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बेअसर हो गया प्लास्टिक पर लगा प्रतिबंध

एकल उपयोग (सिंगल यूज) वाले प्लास्टिक पर प्रतिबंध आधे मन और अधूरी तैयारी से लगाया गया। एक जुलाई से लागू इस प्रतिबंध की चर्चा हफ्ता-दस दिन हुई, फिर सब कुछ सामान्य हो गया। अब न तो प्रतिबंध को लेकर कोई जागरुकता कार्यक्रम चल रहा है, न किसी तरह की कार्रवाई नजर आती है। वैसे भी एकल उपयोग प्लास्टिक से बनी जिन 21 वस्तुओं पर प्रतिबंध लगाया गया है, वे कुल प्लास्टिक उत्पादों के दो-तीन प्रतिशत से अधिक नहीं होंगे।

what is reasons behind that Plastic ban has become ineffective

असल में प्लास्टिक का सबसे ज्यादा उपयोग पैकेजिंग में किया जाता है जिसे मोटे तौर पर इस प्रतिबंध से बाहर रखा गया है। इनमें रोजमर्रा के उपयोग की ढेर सारी वस्तुओं की पैकेजिंग शामिल है जैसे दूध, दूध के उत्पाद, चिप्स, बिस्कुट, साबुन इत्यादि की पैकेजिंग।

एक अध्ययन के अनुसार भारत में कुल प्लास्टिक कचरे का 59 प्रतिशत इसी तरह के पैकेजिंग का कचरा होता है। एक अन्य अध्ययन में यह पता चला है कि प्लास्टिक प्रदूषण का 70 प्रतिशत शीर्ष ब्रांडों द्वारा होता है। यह माना जाता है कि पैकेजिंग को प्रतिबंध के दायरे में लाने पर खाद्य प्रसंस्करण उद्योग बुरी तरह प्रभावित होगा।

प्लास्टिक एक पेट्रोकेमिकल पदार्थ है। भारत में इसका उत्पादन कच्चे खनिज तेल के शोधन के दौरान होता है। कच्चे तेल का आयात किया जाता है, फिर स्थानीय स्तर पर उसका शोधन किया जाता है। वर्ष 2018-19 में भारत में करीब 29 मिलियन टन पेट्रोकेमिकल का उत्पादन हुआ जिसका करीब 58 प्रतिशत का उपयोग प्लास्टिक के उत्पादन में हुआ।
भारत में करीब 30 हजार प्लास्टिक उत्पादनकर्ता हैं जिनमें अधिकतर छोटे व मध्यम उद्योग हैं। अधिकतर खाद्य पदार्थों की पैकेजिंग में बहुस्तरीय प्लास्टिक (मल्टीलेयर प्लास्टिक) का उपयोग होता है। बहुस्तरीय प्लास्टिक का उत्पादन करने में कई ईकाइयां एक साथ काम करती हैं। वे कई तरह के रसायनों के इस्तेमाल से प्लास्टिक के एक स्तर का उत्पादन करती हैं, फिर उनको जोड़कर बहुस्तरीय प्लास्टिक का निर्माण अन्य उत्पादन इकाई करती है।

इस प्लास्टिक का निपटारा बहुत कठिन होता है, इनका पुनर्चक्रण (रिसाइक्लिंग) आसानी से नहीं हो पाता। एक अध्ययन के अनुसार, भारत में प्लास्टिक कचरे का करीब 35 प्रतिशत इसी बहुस्तरीय पैकेजिंग प्लास्टिक का है। इनमें दूध की पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक भी है जिनका पुनर्चक्रण केवल तभी संभव हो सकता है जब उसमें ग्रीस नहीं लगा हो।

प्लास्टिक पुनर्चक्रण में लगा भारत का सबसे बड़ा उद्योग डालमिया पॉलिप्रो इंडस्ट्रीज है जो वर्ष 2020 में इकट्ठा करीब 19 हजार टन प्लास्टिक कचरे में से केवल 40 प्रतिशत का ही पुनर्चक्रण कर पाया। ऐसे प्लास्टिक का बड़ी मात्रा में उत्पादन जिनका पुनर्चक्रण नहीं हो पाता, अपने आप में बड़ा संकट खड़ा करता है। वैसे प्लास्टिक के जिन पदार्थों पर जुलाई में लगे सीमित प्रतिबंध का प्रभाव पड़ेगा, उनका उत्पादन मध्यम और छोटे उद्योगों में होता है, बड़े उद्योगों में नहीं। इसलिए प्रतिबंध का असर भी मध्यम व छोटे उद्योगों पर पड़ेगा।

