पहली बार ऐसा हुआ कि खुले मंच से लोगों ने गृहमंत्री के इस्तीपे की मांग कर डाली, यहां तक की चिंदबरम को भी कहना पड़ा कि अगर आलाकमान कह दें तो मैं इस्तीफा दे दूंगा।

9. असफल राज्य सरकारें : पूरे साल अगर देखा जाए तो केंद्र सरकार अपनी जगह काम करता रहा और राज्य सरकारें अपनी जगह, लेकिन फिर भी काम ठीक तरीके से नहीं हो पाए। कहने का तात्पर्य है कि केंद्र की राज्यों पर कोई पकड़ नहीं थी। चाहे वह पश्चिम बंगाल में बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार हो, मायावती की सरकार हो, जम्मू कश्मीर सरकार हो या और भी कई सारे राज्य। किसी पर केंद्र का कोई दबाव नहीं था। राज्य पूरी तरह से निरंकुश दिखे।

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10. भाजपा पार्टी में फेर-बदल : भाजपा में नितिन गडकरी नए अध्यक्ष, सुषमा विपक्ष नेता, आडवाणी के लिए संसदीय दल के अध्यक्ष का नया पद दिया गया। जबकि पार्टी से बाहर किये गये जसंवत सिंह की पूरे शान के साथ वापसी हुई।

11. बसपा को 33 में से 31 सीटें : उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ पार्टी बसपा को एक और सफलता हासिल हुई. यहां हुए विधान परिषद चुनाव में कुल 33 सीटों में से 31 सीटें बसपा के खाते में गईं। इसके अलावा मायावती के लिए व्यक्तिगत राज्य ये साल काफी अच्छा रहा है, उन्हें नोएडा एक्सप्रेस वे पर सुप्रीम कोर्ट से और सीबीआई की तरह से ताज मामले पर क्लीन चीट दे दी गई।

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12. महाराष्ट्र के सीएम बदले गए : बुरी तरह से आदर्श घोटाले में फंसे महाराष्ट्र के पूर्व सीएम अशोक चव्हाण को अपनी सीट छोड़नी पड़ी और उनकी जगह पृथ्वीराज चव्हाण को सीएम की कुर्सी पर बैठाया गया।

13. ज्योति दा और करूणाकरन ने साथ छोड़ा : भारतीय राजनीति में एक युग पुरूष के नाम से संबोधित किये जाने वाले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के राजनेता ज्योति बसु का 17 जनवरी 2010 को कोलकाता में निधन हो गया। जबकि वरिष्ठ कांग्रेसी नेता के करुणाकरन का 23 दिसंबर 2010 को निधन हो गया। वह 92 वर्ष के थे।

14. दिग्विजय सिंह : जेडीयू के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह का इस वर्ष ही निधन हुआ.

15. सुरेंद्र मोहन : प्रख्यात समाजवादी चिंतक और नेता सुरेंद्र मोहन का 17 दिसंबर 2010 को उनके घर पर दिल का दौरा पड़ने से से निधन हो गया । वह 84 साल के थे।


16. एन डी तिवारी की डीएनए टेस्ट
: राजनैतिक क्रम में सबसे हैरत अंगेज कारनामा रहा आंध्र के पूर्व राज्यपाल एन डी तिवारी पर जिन पर यौन शोषण का आरोप है और एक याची ने दावा किया है कि वो एनडी तिवारी का पुत्र है जिसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने एन जी तिवारी के डीएनए की जांच का आदेश दिया है।


राष्ट्राध्यक्षों के दौरे

इस वर्ष कुछ बड़े राष्ट्रों के राष्ट्राध्यक्ष भारत यात्रा पर आए । जिनमें से कुछ ने तो भारत को दिया, और कुछ से मिला तो कुछ भी नहीं लेकिन भारत ने उनको बहुत कुछ दिया। यात्रा की शुरुआत हुई ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरून से. बाद में अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारत में आकर दीवाली मनायीं । उनकी यात्रा राजनीतिक कम व्यावसायिक ज्यादा रही, और इक्के-दुक्के जो वायदे भी किए वापस जाकर उसे भी तोड़ दिया।

ओबामा के बाद फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी अपनी मॉडल पत्नी कार्ला ब्रूनी के साथ आए. वह राजनीतिक परिदृश्यों पर चर्चा करते कम फोटो खिंचवाते ज्यादा ही नजर आए। चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ की यात्रा का मिलाजुला रुख रहा । इसके बाद चीन के ही प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ भारत यात्रा पर आए।

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उन्होंने वायदे तो भारत से किए लेकिन निभाने का वादा पाकिस्तान से किया. जियाबाओ ने भारत की सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता पर मौन रहना ही उचित समझा । इस बीच मारीशस के राष्ट्रपति भी भारत यात्रा पर आए. इन सबके बाद में जो यात्रा पर आए वह हैं रूस के राष्ट्रपति दिमित्रि मेदवेदेव। मेदवेदेव ने भारत के साथ कई वायदों पर हस्ताक्षर किए । सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि दोनों देशों ने एकदूसरे के दुश्मन को अपनी जमीन पर पनाह नहीं देंने का वादा किया।

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