Repo Rate Increase: मिडिल क्लास की लड़ाई, EMI और महंगाई
इस वित्तीय वर्ष में यह पांचवां मौका है जब रिजर्व बैंक ने रेपो रेट बढ़ाया है। रिजर्व बैंक का मानना है कि महंगाई से लड़ने के लिए यह जरुरी है। ऐसे में शहरी मध्यवर्ग बहुत परेशान है कि वह महंगाई से लड़े या बढ़ती हुई EMI से?

Repo Rate Increase: रिजर्व बैंक कहती है कि महंगाई कम करना बहुत जरुरी है इसलिये रेपो रेट बढ़ा रहे हैं। शहरी वर्ग को लग रहा है कि महंगाई से तो राहत मिल नहीं रही है उल्टे उनकी ईएमआई की किश्त बढ़ रही है। यह दर्द भी शहरी वर्ग को ज्यादा इसलिए है क्योंकि सब कुछ बाहर से खरीद कर ही लाता है। वह खेती नहीं करता है या वह कस्बे में नहीं है कि सीधे किसान से खरीद ले। उसे सब्जी, नमक, तेल सब खरीदना पड़ता है। इसलिए जिस महंगाई को कम करने के लिए किश्त की मार बढ़ाई जा रही है वह बूमरैंग कर उसी को चोट पहुंचा रही है।
बैंकों की रिपोर्ट आई कि लोन का एक्सपोजर बढ़ गया है, मतलब लोगों ने ज्यादा लोन लिया है। क्यों लिया है? क्यूंकि तब रेपो रेट 4 फीसदी था, लोन सस्ता था, इसलिए ले लिया। अब वह चौंका हुआ है। वह समझ नहीं पा रहा है कि इस बढ़ी हुई किश्त को वह महंगाई के प्रभाव के रूप में स्वीकार करे या शेष भारत को महंगाई से निजात दिलाने के लिए अपने त्याग के रूप में संतोष करे?
बढ़ती महंगाई से चिंतित भारतीय रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में अब तक 2.25 फीसदी की बढ़ोत्तरी कर 4 फीसदी से 6.25 फीसदी तक पहुंचा दिया है। इसका मतलब सिर्फ 2.25 फीसदी की बढ़ोतरी नहीं है। 4 प्रतिशत के मुकाबले इफेक्टिव बढ़ोतरी 56.25 फीसदी हुई है।
रिजर्व बैंक द्वारा मॉनिटरी पॉलिसी की मीटिंग हर दो महीने के अंतर पर की जाती है। इस साल पहली मीटिंग अप्रैल में हुई और रिजर्व बैंक ने रेपो रेट को 4 फीसदी पर ही रोके रखा। बाद में रिजर्व बैंक ने दो माह से पूर्व ही इमरजेंसी मीटिंग बुलाकर इसे 4.40 फीसदी कर दिया। तीसरी मीटिंग में फिर रेपो रेट में 0.50 फीसदी का इजाफा किया। अब रेपो रेट 4.90 फीसदी हो गई। फिर अगस्त में इसे 5.40 किया, सितंबर में 5.90 किया और आज यह 6.25 फीसदी तक पहुंच गई।
ब्याज दरों पर फैसला लेने के लिए 5 दिसंबर से ही मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी की मीटिंग चल रही थी और बुधवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में ब्याज दरों से जुड़ी घोषणा हुई। यह बढ़ोत्तरी बढ़ती महंगाई के साथ गिरते रूपये और अमेरिका के फ़ेडरल बैंक द्वारा लगातार ब्याज दर बढ़ाये जाने की पृष्ठभूमि में भी हो रहा है। इस पृष्ठभूमि के कारण जो रेपो रेट की 4 फीसदी से लेकर 6.25 फीसदी की जो यात्रा है उसके पीछे रिजर्व बैंक गवर्नर की कुछ चिंताएं है। इसे उन्होंने बैठक में व्यक्त भी किया। उनकी चिंता मंहगाई को लेकर है।
मॉनिटरी पॉलिसी के 6 में से 4 सदस्य अकोमोडेटिव रुख वापस लेने के पक्ष में थे। उनका कहना था अगले 12 महीने तक महंगाई 4 फीसदी से ऊपर ही रहने की संभावना है। आज भी महंगाई अपने तय लक्ष्य से ऊपर है और ऊपर ही रहने के आसार हैं। FY23 में महंगाई दर का अनुमान 6.7 फीसदी लग रहा है। हालांकि ग्रामीण मांग में सुधार देखने को मिल रहा है और बैंक क्रेडिट भी 8 महीने से डबल डिजिट में है। गवर्नर ने यह भी कहा कि महंगाई के खिलाफ लड़ाई जारी रहेगी, जिसका अन्तर्निहित सन्देश यह है कि एक और बढ़ोतरी होगी।
