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क्‍या पूंजी वितरण की असमानता भारत की प्रगति को प्रभावित कर रही है?

समृद्ध हो रहे भारत के दावे के समय राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्रातेय होसबोले ने गरीबी, बेरोजगारी और असमानता पर चिंता जाहिर करते हुए एक जरूरी विमर्श पर देश का ध्‍यान खींचा है। जाहिर है, दोनों दावे अपनी जगह पर सही हैं, और एक दूसरे के विपरीत भी। देश अमीर हो रहा है, लेकिन एक बड़ी आबादी की आय नहीं बढ़ रही है। ये विरोधाभास चौंकाता नहीं है बल्कि पूंजी एवं संपदा के असमान वितरण की वजह से समाज में पैदा होने वाली विसं‍गतियों का उदाहरण पेश करता है।

Rising inequality major challenge for Indias progress

होसबोले ने कहा कि देश की पूर्ववर्ती सरकारों की दोषपूर्ण आर्थिक नीतियों के चलते भारत में 20 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं और 23 करोड़ आबादी की एक दिन की आय 375 रुपये से कम है। गरीबी के अलावा असमानता एवं बेरोजगारी बड़ी चुनौती है। होसबोले का बयान इस मायने में और महत्‍वपूर्ण हो जाता है, जब कांग्रेस के नेता राहुल गांधी महंगाई, बेरोजगारी और अमीरी-गरीबी की बढ़ती खाई को लेकर केंद्र की मोदी सरकार पर हमलावर हैं और भारत जोड़ो यात्रा निकाल रहे हैं।

बेरोजगारी के कारण गरीबी की समस्या

वर्ष 2011-12 में भारत में गरीबों की संख्‍या 26 करोड़ 97 लाख थी, जो देश की कुल आबादी का 21.92 फीसदी थी। ग्रामीण क्षेत्र में 27.50 फीसदी एवं शहरी क्षेत्र में 13.70 फीसदी गरीब निवास कर रहे थे। इसके बाद के गरीबी के नये आंकड़ों का इंतजार है। लेकिन सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्‍यों है कि भारत बीते तीन दशक में विश्‍व की छठवीं अर्थव्‍यस्‍था बनने के बावजूद बड़ी आबादी के पास सभ्‍य जीवन जीने लायक पूंजी नहीं मुहैया नहीं करा पा रहा है? इसके विपरीत मुट्ठीभर भारतीय पूंजीपतियों के हाथों में देश की अर्थव्‍यवस्‍था को नियंत्रित करने की ताकत आ चुकी है?

पूंजी एवं संपदा के असमान वितरण ने नागरिकों के समान आर्थिक विकास को प्रभावित किया है। अवसर एवं आय की असमानता कल्‍याणकारी राज्‍य की सबसे बड़ी चुनौती है। यह मौलिक तथ्‍य है कि कोई भी कल्‍याणकारी राज्‍य अपने नागरिकों में कोई भेदभाव नहीं करता और ना ही किसी एक वर्ग के कल्‍याण को नजरंदाज कर दूसरे को आगे बढ़ाने में मदद करता है, फिर भी सवाल है कि भारत जैसे कल्‍याणकारी राज्‍य में अमीर और गरीब के बीच की खाई क्‍यों बढ़ती जा रही है? आय, अवसर एवं पूंजी की बढ़ती असमानता के लिये जिम्‍मेदार कौन है?

पूंजीवाद और असमानता

दरअसल, उदारीकरण एवं मुक्‍त बाजार से कुछ हद तक गरीबी घटाने में भारत को सफलता मिली है, लेकिन इस कालखंड में आर्थिक वृद्धि से पूंजी वितरण में होने वाली असमानता को नजरंदाज कर दिया गया। देश की जीडीपी बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ बेरोजगारी एवं असमानता भी। देश में अरबपतियों की संख्‍या तेजी से बढ़ी है, दूसरी तरफ बड़ी आबादी के पास अपनी न्‍यूनतम आवश्‍यकता को पूरा करने लायक आय नहीं है।

यह भी पढ़ें: करोड़ों भारतीयों की आस्था और अर्थव्यवस्था का आधार गौ माता संकट में

भारत में पूंजी असमानता का असर कोविड-19 महामारी के दौरान देखा गया। लॉकडाउन एवं इकोनॉमी ब्रेकडाउन में 84 फीसदी परिवारों की आमदनी घटी, लेकिन इसी कालखंड में अरबपतियों की संख्‍या 102 से बढ़कर 142 हो गई। तीन दशक से लागू कथित आर्थिक सुधारों से देश में असमानता ज्‍यादा बढ़ी है। 90 दशक में दुनिया के अरबपतियों की फोर्ब्‍स सूची में एक भी भारतीय नहीं था। 2009 में 9 भारतीय शामिल हुए और 2022 में फोर्ब्‍स की सूची में 166 भारतीय हैं।

