भारत-पाक वार्ता: ढाक के तीन पात

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अमरीका की तरफ से बार बार की गयी पहल के बाद करीब 14 महीने बाद, भारत और पाकिस्तान के बीच एक बार फिर बात-चीत का सिलसिला शुरू हो गया है. विदेश सचिव स्तर की बात-चीत से कुछ नहीं निकलेगा, यह सबको मालूम था. लेकिन दोनों देशों की जनता के लिए यह एक ऐसी गोली है जिसका बीमारी पर कोई असर नहीं पड़ना था लेकिन शान्ति के लिए संघर्ष कर रहे लोगों के लिए यह एक लाली पाप ज़रूर है.

भारत और पाकिस्तान के बीच जो भी समस्या है ,वह राजनीतिक है. ज़ाहिर है कि उसका हल भी राजनीतिक होना चाहिए. इस लिए जब भी सचिव स्तर की बीत चीत होती है उसे असली बात की तैयारी के रूप में ही देखा जाना चाहिए. लेकिन दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाने की कोशिश करने वालों को और भी बहुत कुछ ध्यान में रखना चाहिए.

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अपने 63 साल के इतिहास में पाकिस्तान के शासक यह कभी नहीं भूले हैं कि भारत उनका दुश्मन नंबर एक है. और उन्होंने अपनी जनता को भी यह बात भूलने का कभी भी अवसर नहीं दिया है. शुरुआती गलती तो पाकिस्तान के संस्थापक, मुहम्मद अली जिनाह ने ही कर दी थी. उन्होंने बंटवारे के पहले अविभाजित भारत के मुसलमानों को मुगालते में रखा और सबको यह उम्मीद बनी रही कि उनका अपना इलाका पाकिस्तान में आ जाएगा लेकिन जब सही पाकिस्तान का नक्शा बना तो उसमें वह कुछ नहीं था, जिसका वादा करके जिनाह ने मुसलमानों को पाकिस्तान के पक्ष में लाने की कोशिश की थी और सफल भी हुए थे. बाद में लोगों की नाराज़गी को संभालने की गरज से पाकिस्तानी शासकों ने कश्मीर, हैदराबाद और जूनागढ़ की बात में अपने देश वालों को कुछ दिन तक भरमाये रखा. लेकिन काठ की हांडी के एक उम्र होती है और वह बहुत दिन तक काम नहीं आ सकती. वही पाकिस्तान के हुक्मरान के साथ भी हुआ. जिसका नतीजा यह है कि पकिस्तान में आज सारे लोगों की एकता को सुनिश्चित करने के लिए कश्मीर की बोगी का इस्तेमाल होता है.

पिछले 60 वषों में इतनी बार कश्मीर को अपना बताया हैं इन बेचारे नेताओं और फौजियों ने कि अब कश्मीर के बारे में कोई भी तर्क संगत बात की ही नहीं जा सकती है. जहां तक भारत का सवाल है, वह कश्मीर को अपना हिस्सा मानता है और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को अपने इलाके में मिलाना चाहता है. पाकिस्तानी हुकूमतें कहती रही हैं कि कश्मीर के मसले पर उन्होंने भारत से तीन युद्ध लड़े हैं. लिहाज़ा वे कश्मीर को छोड़ नहीं सकते.

बहर हाल यह पाकिस्तानी अवाम का दुर्भाग्य है कि अपनी आज़ादी के 63 वर्षों में उन्हें महात्मा गाँधी, सरदार पटेल और नेहरू जैसा कोई नेता नहीं मिला. दूसरा दुर्भाग्य यह है कि पकिस्तान की आज़ादी के लिए कोई लड़ाई नहीं लड़ी गयी. वास्तव में पाकिस्तान की स्थापना भारत की आजादी की लड़ाई को बेकार साबित करने के लिए अंग्रेजों की तरफ से डिजाइन किया गया एक धोखा है जिसे जिनाह को उनकी अँगरेज़ परस्ती के लिए इनाम में दिया गया था.

