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BJP and RSS: संघ और भाजपा के बीच समन्वय का संकट

धारा 370 और राम मंदिर पर मोदी सरकार की पीठ थपथपा रहा संघ, बढ़ती मंहगाई पर सरकार की नाकामी से चिंतित भी है। संघ मोदी सरकार से उम्मीद कर रहा है कि मंहगाई और बेरोजगारी के मोर्चे पर वह कोई ठोस कदम उठाए।

RSS expecting from modi govt concrete steps on inflation and unemployment

BJP and RSS: वर्तमान मोदी सरकार हो या इससे पूर्व की अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार। विपक्ष आमतौर पर इन सरकारों पर हमला करने के लिए संघ की विचारधारा को दोषी ठहराता रहा है। सीधे तौर पर किसी भी भाजपा सरकार के काम काज में हस्तक्षेप न करने वाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस बात को लेकर चिंतित जरूर रहता है कि सरकार की दिशा जन कल्याणकारी दिशा में बनी रहनी चाहिए।

इसलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की जो समन्वय बैठक होती है उसमें भाजपा के संगठन मंत्री भी शामिल होते हैं। एक ऐसी ही समन्वय बैठक इस समय गोवा के नागेशी में चल रही है। यह बैठक 7 जनवरी तक चलेगी। इसमें आरएसएस के सभी वरिष्ठ पदाधिकारियों के अलावा संघ के अनुषांगिक संगठनों के प्रमुख भी रहेंगे जिसमें भाजपा के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष भी शामिल हैं। इस बैठक में संघ विभिन्न विषयों और मुद्दों पर चर्चा करेगा। समान नागरिक संहिता के अलावा संघ बढ़ती महंगाई और जम्मू कश्मीर में उत्तर भारतीयों पर हो रहे हमलों के साथ चीन की घुसपैठ और सीमा सुरक्षा को लेकर भी चिंतन मनन करेगा।

उल्लेखनीय है कि 2 अक्टूबर 2022 को देश में गरीबी, महंगाई और बेरोजगारी की स्थिति से जुड़े कुछ परेशान करने वाले आंकडों पर पहली बार टिप्पणी करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोल ने लोगों का ध्यान खींचा था। इसके तीन दिन बाद, संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी पंरपरागत विजयादशमी संबोधन में उन्ही मुद्दों को छुआ, लेकिन उन्होंने अपनी बात युवाओं को नौकरी की चाहत रखने के बजाय नौकरी देने वाला उद्यमी बनने के लिए प्रोत्साहित करने के व्यापक संदर्भ में की।

पिछले साल सितंबर में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में संघ की व्यापक अखिल भारतीय समन्वय बैठक हुई थी, जिसमें विभिन्न कार्यक्रम तय किए गए थे। गोवा की इस बैठक में उनकी समीक्षा की जा रही है। संघ के प्रचार प्रमुख सुनील अंबेकर का कहना है कि यह बैठक औपचारिक बैठक के रूप में नहीं, अपितु अनौपचारिक चर्चा के रूप में आयोजित की गयी है।

हालांकि संघ भी अदंरखाने इस बात को मानता है कि रोजगार सृजन और बढ़ती महगांई को रोकना मोदी सरकार के सामने खड़ी सबसे कठिन चुनौतियों में से एक है। संघ के जमीनी स्तर के स्वयंसेवकों ने बढ़ती महगाई और बेरोजगारी पर संघ की राष्ट्रीय टीम का ध्यान खींचा है और इसे केन्द्र सरकार तक पहुंचाने का आग्रह किया है।

गौरतलब है कि संघ ने देश में गरीबी की तुलना 'सामने खड़े दानव' से की है। रोजगार और स्वरोजगार के अवसर पैदा करने के लिए संघ के अनुषांगिक संगठन स्वदेशी जागरण मंच की ओर से स्वावलंबी भारत अभियान के अंतर्गत आयोजित वेबिनार में होसबाले ने कहा था कि 'यह महत्वपूर्ण है कि हम इस राक्षस को खत्म करें। लगभग 20 करोड़ लोगों का अभी भी गरीबी रेखा से नीचे होना ऐसा आंकड़ा है जिससे हमें बहुत दुखी होना चाहिए। 23 करोड़ लोगों की रोजाना कमाई 375 रूपये से भी कम है।'

