TMC में बगावत के बीच ममता का बड़ा दांव,क्या INDIA गठबंधन बनेगा सहारा? या दीदी का आखिरी उम्मीद भी होगी खत्म
TMC Crisis (Mamata Banerjee): पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय जबरदस्त उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) अपने 28 साल के इतिहास के सबसे बड़े अंदरूनी संकट का सामना कर रही है। एक तरफ पार्टी के भीतर बगावत का दायरा बढ़ता जा रहा है, तो दूसरी तरफ ममता बनर्जी राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका को मजबूत करने की कोशिश में जुटी हैं। ऐसे में 8 जून को दिल्ली में होने वाली INDIA गठबंधन की बैठक पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह बैठक सिर्फ विपक्षी दलों की रणनीति तय करने का मंच नहीं है, बल्कि ममता बनर्जी के लिए अपनी राजनीतिक पकड़ और नेतृत्व क्षमता दिखाने का भी बड़ा मौका है। सवाल यह है कि क्या INDIA गठबंधन उनके लिए संकटमोचक बनेगा या फिर यह दांव भी फेल हो जाएगा?

🔷दिल्ली दौरा क्यों है अहम?
ममता बनर्जी रविवार को दिल्ली पहुंच रही हैं और मंगलवार तक राजधानी में रहेंगी। उनके भतीजे और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी पहले ही दिल्ली पहुंच चुके हैं। यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब विधानसभा चुनाव में झटके और पार्टी के भीतर असंतोष ने नेतृत्व पर दबाव बढ़ा दिया है।
एक वरिष्ठ TMC नेता के हवाले से कहा गया है,"ममता बनर्जी इस समय पार्टी के भीतर अपनी पकड़ मजबूत करने और राष्ट्रीय राजनीति में अपनी विश्वसनीयता दोबारा स्थापित करने की कोशिश कर रही हैं।" यानी दीदी के सामने चुनौती सिर्फ संगठन को संभालने की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने की भी है।
🔷सोनिया गांधी से मुलाकात की अटकलें
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ममता बनर्जी अपने दिल्ली दौरे के दौरान कांग्रेस संसदीय दल की प्रमुख सोनिया गांधी से मुलाकात की संभावना भी तलाश रही हैं। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इस संभावित मुलाकात की चर्चा इसलिए भी हो रही है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस और TMC के रिश्तों में काफी तल्खी देखने को मिली थी। विपक्षी राजनीति के नेतृत्व को लेकर दोनों दल कई बार आमने-सामने आ चुके हैं।
एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा,
"जब ममता बनर्जी राजनीतिक रूप से मजबूत स्थिति में थीं, तब उन्होंने कांग्रेस के बारे में खुलकर अपनी बातें कहीं थीं।" उन्होंने आगे कहा,"उन्होंने INDIA गठबंधन की कमान कांग्रेस से लेने की कोशिश भी की थी और राहुल गांधी की आलोचना भी की थी। अब अगर उनके लिए मुश्किल समय आया है तो इसका मतलब यह नहीं कि कांग्रेस सब कुछ भूलकर उनके सबसे करीबी साथी की तरह खड़ी हो जाएगी।"
🔷संगठन में बदलाव के पीछे क्या है रणनीति?