महंगाई की चेतावनी के बाद भी रिजर्व बैंक ने अगर 0.50 फीसदी की जगह 0.35 फीसदी की बढ़ोत्तरी की है तो इसका मतलब उसे बढ़ रही बेचैनी का भी अंदाजा है। इस महीने की शुरुआत में मॉनेटरी पॉलिसी में रेपो रेट की संभावित वृद्धि को देखते हुए, भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) ने रिजर्व बैंक से पहले ही गुजारिश की थी कि वह ब्याज दर बढ़ाने की गति धीमी करे। उसने पहले ही चेता दिया था कि अब तक हुई ब्याज दर में 1.9 फीसदी की बढ़ोत्तरी फायदे की जगह उन्हें नुक्सान पहुंचा रहा है।
अगर ऊपर बताई गई बातें और ब्याज दर बढ़ना एक समस्या बन रहा है तो यह सवाल आता है कि रिजर्व बैंक ऐसा क्यों कर रहा है ? इस सवाल का जबाब जानने की कोशिश करते हैं। दरअसल ब्याज दरों और मुद्रास्फीति एक ही दिशा में बढ़ते हैं। यदि मुद्रास्फीति बढ़ती है तो पीछे पीछे इससे मुकाबला करने के लिए ब्याज दर बढ़ती है। यदि मुद्रास्फीति घटती है तो ब्याज दर घटना शुरू कर देती है। यह चक्र है और चलता रहता है।
रेपो रेट का इस्तेमाल मुद्रास्फीति का प्रबंधन करने के लिए दुनिया भर के केंद्रीय बैंक प्राथमिक उपकरण के रूप में करते हैं। सामान्य तौर पर, उच्च ब्याज दर बढ़ती मुद्रास्फीति के लिए एक नीतिगत प्रतिक्रिया होती हैं। इसके विपरीत, जब मुद्रास्फीति गिर रही होती है और आर्थिक विकास धीमा हो रहा होता है, तो केंद्रीय बैंक अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने के लिए ब्याज दरों को कम कर देते हैं। इससे अर्थव्यवस्था में मुद्रा का प्रवाह बढ़ जाता है। ऋण का ब्याज सस्ता हो जाता है। लोग ऋण लेना शुरू कर देते हैं। जमा पर ब्याज कम हो जाता है तो लोग बैंक में जमा करने की जगह अन्य जगह निवेश करने लगते हैं। इससे बाजार में मुद्रा की मात्रा और चलन बढ़ जाता है। इसी कारण जब मुद्रास्फीति बढ़ती है तो बाजार से मुद्रा को बाहर कर वापस बैंक में लाने के लिये केंद्रीय बैंक ब्याज दर बढ़ा देते हैं और यदि मुद्रा स्फीति घटती है तो उसका पीछा करते हुए ब्याज दर घटा देते हैं।
ऋण की लागत में वृद्धि कर रिजर्व बैंक उपभोक्ता और व्यावसायिक खर्च को हतोत्साहित करता है। विशेष रूप से लोग आवास, गाड़ी और पूंजीगत उपकरण जैसी सामान्य वित्तपोषित बड़ी-टिकट वाली वस्तुओं को खरीदने से परहेज करने लगते हैं। बैंकों के जमा पर ब्याज बढ़ जाता है तो लोग जमा करने लगते हैं। कम लोन लेने और ज्यादा जमा करने से बाजार में मुद्रा की मात्रा घट जाती है जिससे मुद्रा स्फीति गिर जाती है और महंगाई कम होती है। यही कारण है कि रिजर्व बैंक व्यावहारिक फॉर्मूले की जगह इसी गणितीय फॉर्मूले से देश की महंगाई को नियंत्रित कर रहा है। इस कारण एक तरफ तो आंकड़ों में कुछ राहत की उम्मीद है लेकिन शहरी मध्यवर्ग हर बार की तरह इस बार भी परेशान हो गया है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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