केंद्र के IAS कैडर नियमों में संशोधन के फैसले के खिलाफ ओडिशा सरकार
भुवनेश्वर, 27 जनवरी: भारतीय प्रशासनिक सेवा आईएएस कैडर नियमों में संशोधन के केंद्र सरकार के प्रस्ताव के विरोध में ओडिशा की पटनायक सरकार भी अन्य गैर-भाजपा शासित राज्यों में शामिल हो गई। खबर है कि मुख्य सचिव सुरेश चंद्र महापात्रा ने प्रस्तावित संशोधनों का विरोध करते हुए कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग को पत्र लिखा है, लेकिन पत्र को मीडिया के साथ साझा नहीं किया गया था। राज्य सरकार ने कहा कि अगर आईएएस अधिकारियों की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर उसका कोई अधिकार नहीं होगा तो विकास परियोजनाएं कार्यान्वयन स्तर पर प्रभावित होंगी।

केंद्र के इस कदम का पश्चिम बंगाल, राजस्थान, झारखंड, केरल, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना ने विरोध किया है। वहीं अब ओडिशा में नवीन पटनायक की बीजू जनता दल की सरकार ने भी आवाज बुलंद कर दी है। कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने 12 जनवरी को एक पत्र में भारतीय प्रशासनिक सेवा (कैडर) नियम 1954 के नियम 6 (कैडर अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति) में प्रस्तावित संशोधनों पर राज्य सरकार के विचार मांगे थे।
डीओपीटी द्वारा प्रस्तावित चार संशोधनों में से एक यह है कि यदि राज्य सरकार किसी राज्य कैडर के अधिकारी को केंद्र में तैनात करने में देरी करती है और निर्दिष्ट समय के भीतर केंद्र के फैसले को लागू नहीं करती है, तो उस अधिकारी को केंद्र सरकार की ओर से दी गई समयसीमा के बाद स्वत: कैडर से मुक्त मान लिया जाएगा। जिसका मतलब है कि केंद्र को इस नियम में संशोधन के बाद राज्य सरकार की आपत्तियों को दरकिनार कर आईएएस अधिकारियों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर पदस्थापित करने का अधिकार मिल जाएगा।
बता दें कि वर्तमान में केंद्र को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर एक एआईएस अधिकारी की नियुक्ति के लिए संबंधित राज्य सरकार से अनापत्ति मंजूरी की आवश्यकता है। केंद्र का एक अन्य प्रस्ताव यह है कि वह राज्य के परामर्श से प्रतिनियुक्त किए जाने वाले अधिकारियों की वास्तविक संख्या तय करेगा।
अब इस मुद्दे ने बीजद और कांग्रेस के इस कदम का विरोध करने के साथ राजनीतिक गर्मी पैदा कर दी है जबकि भाजपा ने इसका समर्थन किया है। बीजद सांसद अमर पटनायक ने ट्विटर पर कहा, "अखिल भारतीय सेवा नियमों में संशोधन करने के लिए भारत सरकार का नवीनतम प्रस्ताव, इन कैडरों पर केंद्र और राज्यों के नियंत्रण में मौजूदा संतुलन को बिगाड़ने के अलावा, प्रतिनियुक्ति की वर्तमान परिभाषा के विपरीत भी है। इसके लिए अधिकारी की मर्जी भी जरूरी है, जबरदस्ती नहीं।"












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