Cattle Slaughter Row: 'कुर्बानी तो जरूर देंगे,' HC के फैसले के बाद कोलकाता में बढ़ा तनाव, Eid से पहले अलर्ट

Kolkata Cattle Slaughter Verdict: पश्चिम बंगाल में आगामी ईद-उल-अज़हा (बकरीद) से ठीक पहले पशु बलि (Cattle Slaughter) के नियमों को लेकर कानूनी और सामाजिक जंग तेज हो गई है। कलकत्ता हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के उस नोटिफिकेशन में दखल देने से साफ इनकार कर दिया है, जिसमें ईद से पहले गाय, बैल, बछड़े और भैंसों की बलि पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं। अदालत ने इस पाबंदी को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं को सिरे से खारिज कर दिया है।

हाईकोर्ट के इस बड़े फैसले के बाद से राजधानी कोलकाता सहित राज्य के कई संवेदनशील इलाकों में स्थिति बेहद तनावपूर्ण हो गई है और सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट पर हैं। आइए जानते हैं इस पूरे विवाद के पीछे की सिलसिलेवार कानूनी वजहें क्या हैं?

CRPF jawans conduct march

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष ने क्या कहा?

जमीयत उलेमा-ए-हिंद (पश्चिम बंगाल) के अध्यक्ष और पूर्व मंत्री सिद्दीकुल्लाह चौधरी ने इस स्थिति पर गहरी चिंता और नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा, 'हमें पता चला कि डिवीज़न बेंच आज रात या कल दोपहर 12 बजे तक आदेश पारित करने जा रही है। हम इसका इंतजार कर रहे हैं। हमें उम्मीद है कि कुछ सकारात्मक निकलकर आएगा। लेकिन अगर कुछ नकारात्मक भी आता है, तो मुस्लिम समाज इसका पालन करते हुए त्योहार मनाने की कोशिश करेगा।'

उन्होंने कहा कि, 'मैं यह नहीं कह सकता कि मुसलमान बड़े पशुओं की कुर्बानी नहीं देंगे, वे ऐसा करेंगे क्योंकि एक बड़े पशु से 7 लोग 'कुर्बानी' दे सकते हैं। पुलिस ने बेवजह लोगों को तनाव में डाल दिया है। क्या हम ईद मनाएंगे, नमाज पढ़ेंगे, 'कुर्बानी' देंगे या पुलिस से पिटेंगे? यह बिल्कुल गलत है। हम मुख्यमंत्री से चाहेंगे कि वे इस फैसले की समीक्षा करें और राज्य में हिंदू-मुस्लिम तनाव पैदा न होने दें।'

क्या है पूरा मामला और हाईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने खारिज की याचिकाएं

कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुजय पॉल और न्यायमूर्ति पार्थ सारथी सेन की खंडपीठ ने याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि राज्य सरकार का 13 मई का यह नोटिफिकेशन कोई नया नियम नहीं है। सरकार ने केवल उसी आदेश को लागू किया है जिसे खुद हाईकोर्ट ने साल 2018 में एक निर्देश के जरिए जारी किया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि 2018 का वह आदेश अब अंतिम रूप ले चुका है, इसलिए 13 मई 2026 के पब्लिक नोटिस पर रोक लगाने या उसे रद्द करने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता।

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क्या हैं सरकार के नए कड़े नियम?

पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम (West Bengal Animal Slaughter Control Act) के तहत जारी इस पब्लिक नोटिस में साफ कहा गया है कि:

  • गाय, बैल, बछड़े और भैंसों का वध तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक सक्षम प्राधिकारी द्वारा उनके 'अनफिट' (वध के योग्य) होने का प्रमाण पत्र (Certificate) न दिया जाए।
  • जिन पशुओं को यह सर्टिफिकेट मिलेगा, उनका वध भी केवल सरकार द्वारा अधिकृत और स्वीकृत बूचड़खानों (Authorised Slaughterhouses) में ही किया जा सकेगा।
  • इसके अलावा, पुलिस और प्रशासन को अवैध पशु वध को रोकने के लिए किसी भी परिसर का निरीक्षण और जांच करने का पूरा अधिकार दिया गया है।

TMC विधायक की क्या है दलील?

इस नोटिफिकेशन के खिलाफ कोर्ट पहुंचे तृणमूल कांग्रेस (TMC) के विधायक अखरुज्जमा ने दलील दी थी कि ईद-उल-अज़हा के दौरान पशु बलि एक अनिवार्य धार्मिक प्रथा है। उन्होंने कोर्ट में कहा कि मुस्लिम समुदाय के एक बड़े हिस्से के लिए भैंस या बैल जैसे बड़े पशुओं की कुर्बानी देना ही आर्थिक रूप से व्यावहारिक है। बकरीद के ठीक पहले बकरे और भेड़ों की कीमतें आसमान छूने लगती हैं, जिसे खरीदना सिर्फ अमीर मुसलमानों के बस की बात होती है। ऐसे में बड़े पशुओं पर प्रतिबंध लगाने से गरीब मुसलमान अपनी धार्मिक जिम्मेदारी पूरी नहीं कर पाएंगे।

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सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला

सुनवाई के दौरान कलकत्ता हाईकोर्ट ने देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) के पुराने फैसलों का भी जिक्र किया। बेंच ने याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही अपने निर्णयों में यह तय कर चुका है कि गाय की बलि देना न तो ईद-उल-अज़हा का कोई अनिवार्य हिस्सा है और न ही इस्लाम के तहत यह एक अनिवार्य धार्मिक प्रथा है।

सरकार को 24 घंटे का अल्टीमेटम

अदालत ने यह स्पष्ट किया कि पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम की धारा 12 के तहत राज्य सरकार के पास यह विशेष अधिकार है कि वह धार्मिक उद्देश्यों के लिए वध की छूट (Exemption) दे सकती है। अदालत ने सरकार को निर्देश दिया है कि चूंकि त्योहार इसी महीने की 27 और 28 तारीख को होने की संभावना है, इसलिए सरकार इस छूट की मांग करने वाली याचिकाओं पर अगले 24 घंटे के भीतर एक स्वतंत्र और अंतिम निर्णय ले। अदालत के इस रुख के बाद अब पूरी गेंद राज्य सरकार के पाले में है, जबकि कोलकाता में कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

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