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Patanjali Ayurveda: जब कानून में योग-आयुर्वेद का जिक्र नहीं तो पतंजलि के विज्ञापनों पर प्रतिबंध क्यों?

Patanjali Ayurveda: मंगलवार 2 अप्रैल को पतंजलि आयुर्वेद की ओर से बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए। उनकी मौजूदगी में सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि "यदि यह बचाव करने योग्य नहीं है तो आपका माफी मांगना काम नहीं आयेगा।"

असल में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) बाबा रामदेव के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। आईएमए की याचिका पर सुनवाई के बाद 21 नवंबर 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने पतंजलि आयुर्वेद को आदेश दिया था कि वह आयुर्वेद के नाम पर भ्रामक विज्ञापनों का सहारा न लें। अगर वो ऐसा करना जारी रखेंगे तो उन पर एक करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया जाएगा।

supreme court

इस फैसले के अगले ही दिन बाबा रामदेव ने प्रेस कांफ्रेस करके अपनी सफाई दे दी। इसके बाद भी उनके वो विज्ञापन आते रहे जिसमें वो हृदय रोग, अस्थमा जैसी गंभीर बीमारियों का आयुर्वेद के माध्यम से संपूर्ण इलाज का दावा करते हैं।

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने पुन: इसी साल फरवरी में जब यह बात सुप्रीम कोर्ट को बताई तो सुप्रीम कोर्ट ने इसे कोर्ट की अवमानना माना। फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि 2 अप्रैल को आचार्य बालकृष्ण और बाबा रामदेव स्वयं उपस्थित होकर अपना पक्ष रखें। इसी आदेश के बाद मंगलवार को दोनों सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे।

बाबा रामदेव पर आरोप है कि वो भ्रामक विज्ञापनों का सहारा लेकर असाध्य रोगों को भी योग तथा आयुर्वेद के माध्यम से जड़ से समाप्त करने का दावा करते हैं। आईएमए के मुताबिक यह उस कानून का उल्लंघन है जिसे 1954 में बनाया गया था। 1954 में ड्रग्स एण्ड मैजिक रेमेडी एक्ट (आपत्तिजनक विज्ञापन) संसद से पारित किया गया था जिसके सेक्सन 3 में कहा गया है कि ऐसे विज्ञापनों का प्रसार नहीं किया जा सकता जो गंडे ताबीज, झाड़फूंक, मंत्र या कवच पर आधारित होंगे।

इस कानून में न तो योग का उल्लेख है और न ही आयुर्वेद का। इसका मतलब योग और आयुर्वेद के जरिए अगर प्रामाणिक रूप से कोई किसी असाध्य रोग का इलाज करता है तो उस पर इस कानून के प्रावधान लागू नहीं होते। ऐसे में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने किस आधार पर बाबा रामदेव के योग आयुर्वेद वाले फार्मूले पर केस किया यह तो वही जाने क्योंकि बाबा रामदेव गंडे ताबीज का विज्ञापन तो करते नहीं। हां, वो मंत्र जरूर बोलते और बुलवाते हैं। अगर यह आईएमए को बुरा लगता है तो निश्चित रूप से इस कानून के मुताबिक बाबा रामदेव पर केस बनता है।

बाबा रामदेव बड़बोले हैं यह बात सही है। कोरोना काल के दौरान उन्होंने कोरोना का इलाज खोज लेने का दावा किया था जिस पर उनकी काफी भद्द पिटी थी। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि योग और आयुर्वेद को भी गंडा ताबीज वाली चिकित्सा मानकर साइंटिफिक नजरिए से उसे खारिज कर दिया जाए। यह कानून संभवत: इसलिए बनाया गया था ताकि लोग गंडे ताबीज और झाड़फूंक के नाम पर लोगों को ठगें नहीं।

इसलिए यह कानून अगर सचमुच किसी पर लागू होता है तो वो बंगाली बाबाओं का टोला और गंडे ताबीज में फूंक मारकर शिफा बांटने वाले मुल्ला मौलवियों पर लागू होता है। ये लोग देशभर में फैले हैं और दीवारों पर, होर्डिंग के जरिए या फिर पर्ची पैम्पलेट छापकर अपना प्रचार भी करते हैं। अगर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी को लागू ही करना है तो देशभर के झाड़फूंक और गंडे ताजीब का कारोबार करनेवालों पर करना चाहिए जो इस तरह का विज्ञापन करते हैं।

इस मामले को देखकर इतना तो साफ लगता है कि इंडियन मेडिकल एसोसिएशन को बाबा रामदेव से पूर्वाग्रह हो न हो, आयुर्वेद से जरूर कोई न कोई पूर्वाग्रह है। अतीत में भी आईएमए के लोग बाबा रामदेव के योग आयुर्वेद वाले फार्मूलों पर प्रहार करते रहे हैं। माडर्न मेडिकल साइंस के लोग मानते हैं कि सिर्फ वही हैं जिनके पास रोगों पर गहरा रिसर्च है और उस रिसर्च के कारण जो दवाइयां बनी हैं सिर्फ वही किसी का साइंटिफिक उपचार कर सकती हैं। ऐसे में अगर कोई योग आयुर्वेद या फिर तंत्र मंत्र से भी चिकित्सा का दावा करता है तो आईएमए की नजर में उसकी कोई साइंटिफिक वैल्यू नहीं है।

