RSS and Secularism: क्या संघ सेकुलर हो गया है?
जहां सोशल मीडिया पर इस्लामिक कट्टरता के जवाब में आक्रामक रुख अपनाने की बात करने वाले हिंदुओं की संख्या बढ़ी है, वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के बयानों से एक उदार हिंदुत्व की झलक मिलती है।

RSS and Secularism: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने पाञ्चजन्य और ऑर्गेनाइजर पत्रिकाओं को दिये गये साक्षात्कार में जिस तरह से समाज के चर्चित मामलों पर टिप्पणी की है उससे बहस छिड़ गयी है कि क्या संघ सेकुलर हो गया है?
भागवत का पूरा साक्षात्कार यदि पढ़ा जाये तो यह स्पष्ट है कि मुस्लिमों से लेकर समलैंगिक संबंधों और हिन्दू अतिवाद पर उन्होंने जो कहा उससे यह पता चलता है कि संघ समय के साथ कदमताल कर रहा है किन्तु इससे उसकी ध्येय यात्रा में वैचारिक भटकाव नहीं आया है।
प्रख्यात अमेरिकी लेखक वाल्टर ने कहा था कि संघ को समझना कठिन है और न समझकर उस पर आरोप लगाना सरल। पिछले 9 दशकों से संघ के साथ यही हो रहा है। नकारात्मक विरोध के स्वर इतने तीव्र हैं कि वे समाज में आई चेतना को ही झुठला देना चाहते हैं। अपनी 9 दशकों की यात्रा में संघ में कई बदलाव हुए किन्तु वैचारिक सोच और हिन्दू हित वहीं का वहीं है। यहां तक कि कोरोना काल से पूर्व दिल्ली के विज्ञान भवन में मोहन भागवत ने जो कुछ कहा, उसी का विस्तारीकरण है वर्तमान साक्षात्कार।
संघ के पूर्व सरसंघचालकों डॉ. हेडगेवार, गुरूजी, बालासाहब देवरस, रज्जू भैया और केएस सुदर्शन के कार्यकाल में भी समय, काल और परिस्थितिजन्य बदलाव हुए हैं और संघ ने उसे खुले दिल से स्वीकार भी किया है। पूर्व में कहे हुए वक्तव्यों को भी उसी कालखंड की परिस्थिति अनुसार वहीं तक सीमित कर दिया है किन्तु इससे ऐसा भ्रम उत्पन्न किया गया मानो संघ अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को छोड़कर हिन्दू हित और समाज एकीकरण से विमुख हो रहा है, जबकि ऐसा बिलकुल नहीं है।
मुस्लिम भारत के ही हैं
संघ ने कभी नहीं कहा कि मुस्लिम इस राष्ट्र के नहीं हैं। वर्तमान से लेकर पूर्व के किसी भी सरसंघचालक ने मुस्लिमों से देश छोड़ने की बात नहीं की। जो लोग गुरूजी की पुस्तक बंच ऑफ थॉट्स (हिंदी में विचार नवनीत) का उदाहरण देते हैं, उन्हें स्पष्ट कर दूं कि वह पुस्तक गुरूजी के वक्तव्यों का संकलन है जो उन्होंने उस समय की परिस्थिति को देखते हुये दिये थे जिसका संकलन संघ प्रचारक और अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख रहे रंगा हरि ने किया था।
उक्त पुस्तक में मुस्लिमों का विरोध उनके बाहरी होने के कारण था जिसमें मुग़ल, लोधी इत्यादि मुस्लिम शासक जो बाहरी थे किन्तु जो हिन्दू धर्म छोड़कर मुस्लिम हुए उन्हें समाज में समरस किये जाने की बात थी। इसी बात को बालासाहब देवरस ने भी कहा कि भारत के मतांतरित मुस्लिमों की पूजा पद्धति भले ही भिन्न हो किन्तु उन्हें समाज से समरस करने का प्रयास किया जाना चाहिए जिसकी परिणति केएस सुदर्शन के कार्यकाल में राष्ट्रीय मुस्लिम मंच की स्थापना तक पहुंची।
वर्तमान में उसी सोच को मोहन भागवत भी आगे बढ़ा रहे हैं। उनका स्पष्ट कहना है कि भारत के मुस्लिम कहीं बाहर से नहीं आये थे। उनके पूर्वज हिन्दू थे जिन्हें बलात अथवा डरा-धमकाकर मुस्लिम बनने को बाध्य किया गया। मोहन भागवत यह भी स्पष्ट करते हैं कि धर्मांतरित मुस्लिमों में स्वयं में श्रेष्ठ होने का भाव छोड़ते हुए हिन्दुओं से साथ समरस होने और साथ चलने का भाव होना चाहिए।
