Rajasthan Politics: चेहरों की राजनीति में निखरते-बिखरते चेहरे!

Rajasthan Politics: राजस्थान की राजनीति में चेहरों की जंग है। कहीं पर चेहरे की जगह कमल खिल रहा है, तो कुछ के चेहरे का रंग बदरंग है। किसी के चेहरे पर हवाईयां उड़ रही हैं, तो कोई अपना सा चेहरा लिए घूमने को मजबूर है। कुछ चेहरों पर कालिख पुत रही है, तो कोई चेहरा दमक रहा है, कोई चमक रहा है और कोई गुलाबी से काला पड़ता जा रहा है। सुर्ख चेहरों की लाली का नूर फीका पड़ रहा है और फीके चेहरों पर मीठी मुस्कान बिखर रही है। ये चेहरे कुछ कांग्रेस के मंत्रियों, विधायकों और नेताओं के हैं, तो कुछ बीजेपी के भी बड़े चेहरे हैं।

बीजेपी में वसुंधरा राजे इस चुनाव में साफ तौर पर सामने नहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भले ही कह दिया हो कि इस चुनाव में कमल ही चेहरा है। लेकिन वास्तव में देखें, तो चेहरा तो नरेंद्र मोदी ही हैं, कमल तो केवल प्रतीक है। वोट कमल को नहीं, मोदी को मिलते हैं। चेहरा अगर महारानी के नाम से मशहूर वसुंधरा राजे का होता, तो लोग पसंद भी करते, क्योंकि राजस्थान में प्रधानमंत्री मोदी के बजाय महारानी ही खिलता हुआ चेहरा है, कमल की तरह। जनता मोदी को राजस्थान का चेहरा नहीं, देश का चेहरा मानती है। प्रदेश की जनता में अपनी पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का नाम सबसे ऊपर होने के बावजूद उनके बिना कमल खिलाने की मोदी की कोशिश कितनी सफल होती है, इस पर सबकी नजर है।

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हालांकि विपक्ष के नेता राजेंद्र सिंह राठौड़ की उम्र 68 की होने के बावजूद उनके चेहरे पर नूर चमक रहा है तो पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया के चेहरे की लाली भी निखर रही है। इनके उलट राज्यवर्धन सिंह राठौड़ और देवजी पटेल के चेहरों का रंग उड़ा हुआ है। दोनों सांसदों को विधानसभा की उम्मीदवारी दिये जाने के बाद से उनके इलाके में ही दोनों का जबरदस्त विरोध हो रहा है।

तीन बार के सांसद देवजी पटेल को उनके गृह नगर सांचोर से विधानसभा का उम्मीदवार बनाते ही उनके खिलाफ विरोध का फव्वारा फट पड़ा है। उनकी अपनी ही पार्टी बीजेपी के कार्यकर्ताओं द्वारा धक्का मुक्की से लेकर उनकी गाड़ी के कांच तक फोड़े गए हैं। सांचोर में जीवाराम चौधरी और दानाराम चौधरी सहज उम्मीदवार थे, लेकिन देवजी ने पार्टी की उम्मीदवारी स्वीकारी तो विरोध तो होना ही था। अब देवजी की जीत पर खतरा मंडरा रहा है।

उधर, पूर्व केंद्रीय मंत्री और वर्तमान सांसद कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को झोटवाड़ा से उम्मीदवार बनाया गया, तो पहले से ही वहां के दमदार नेता तथा पूर्व मंत्री राजपाल सिंह शेखावत के समर्थकों ने 'कर्नल कहना मान ले, बोरियां बिस्तर बांध ले" के नारों से विरोध शुरू कर दिया है। कल तक राज्यवर्धन के भी कार्यकर्ता ये ही थे, लेकिन उम्मीदवारी मिलने के बाद राज्यवर्धन स्वयं जब उनको प्रसाद स्वरूप लड्डू खिलाने गए, तो भी उन्होंने विरोध किया और प्रेम से गले लगाने निकले, तो उनसे मिलना तक गवारा नहीं समझा।

इस बीच बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सीपी जोशी के चेहरे की लाली बढ़ रही है। उनको भरोसा है कि सरकार उनकी ही आनी है, उन्हीं के नेतृत्व में चुनाव हो रहा है, तो जीत का श्रेय भी उन्हीं को मिलना है। प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते जोशी का सारे बड़े नेताओं से संबंध बढ़ता जा रहा है और यही नूर उनके चेहरे पर निखार भी ला रहा है।