आज की हकीकत बिलकुल अलग

आज की हकीक़तें बिलकुल अलग हैं. आज जब पाकिस्तानी विदेश सचिव दिल्ली में बात कर रहे हैं, उनके ऊपर पाकिस्तानी सत्ता के तीन केन्द्रों को खुश रखने का लक्ष्य है. ज़ाहिर तौर पर तो वहां पाकिस्तानी राष्ट्रपति और प्रधान मंत्री हैं. जिनकी अपनी विश्वसनीयता की कोई औकात नहीं है. वे दोनों ही वहां इस लिए बैठे हैं कि उन्हें अमरीका का आशीर्वाद प्राप्त है. वे दोनों ही अमरीका के हुक्म के गुलाम हैं, जो भी अमरीका कहेगा उसे वे पूरा करेंगे. दूसरी पाकिस्तानी ताक़त का नाम है, वहां की फौज. शुरू से ही फौज़ ने भारत विरोधी माहौल बना रखा है. उसी से उनकी दाल रोटी चलती है. और शायद इसी लिए पाकिस्तानी समाज में भी फौजी होना स्टेटस सिम्बल माना जाता है. आई एस आई भी इसी फौजी खेल का हिसा है. तीसरी ताक़त है वहां का आतंकवादी. इसे भी सरकार और फौज का आशीर्वाद मिला हुआ है.

धार्मिक नेताओं के ज़रिये बेरोजगार नौजवानों को जिहादी बनाने का काम 1979 में जनरल जिया उल हक ने शुरू किया था. उसी दौर में आज आतंक का पर्याय बन चुका हाफ़िज़ मुहम्मद सईद, जनरल जिया उल हक का सलाहकार बना था. और अब वह इतना बड़ा हो गया है कि आज पाकिस्तान में कोई भी उसको सज़ा नहीं दे सकता.

जिया के वक़्त में उसका इतना रुतबा था कि वह लोगों को देश की बड़ी से बड़ी नौकरियों पर बैठा सकता था. बताते हैं कि पाकिस्तानी हुकूमत के हर विभाग में उसकी कृपा से नौकरी पाए हुए लोगों की भरमार है, जिसमें फौजी अफसर तो हैं ही, जज और सिविलियन अधिकारी भी शामिल हैं. बहुत सारे नेता भी आज उसकी कृपा से ही राजनीति में हैं. पाकिस्तान के पूर्व प्रधान मंत्री, नवाज़ शरीफ भी कभी उसका हुक्का भरते थे. भारत के खिलाफ जो भी माहौल है, उसके मूल में इसी हाफ़िज़ सईद का हाथ है. बताया गया है कि पाकिस्तान का मौजूदा विदेश मंत्री, शाह महमूद कुरेशी भी इसी हाफ़िज़ सईद के अखाड़े का एक मामूली पहलवान है. ऐसी हालत में विदेश सचिव स्तर की बात चीत से कुछ भी नहीं निकलना था और न निकलेगा. भारत और पाकिस्तान के बीच विदेश सचिवों की बात चीत को इसी रोशनी में देखा जाना चाहिए.

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शायद इसी लिए वार्ता शुरू होने से पहले ही चीन में जाकर पाकिस्तानी विदेश मंत्री, शाह महमूद कुरेशी ने चीन को बिचौलिया बनाने की बात कर डाली. सब को मालूम है कि इस सुझाव को कोई नहीं मानने वाला है. पाकिस्तान की रोज़मर्रा की रोटी पानी का खर्च उठा रहे अमरीका को भी यह सुझाव नागवार गुज़रा है. पाकिस्तानी फौज को मालूम है कि अगर भारत को सैन्य विकल्प का इस्तेमाल करना पड़ा तो पाकिस्तान का तथाकथित परमाणु बम धरा रह जाएगा और पाकिस्तान का वही हश्र हो सकता है जो 1971 की लड़ाई के बाद हुआ था, लेकिन फौज किसी कीमत पर दोनों देशों के बीच सामान्य सम्बन्ध नहीं होने देगी क्योंकि अगर भारत और पाकिस्तान में दुश्मनी न रही तो पाकिस्तानी फौज़ के औचित्य पर ही सवाल पैदा होने लगेगें. आई एस आई और उसके सहयोगी आतंकवादी संगठनों को भी भारत विरोधी माहौल चाहिए क्योंकि उसके बिना उन का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा.

जहाँ तक ज़रदारी-गीलानी जोड़ी का सवाल है उनकी तरफ से भारत से बात चीत का राग चलता रहेगा क्योंकि अगर उन्होंने भी इस से ना नुकुर की तो अमरीका नाराज़ हो जाएगा और अमरीका के नाराज़ होने का मतलब यह है कि पकिस्तान में भूखमरी फैल जायेगी. आज पाकिस्तान की बुनियादी ज़रूरतें भी अमरीकी खैरात से चलती हैं. इस लिए बात चीत की प्रक्रिया को चलाते रहना उनकी मजबूरी है. लेकिन उनकी राजनीतिक हैसियत इतनी नहीं है कि वे कोई फैसला ले सकें. इस लिए पूरे भरोसे के साथ कहा जा सकता है कि भारत और पकिस्तान के बीच समबन्धों में निकट भविष्य में कोई सुधार नहीं होने वाला है.

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