देश मजबूत हो रहा है, लेकिन नागरिक कमजोर हो रहे हैं

राष्‍ट्र के तौर पर भारत एक मजबूत आर्थिक ताकत बन रहा है। देशों के स्‍तर पर तुलना करें तो भारत यूरोपीय देशों के करीब पहुंच रहा है, लेकिन देश के भीतर की असमानता की बात करें तो यह और गहराती जा रही है। आय एवं पूंजी के असमान वितरण में भारत दूसरे देशों के मुकाबले एक अलग उदाहरण है। नीचे की 50 फीसदी आबादी की प्रति व्‍यक्ति सालाना आय 53,610 रुपये है, जबकि शीर्ष 10 फीसदी आबादी इसका 20 गुना ज्‍यादा पाती है। इस कारण बढ़ती असमानता एक बड़े वर्ग में निराशा बढ़ा रही है। पेरिस स्‍कूल ऑफ इकोनॉमिक्‍स के वर्ल्‍ड इनिक्‍वेलिटी लैब द्वारा 36 वर्ष के वैश्विक आंकड़ों के आधार पर तैयार विश्‍व असमानता रिपोर्ट -2018 भारत की असमानता पर प्रकाश डालती है।

रिपोर्ट के अनुसार 2014 में भारत के शीर्ष एक फीसदी अमीरों के पास राष्‍ट्रीय आय की 22 फीसदी हिस्‍सेदारी थी, जो 2017 में बढ़कर 58 फीसदी हो गई। इसी तरह 2014 में देश के 10 फीसदी अमीरों के पास राष्‍ट्रीय आय की 56 फीसदी हिस्‍सेदारी थी, जो 2017 में बढ़कर 77 फीसदी तक पहुंच गई। ये आंकड़े मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाते हैं।

देश के शीर्ष 0.1 फीसदी सबसे अमीर लोगों की कुल संपदा बढ़कर नीचे के 50 फीसदी उन लोगों की संपदा से अधिक हो गई है, जिनके पास राष्‍ट्रीय आय का मात्र 13 फीसदी है। कोविड-19 महामारी के दौरान भारत के अरबपतियों की पूंजी 23.14 लाख करोड़ हो गई, जो देश के बजट के आधे से ज्‍यादा है।

संपत्ति वितरण में असमानता भारत की सामाजिक व्‍यवस्‍था के लिये मुश्किल चुनौती है। राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो भारत में एक परिवार के पास औसतन 10 लाख रुपये की संपत्ति का आंकड़ा बताया जाता है, लेकिन नीचे के 50 फीसदी से ज्‍यादा लोगों की औसत संपत्ति 66 हजार रुपये मूल्‍य के आसपास है यानी भारत के सामान्‍य औसत का केवल छह फीसदी।

रिपोर्ट बताती है कि भारत में असमानता की वर्तमान स्थिति आजादी के तीन दशक बाद वाली स्थिति से बिल्‍कुल उलट है। तब भारत के नीचे की 50 फीसदी लोगों की आमदनी राष्‍ट्रीय औसत से ज्‍यादा थी। भविष्‍य में लोगों की प्रति व्‍यक्ति आय सरकारी आंकड़ों में पहले से ज्‍यादा दिखेगी, लेकिन हकीकत में पूंजी चुनिंदा लोगों के समूह तक सीमित रहेगी।

प्रति व्‍यक्ति आय में बढ़ोतरी के बावजूद देश की आबादी का एक बड़ा हिस्‍सा दैनिक जरूरतों की पूरी करने के लिये संघर्ष करेगा। उसके पास सहज एवं सरल जीवन स्‍तर लायक पूंजी नहीं होगी। "देश में चल रहे असमान आर्थिक सुधारों से पूंजी का बड़ा हिस्‍सा कुछ लोगों तक सीमित होगा, बड़ी आबादी छोटी पूंजी पर निर्भर रहेगी। पूंजी पर सरकार का नियंत्रण भी न्‍यूनतम हो जायेगा।"

शहरीकरण से बढती असमानता

पूंजी एवं संपदा असमानता का एक बड़ा कारण भारत के आर्थिक एवं औद्योगिक विकास का शहरोन्‍मुख हो जाना रहा है। नब्‍बे के दशक से पहले भारत की बड़ी आबादी के आय का साधन कृषि और उससे जुड़े व्‍यवसाय रहा है, लेकिन उदारीकरण के बाद निजी क्षेत्र के उद्योगों ने कृषि क्षेत्र के विकास को बाधित किया। किसान वर्ग मजदूर बनने शहर में पलायन कर गया। भारत उन देशों में शामिल है, जहां असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों की संख्‍या अत्‍यधिक है। संगठित क्षेत्र में भी आय का अंतर अभूतपूर्व ढंग से बढ़ा है।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने अपर्याप्‍त वेतन, वेतन का अंतर तथा काम करने की परिस्थिति और गैरसमावेशी बढ़ोतरी को भारत के लिये बड़ी चुनौती माना है। ज्‍यादातर संस्‍थानों में आय एवं पूंजी वितरण की असमानता है। एक सीईओ का वेतन करोड़ों में है, वहीं कर्मचारी 15 से 20 हजार रुपये प्रतिमाह पर काम कर रहे हैं। कुछ निजी कंपनियों में वेतन असमानता एक हजार फीसदी तक है। अन्‍य विकसित एवं विकासशील देशों के मुकाबले भारत में पूंजी-संपदा एवं आय में असमानता असमान्‍य ढंग से ज्‍यादा है। असमानता लोकतंत्र को भी प्रभावित करती है इसलिये जनता के वोट से बननेवाली सरकारों को चाहिए कि इस बढती असमानता पर समय रहते अंकुश लगायें।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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