असमानता और व्यापक बेरोजगारी पर संघ के सरकार्यवाह की टिप्पणी वास्तविकता का सामना करने जैसी थी। उन्होंने तर्क दिया कि भारत की शीर्ष एक प्रतिशत आबादी के पास देश की कुल आय का पांचवा हिस्सा जो 20 प्रतिशत है जबकि निचले पचास प्रतिशत के पास कुल आय का केवल 13 प्रतिशत है। नौकरियों के संकट पर संघ नेता ने कहा था कि 'देश में चार करोड़ लोग बेरोजगार है। श्रम सर्वेक्षण के अनुसार, बेरोजगारी दर 7.6 प्रतिशत है। लेकिन मोदी सरकार ने इन निष्कर्षो को स्वीकार करने से साफ इंकार कर दिया था। भाजपा नेताओं का तर्क है कि बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी पर मोदी का पूरा ध्यान है और मोदी खुद भी इससे असहज होने के कारण इन चुनौतियों का जिक्र अपने भाषणों में कर चुके है।

संघ के अलावा उसके जो आनुषांगिक संगठन हैं जैसे स्वदेशी जागरण मंच, भारतीय मजदूर संघ और भारतीय किसान संघ उनकी भी मोदी सरकार से पटरी नहीं बैठ रही है। मोदी सरकार के ज्यादातर निर्णयों से भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ और स्वदेशी जागरण मंच सहमति नहीं रखते है लेकिन फिलहाल उन्होंने चुप्पी साध रखी है।

गोवा की इस बैठक में इन अनुषांगिक संगठनों के पदाधिकारी खुलकर अपनी बात रखने वाले हैं। इन संगठनों की प्रमुख आपत्ति है कि सरकार की योजनाओं में इनके सुझावों को उचित महत्व नहीं दिया जाता है और इनके सुझावों को सरकार खारिज कर देती है। ऐसे में इन संगठनों का मानना है कि अपनी ही सरकार के साथ तालमेल कैसे बिठाया जाए यह समझ में नहीं आ रहा है। विकसित देशों के साथ नए मुक्त व्यापार समझौते, न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसलों की खरीद प्रक्रिया और श्रम संहिता के कई प्रावधानों आदि पर दोनों पक्षों में गंभीर मतभेद हैं।

गोवा की बैठक में भाजपा और संघ के बीच समन्वय को मजबूत करने को लेकर भी संघ चर्चा करेगा। संघ का आकलन है कि 2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद संघ और भाजपा के बीच समन्वय और विचार विमर्श के लिए नियमित अंतराल से बैठक होनी शुरू हुई थी लेकिन बाद में इस प्रक्रिया पर पूर्ण विराम लग गया। हालाकि संघ का यह भी मानना है कि कोरोना के कारण भी इन बैठकों पर विराम लग गया था लेकिन कोरोना प्रोटोकाल खत्म होने के बाद भी संघ और भाजपा के बीच समन्वय सुचारू रूप से शुरू नहीं हो सका।

मोदी के पहले कार्यकाल में संघ के सहयोगी संगठनों और भाजपा के बीच तालमेल के लिए समन्वय समिति बनाई गई थी। तत्कालीन पार्टी प्रमुख अमित शाह की अध्यक्षता में समिति की बैठकों में केन्द्रीय मंत्री भाग लेते थे। संघ चाहता है कि मोदी सरकार के मंत्री संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों और अनुषांगिक संगठनों के प्रमुखों से संपर्क में रहे और नियमित रूप से उनके साथ जानकारियां साझा करें और उनकी राय लें। आरएसएस के एक शीर्ष नेता का कहना है कि 'हम सरकार के विवेक रक्षक है' हम उनके कार्यालयों का सूक्ष्म प्रबंधन नहीं करते, बल्कि बहुत से दूसरे लोगों की तरह हम भी केवल सलाह देते हैं।'

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    संघ की इस समन्वय बैठक में कोई राजनीतिक चर्चा नहीं होगी लेकिन संघ से मिले फीडबैक पर भाजपा 16 और 17 जनवरी को दिल्ली में होने वाली भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में चर्चा कर सकती है।

    यह भी पढ़ें: Rahul Gandhi Yatra: भारत जोड़ो या मोदी विरोधी जोड़ो यात्रा?

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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