प्लास्टिक कचरा प्रबंधन

भारत में प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियमावली 2016 में बनी, जिसमें अब तक पांच बार संशोधन किए जा चुके हैं। तकरीबन हर संशोधन में नियमावली में बड़े उत्पादनकर्ताओं, आयातकर्ताओं और ब्रांड मालिकों के पक्ष में थोड़ी नरमी दिखाई गई। अब एक तरह से मान लिया गया है कि सभी प्लास्टिक कचरे को ऊर्जा उत्पादन का स्रोत बनाया जा सकता है।

हालांकि यह समाधान पर्यावरण के लिए अच्छा नहीं है। प्लास्टिक से बिजली बनाने या सीमेंट उद्योग में ईंधन के रुप में इस्तेमाल होने में जो रसायनिक गैस निकलती है, वो ग्रीनहाउस गैसों के बोझ को बढ़ाने वाली होती हैं। प्लास्टिक से बिटुमिन बनाने की तकनीक पर विचार किया जा रहा है जिससे सड़कें बनाई जा सकती हैं।

इस बीच प्लास्टिक के कारोबार पर विस्तृत उत्पादक जवाबदेही (ईपीआर) लागू करने का प्रस्ताव आया है। इसके अंतर्गत प्लास्टिक उत्पादकों को कचरे के प्रबंधन तक की जिम्मेवारी उठानी होगी। हालांकि इसमें भी कई ऐसे प्रावधान हैं जो पर्यावरण की कीमत पर उद्योग की सहायता करने वाले हैं। इसमें कहा गया है कि प्लास्टिक को बाजार में भेजने वाले को उसके कचरे को एकत्र करने और निपटारा करने की जिम्मेवारी लेनी होगी। इस प्रावधान से पेट्रोकेमिकल उद्योग अपनी जिम्मेवारी से साफ बाहर निकल जाता है क्योंकि वह प्लास्टिक को सीधे बाजार में नहीं भेजता।

दूसरा प्रावधान है कि निर्माता, आयातकर्ता और ब्रांड धारकों को प्लास्टिक कचरे का संग्रह तो तत्काल शुरु कर देना है, पर उनका पुनर्चक्रण 2024-25 तक कर सकते हैं। उसके बाद उन्हें पुनर्चक्रित प्लास्टिक का इस्तेमाल करना है, परन्तु अभी देश में पुनर्चक्रण की क्षमता के बारे में कोई जानकारी नहीं है। इस तरह के कई प्रावधान हैं जो उद्योगों को जिम्मेवारी से बच निकलने का रास्ता उपलब्ध कराने वाले हैं।

यह भी याद रखने की जरूरत है कि प्लास्टिक कचरे को एकत्र कर लेने का अर्थ उसका निपटान करना नहीं होता। वैसे प्लास्टिक कचरे को एकत्र करने का काम अभी केवल कचरा बीनने वाले करते हैं। लेकिन उत्पादक, आयातकर्ता व ब्रांडधारक जिस प्लास्टिक को कचरा में फेंक देते हैं, उनमें से ज्यादातर की प्रकृति पुनर्चक्रण वाली नहीं होती।

कुल मिलाकर पुनर्चक्रण कड़े या ठोस किस्म की प्लास्टिक का होता है जैसे बोतलें। कचरा बीनने वाले ज्यादातर उसे ही उठाते हैं क्योंकि इसकी कीमत मिल जाती है। बहुस्तरीय प्लास्टिक मोटे तौर पर ऐसे ही पड़ा रह जाता है। उल्लेखनीय है कि अभी भारत में केवल 12 प्रतिशत प्लास्टिक कचरे का पुनर्चक्रण हो पाता है और केवल 20 प्रतिशत का आखिरी निपटान हो पाता है। यह जानकारी दिल्ली की संस्था सीएसई के अध्ययन में सामने आई है।

प्लास्टिक का उपयोग खत्म करने के लिए प्रयास वैश्विक स्तर पर हो रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण एसेंबली के 175 सदस्य देश प्लास्टिक के उत्पादन से लेकर निपटान तक की कार्रवाई करने के लिए वचनबध्द हुए हैं। इसके अंतर्गत 2024 तक प्लास्टिक के संबंध में अंतरराष्ट्रीय कानून बनाया जाना है।

यहां यह उल्लेख करना भी उपयुक्त होगा कि प्लास्टिक कचरे की समस्या से बचने का सर्वोत्तम उपाय इसका उपयोग कम करना है और इसके लिए ''इस्तेमाल करो और फेंको'' वाली आदतों को बढ़ावा देने के बजाए फिर से उपयोग कर सकने वाले उत्पादों और पैकेजिंग के तरीके को महत्व देना ही हो सकता है।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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