यही बात 1948 में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. जवाहरलाल नेहरू ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में कही थी कि मुस्लिमों को अपनी विरासत और पूर्वजों पर गर्व होना चाहिये। महात्मा गांधी भी इसी सोच के कारण हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई कहते रहे। जब नेहरू और महात्मा गांधी की सोच का विरोध नहीं हुआ तो भागवत के कहे पर विरोध विशुद्ध रूप से राजनीतिक है न की सामाजिक।
समलैंगिकता मानवीय गुण है
मोहन भागवत ने साक्षात्कार में समलैंगिकता को लेकर भी अपने विचार व्यक्त किये। इससे पूर्व किसी सरसंघचालक ने सार्वजनिक रूप से कभी इस मुद्दे पर कुछ नहीं कहा और यदि मोहन भागवत को इस विषय पर बोलने की आवश्यकता पड़ी तो यह स्पष्ट है कि संघ समय के साथ समाज के सभी वर्गों और मानसिकताओं को साथ लेकर चलने में विश्वास करता है। साथ ही समलैंगिकों को भी समाज के साथ चलने पर बल देता है। महाभारत काल में राजा जरासंघ के सेनापतियों हंस और डिंभक के अंतर्संबंधों पर प्रकाश डालते हुये उन्होंने समलैंगिकता को बायोलॉजिकल कहा है।
क्या संघ सेक्युलर हो गया है?
संविधान के भाग 3 के 25वें अनुच्छेद में सेक्युलर एक्टिविटीज अर्थात लौकिक क्रियाकलाप का वर्णन है जिसका अर्थ हुआ ऐसा कृत्य जो लौकिक हो, करने योग्य हो। चूंकि मूल संविधान में सेक्युलर शब्द ही नहीं था तो कालांतर में सेक्युलर एक्टिविटीज को ही सेक्युलर परिभाषित कर दिया गया। हिन्दू पंथनिरपेक्ष है और वर्तमान में सेक्युलर शब्द को इसी सन्दर्भ में समझा जाना चाहिए।
एक समय संघ की आक्रामकता को लेकर बहुत चर्चाएं होती थीं। खासकर राम मंदिर आंदोलन के समय। किन्तु एक बहुत बड़े वर्ग को मोहन भागवत के बयानों से ऐसा लगने लगा है कि संघ अब नरम पड़ गया है अर्थात सेक्युलर हो गया है और हिंदुत्व नेपथ्य में चला गया है। जबकि ऐसा नहीं है।
संघ के विचार में नरम-गरम जैसा कुछ नहीं है। संघ अपने स्थापना काल से ही हिन्दू समाज को मजबूत करने में लगा है और इसमें वह उन मुस्लिमों का भी साथ चाहता है जो हिन्दू से ऐन-केन-प्रकरेण मुस्लिम हुए। यदि यह सोच भी किसी को गलत लगती है तो निश्चित मानिए, संघ के विरोधी वास्तव में बिना पढ़े और जाने ही संघ विरोध पर उतारू हो जाते हैं।
दरअसल, सोशल मीडिया पर एक बड़ा वर्ग जिसकी यह कहकर आलोचना की जाती है कि वह हिन्दू अतिवाद को प्रमुखता देता है। हालांकि इसमें उसकी गलती नहीं है, बस व्याख्या गलत कर दी गई है। देखा जाये तो राजनीति ने भ्रम की जो स्थिति 75 वर्षों से बनाई हुई है और वोट बैंक की राजनीति के चलते मुस्लिमों को हिन्दुओं के बरकस आगे रखा है, उससे हिन्दू क्रोधित है।
हिन्दुओं ने तो सैकड़ों वर्षों तक शारीरिक और मानसिक युद्ध लड़े हैं। तो यदि हिन्दू कुछ मात्रा में अतिवादी तथा प्रतिक्रियावादी हुए दिख रहे हैं तो यह स्वाभाविक है किन्तु इसे उनकी आक्रामकता कहना गलत होगा। हिंदुत्व तो सर्वग्राही है, जीवन-शैली है और इसमें समस्त मानवीय गुणों का समावेश होना निश्चित है।
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संघ भी ऐसे ही हिन्दू समाज का निर्माण करना चाहता है जो दृढ़ हो, स्वाभिमानी हो तथा राष्ट्रहित को प्राथमिकता दे। इसमें आक्रामकता कैसी, अतिवाद कैसा?
यह भी पढ़ें: BJP and RSS: संघ और भाजपा के बीच समन्वय का संकट
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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