कांग्रेस में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ही इस चुनाव में सबसे बड़ा चेहरा और सबसे बड़े नेता के रूप में सबके सामने हैं। गहलोत की राजस्थान के मुखिया के नाते शुरू की गई योजनाओं की हर तरफ प्रशंसा हो रही है, तो निश्चित रूप से चेहरा तो उन्हीं को होना था। बीजेपी में नरेंद्र मोदी की तरह राहुल गांधी को राजस्थान में पार्टी का चेहरा बनाने का रिस्क कांग्रेस नहीं ले सकती। चेहरा तो सचिन पायलट भी अपना चमकाने की जुगत में बीते तीन महीने से विरोध के स्वर सहेजकर शांति धारण किए हुए हैं और अपनी लुभावनी अंग्रेजी से आलाकमान को पटाने में लगे हैं। लेकिन गहलोत को देखते ही या उनका नाम सुनते ही पायलट के चेहरे का रंग बदरंग हो जाता है।

तीन बार सांसद, केंद्र में मंत्री, प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष और उप मुख्यमंत्री पद पर रहने के बावजूद किसी धुरंधर राजनेता की तरह पायलट अपने चेहरे के भाव छुपा नहीं पाते, इसे उनकी कमजोरी माना जाता है। चेहरा कांग्रेस सरकार के वरिष्ठ मंत्री महेश जोशी का भी उतरा हुआ है। नई दिल्ली में 24 अकबर रोड स्थित कांग्रेस मुख्यालय में टिकट पाने की ललक में उनको अकेले और लगभग अनाथ की तरह घूमते देख कईयों को उन पर तरस आ रहा था। महेश जोशी मुख्यमंत्री गहलोत के करीबी मंत्री हैं और 25 सितंबर 2022 को आलाकमान को आंख दिखाने की विधायकों की कोशिश का करतब उन्हीं के खाते में दर्ज किया गया है।

कांग्रेस सरकार के कुछ और चेहरों की बात की जाए, तो शांति धारीवाल के चेहरे पर कोटा में रिवर फ्रंट बनाने में करोड़ो की कमाई के दाग है, प्रतापसिंह खाचरियावास की कैंची की तरह चलती जुबान का जिक्र तो खुद मुख्यमंत्री गहलोत भी कर चुके हैं। प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के भाषण सुनने वाले उनकी लुभावनी और ठेट देसी शब्दावली के कायल हैं, मगर उनके चुनाव क्षेत्र लक्ष्मणगढ़ में उनके सामने बीजेपी के दमदार उम्मीदवार पूर्व केंद्रीय मंत्री सुभाष महरिया के होने से हार का डर अभी से मंडराने लगा है। उधर, चुनाव से पहले गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस का जो गुलाबी नजारा गली गली गुल खिला रहा था, वह बीजेपी की दमदार कोशिशों के कारण क्या आकार ले रहा है, यह सभी को दिख रहा है।

राजस्थान की राजनीति के चेहरों के बदरंग होते रंग और फीके पड़ते नूर का यह सिलसिला अगले कुछ दिनों तक जारी रहेगा और जीतने हारने तक लगातार आगे बढ़ते रहेगा। फिर उसके बाद अगली सरकार बनने तक कोई हंसेगा, तो नई सरकार बनने के बाद पिछली सरकार का कोई फंसेगा। लेकिन फिलहाल निखरते - बिखरते राजस्थान के ये सभी बड़े चेहरे हैं। सारे के सारे धुरंधर, सारे के सारे मंजे हुए और अपने अपने इलाकों में मजबूत भी। मगर, किसी नेता को अहंकार भारी पड़ा, तो किसी को उसका व्यवहार। किसी पर उसकी हरकतें बदनुमा दाग बनकर उभरीं, तो कोई अथाह कमाई के फेर में फंस गया। ये सभी प्रदेश की राजनीति की धुरी माने जाते हैं। लेकिन धुरी ही जब ढीली पड़ जाए, तो राजनीति के रंग अपने रंग दिखाते ही हैं।

इसी वजह से राजस्थान में विधानसभा चुनाव शुरू होने से पहले जो गुलाबी परिदृश्य प्रतिबिंबित हो रहा था, उसकी तस्वीर धीरे धीरे बदल रही है और नेताओं के चेहरों के हाव भाव भी बदल रहे हैं। लेकिन नहीं बदल रही है, तो वह है राजनीति की रंगत, जो इस चुनाव में कुछ ज्यादा ही निखर रही है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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