हाल ही में ममता बनर्जी ने पार्टी संगठन में बड़ा बदलाव किया है। अभिषेक बनर्जी को राष्ट्रीय महासचिव पद पर बरकरार रखा गया है, लेकिन राज्यसभा सांसद डेरेक ओ'ब्रायन और डोला सेन को संयुक्त राष्ट्रीय सचिव बनाया गया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह कदम पार्टी के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया को अधिक सामूहिक बनाने और नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवालों को शांत करने की कोशिश है। लंबे समय से पार्टी के भीतर यह चर्चा थी कि निर्णय लेने की शक्ति सीमित दायरे में केंद्रित हो गई है।
🔷58 विधायकों की बगावत ने बढ़ाई चुनौती
TMC की मुश्किलें तब और बढ़ गईं जब 58 विधायकों ने बगावत का रास्ता चुन लिया। इन विधायकों ने पार्टी की विधायी इकाई पर नियंत्रण स्थापित करते हुए निष्कासित नेता रितब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता चुन लिया। 1998 में पार्टी की स्थापना के बाद यह पहला मौका माना जा रहा है जब TMC को इतने बड़े स्तर पर अंदरूनी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। यही कारण है कि संगठनात्मक फेरबदल को सीधे इस बगावत से जोड़कर देखा जा रहा है।
🔷ममता की भूमिका पर भी मतभेद
दिलचस्प बात यह है कि बागी खेमे के भीतर भी ममता बनर्जी की भूमिका को लेकर एकमत राय नहीं है। रितब्रत बनर्जी ने कथित तौर पर सुझाव दिया कि ममता बनर्जी को पार्टी का मुख्य सलाहकार बनाया जा सकता है। लेकिन कई विधायकों ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताई।
बागी विधायक गुलशन मुल्लिक ने कहा,
"नेता और सलाहकार दोनों अलग-अलग भूमिकाएं हैं। नेता वह होता है जिसे सभी लोग संरक्षक और सर्वोच्च मार्गदर्शक मानते हैं। यदि ममता बनर्जी को सर्वोच्च नेता की जगह केवल सलाहकार बनाया जाता है, तो हमें पूरे मामले पर दोबारा विचार करना पड़ेगा।"
वहीं विधायक संगीता रॉय बसुनिया ने कहा, "ममता बनर्जी हमारी सर्वोच्च नेता हैं और हमेशा रहेंगी। उन्हें सलाहकार की भूमिका में नहीं रखा जा सकता। वह हमारी नेता हैं।"
इन बयानों से साफ संकेत मिलता है कि बागी खेमे में भी ममता बनर्जी की स्वीकार्यता बनी हुई है, लेकिन विवाद नेतृत्व के संचालन और शक्ति संतुलन को लेकर है।
🔷अभिषेक बनर्जी पर बढ़ता दबाव
रिपोर्टों के मुताबिक, मौजूदा बगावत का मुख्य केंद्र ममता बनर्जी नहीं, बल्कि अभिषेक बनर्जी हैं। कई विधायक और नेता पार्टी के भीतर मौजूदा शक्ति संरचना से असहज बताए जा रहे हैं। यही वजह है कि नेतृत्व में संतुलन और अधिकारों के विकेंद्रीकरण की मांग लगातार तेज हो रही है। संगठन में हाल में हुए बदलावों को भी इसी दबाव का परिणाम माना जा रहा है।
🔷मुस्लिम विधायकों को साधने की कोशिश
TMC के 80 विधायकों में 31 मुस्लिम विधायक हैं और यह समूह पार्टी के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन बगावत के बाद यह वर्ग भी दो हिस्सों में बंटता दिखाई दे रहा है। कुछ मुस्लिम विधायक बागी गुट के साथ चले गए हैं, जबकि फिरहाद हकीम और बाबर अली जैसे नेता अब भी ममता बनर्जी के साथ मजबूती से खड़े हैं। बताया जा रहा है कि ममता इन नेताओं के जरिए पार्टी के भीतर बढ़ी दूरियों को कम करने की कोशिश कर रही हैं।
🔷क्या संसद तक पहुंच सकती है बगावत?
TMC नेतृत्व की सबसे बड़ी चिंता यह है कि विधानसभा में शुरू हुआ असंतोष कहीं संसद तक न पहुंच जाए। एक वरिष्ठ TMC सांसद ने कहा, "लोकसभा में TMC के 28 सांसद हैं। अभिषेक बनर्जी को संसदीय दल के नेता पद से हटाने के लिए 19 सांसदों के समर्थन की जरूरत होगी और यह संख्या 20 के पार भी जा सकती है।" अगर ऐसा होता है तो यह संकट सिर्फ पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में TMC की स्थिति पर भी असर डाल सकता है।
🔷क्या INDIA गठबंधन ममता को देगा नई ताकत?
दिल्ली में होने वाली INDIA गठबंधन की बैठक ममता बनर्जी के लिए केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है। यह उनके नेतृत्व, संगठन पर नियंत्रण और राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव की परीक्षा भी है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ममता बनर्जी पार्टी के भीतर बढ़ती नाराजगी और बगावत को रोक पाएंगी या फिर TMC का संकट और गहराता जाएगा। आने वाले कुछ दिन न सिर्फ बंगाल की राजनीति, बल्कि पूरे विपक्षी खेमे के भविष्य की दिशा तय करने वाले साबित हो सकते हैं।














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