लेकिन बात सिर्फ साइंस तक सीमित नहीं है। माडर्न मेडिसिन मुख्य चिकित्सा पैथी है और इस समय देश में 40 अरब डॉलर का दवा बाजार है, जिसके 2030 तक बढकर 130 अरब डॉलर पहुंचने का अनुमान है। इसके अलावा 4 अरब डॉलर का पैथोलोजी कारोबार, मेडिकल इक्विपमेन्ट का लगभग 11 अरब डॉलर का बिजनेस और डॉक्टरों की फीस ये सब अलग हैं। भारत का जो कुल हेल्थकेयर मार्केट है उसका 80 प्रतिशत मॉडर्न मेडिसिन या ऐलोपैथी के पास है। इसीलिए भारत में मेडिकल टूरिज्म का कल्चर बढ़ रहा है और आमदनी भी।

ऐसे में योग, आयुर्वेद, सिद्धा, यूनानी या फिर होम्योपैथी जैसी अन्य चिकित्सा पद्धतियों के लिए एक समय तो खतरा ही पैदा हो गया था। लेकिन केन्द्र की सरकारों खासकर मोदी सरकार के प्रयास से इन सभी चिकित्सा पद्धतियों को सरकारी जीवनदान मिला है। आयुष मंत्रालय के अधीन ये सभी पद्धतियां वैध हैं और इनको उस कानून से नहीं जोड़ा जा सकता जो 1954 में बनाया गया था। नेहरु सरकार चाहती तो उसमें उस समय योग आयुर्वेद सहित सभी परंपरागत पद्धतियों को शामिल करके उन्हें प्रतिबंधित कर सकती थी लेकिन उस समय कानून बनानेवालों ने ऐसा नहीं किया।

फिर सवाल उठता है कि सुप्रीम कोर्ट ने किस प्रकार से रामदेव और बालकृष्ण को कटघरे में खड़ा कर दिया? वो लोग तो योग और आयुर्वेद का काम करते हैं जो कि अब भारत ही नहीं यूरोप और अमेरिका के लिए वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति बनकर उभर रही है। योग और आयुर्वेद के फायदे को देखते हुए तो सऊदी अरब सरकार तक ने इसे मान्यता दे दी है। फिर अगर रामदेव इसी के जरिए असाध्य रोगों को ठीक करने का प्रचार कर रहे हैं तो गलत क्या कर रहे हैं?

पूरी तरह से न सही लेकिन कुछ सीमा तक गलत तो है। आयुर्वेद की अपनी सीमाएं हैं। आयुर्वेद में बीते कई सौ सालों से नया शोध नहीं हुआ है। शताब्दियों पुराने ग्रंथों में दवाइयों का जो फार्मूला बताया गया है आज भी उसी प्रकार से दवाइयां बनती हैं। आयुर्वेद के वैद्य मानते हैं कि ये फार्मूला संपूर्ण हैं इसलिए नया शोध करने की जरूरत नहीं है। लेकिन कई सौ सालों में मानव शरीर में जो जटिलताएं निर्मित हुई हैं उसकी काट के लिए आयुर्वेद अपर्याप्त है। इसलिए अगर कोई यह दावा करे कि सिर्फ आयुर्वेद के बल पर वह किडनी, फेफड़ा, ब्रेन, हार्ट से जुड़े जटिल रोगों का निदान कर सकता है तो इस पर भरोसा करना गलत होगा।

वैसे भी आयुर्वेद के बारे में कहा जाता है कि वह रोग की नहीं बल्कि रोगी की चिकित्सा करता है। मतलब यौगिक और आयुर्वेदिक सिद्धांतों के अनुसार अगर कोई अपना जीवन जीता है तो उसके शरीर में रोगों का प्रवेश ही नहीं होगा। वह निरोगी होकर 100 साल का जीवन प्राप्त कर सकता है। इसलिए आयुर्वेद के नाम पर बड़बोले दावे करना न सिर्फ मनुष्य के जीवन से खिलवाड़ है बल्कि उस पैथी का भी अपमान है जो रोग से अधिक जीवनशैली और खानपान को ठीक रखने पर जोर देता है।

बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण के बड़े बड़े दावों ने योग आयुर्वेद का प्रचार तो किया लेकिन बहुत जल्दी ही लोगों का मोहभंग भी होने लगा। इसका कारण यह था कि इनकी ओर से जितने बड़े बड़े दावे किये जा रहे थे, लोगों को उससे उतना लाभ मिला नहीं। इसलिए अगर सुप्रीम कोर्ट उनके बड़बोले दावों पर रोक लगाता है तो यह योग आयुर्वेद के हित में ही होगा क्योंकि इससे सही परिप्रेक्ष्य में लोगों को योग आयुर्वेद की जानकारी और लाभ मिलेगा।

योग में बीते सौ सालों के रिसर्च ने जैसे साबित किया कि आसन प्राणायाम का किस प्रकार शरीर, दिमाग और मन पर सकारात्मक असर होता है उसी प्रकार आयुर्वेद में भी नये शोध की जरूरत है। आर्यवैद्यशाला कोट्टकल जैसे गिने चुने आयुर्वेदिक संस्थान ही हैं जो इस दिशा में काम कर रहे हैं। फिर आयुर्वेद में एलोपैथी की तरह दवाईयों का कोई मानकीकरण नहीं है। कोई कंपनी चाहे आयुर्वेद के नाम पर जो मन करे वो चूरन बनाकर बाजार में बेच दे। अगर आयुर्वेद को एलोपैथी के समानान्तर विकसित होना है तो इन्हीं दो बातों पर सबसे अधिक ध्यान देना होगा, जो बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण ने बिल्कुल नहीं किया।

बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण ने अगर आयुर्वेद के क्षेत्र में सत्यनिष्ठ होकर काम किया होता तो बड़बोले दावे कभी नहीं करते। तब शायद सुप्रीम कोर्ट में वो अपना पक्ष भी मजबूती से रख पाते और इस तरह शीर्ष अदालत के सामने शर्मिंदा भी न होना पड़ता।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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