Madhya Pradesh: संघ के पूर्व प्रचारकों की पार्टी मध्य प्रदेश के चुनावी मैदान में
मध्य प्रदेश की राजनीति में जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव पास आ रहे हैं, राजनीतिक उथल पुथल बढ़ने लगी है। हाल ही में पूर्व विधायक ममता मीणा ने भाजपा की पहली अधिकृत सूची में नाम न होने के चलते भाजपा का दामन छोड़कर "आप" की झाड़ू थाम ली है।
कई और कद्दावर भाजपा नेता पार्टी छोड़कर जाने की तैयारी कर रहे हैं किंतु सबसे चौंकाने वाला मामला इंदौर/भोपाल से आया है जहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रचारकों ने "जनहित पार्टी" नाम से नए राजनीतिक दल का गठन कर राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया है।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह दूसरा अवसर है जब संघ के पूर्व प्रचारक सीधे राजनीति में उतरे हैं। इससे पूर्व गोवा में 2019 के लोकसभा चुनाव में गोवा के तत्कालीन संघ प्रमुख सुभाष वेलिंगकर ने गोवा सुरक्षा मंच बनाकर भाजपा को मुश्किल में डाल दिया था। हालांकि राजनीतिक दल बनाने से पूर्व ही सुभाष वेलिंगकर का संघ से संबंध विच्छेद हो गया था किंतु उस समय भी यह चर्चा बलवती हुई थी कि संघ राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लेता है और उसकी रुचि अपनी हितकारी सरकार के बनने से लेकर विपक्ष की राजनीति बिगाड़ने में होती है। किंतु क्या ऐसा सच में है?
मध्य प्रदेश में भी संघ के जिन पूर्व प्रचारकों ने राजनीतिक दल का गठन किया है उनका संघ से संबद्ध विच्छेद एक दशक पूर्व ही हो चुका है। कुछ प्रचारक तो तत्कालीन पूर्व सरसंघचालक केएस सुदर्शन के कार्यकाल में ही संघ छोड़ चुके हैं। असंतोष का कारण चाहे जो रहा हो किंतु संघ की मध्यप्रदेश की इस क़वायद में कोई भूमिका नहीं है, क्योंकि समाजसेवा के नाम पर एकजुट हुए इन पूर्व प्रचारकों को न तो स्वयंसेवकों का साथ मिल रहा है, न ही संगठन के पुराने साथियों का। सूत्रों के अनुसार समाजसेवा से राजनीति में आने के इनके निर्णय का संघ से जुड़े लोगों ने विरोध किया है और इंदौर में इन्हें मिला कार्यालय भी वापस ले लिया गया है।
जनहित पार्टी के गठन में किसकी भूमिका?
मध्य प्रदेश में जनहित पार्टी के गठन में अभय जैन के अलावा मनीष काले, विशाल बिंदल आदि की मुख्य भूमिका है। अभय जैन 1986 से 2007 तक संघ प्रचारक रहे हैं और असंतोष के कारण उन्होंने संघ से विराम ले लिया था। वे मध्य प्रदेश में प्रांत बौद्धिक प्रमुख रह चुके हैं। वे इंदौर नगर प्रचारक के साथ सिक्किम विभाग प्रचारक और प्रांत सेवा प्रमुख जैसे बड़े दायित्व पर भी रह चुके हैं। वहीं, मनीष काले संघ के रीवा विभाग प्रचारक रह चुके हैं। ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय हैं और वहां के लोगों को अपनी नई राजनीतिक पार्टी से जुड़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
इसके अलावा विशाल बिंदल भोपाल सायं भाग प्रचारक रह चुके हैं और इन दिनों झारखंड में सक्रिय रहकर सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों का नेतृत्व कर रहे हैं। डॉक्टर सुभाष बारोट पिछले 40 वर्षों से सामाजिक कार्यों में संलग्न हैं और वे भी इस राजनीतिक क़वायद का हिस्सा हैं। 10 सितंबर, 2023 को भोपाल में जनहित पार्टी के गठन का मकसद देश की जनता को हिंदुत्व आधारित सौ प्रतिशत खरी राजनीतिक पार्टी का विकल्प देना बताया जा रहा है। पार्टी के गठन पर प्रदेश में "संघ में फूट, भाजपा को चोट" जैसे नारे लगने लगे हैं जो आम जनता के बीच चर्चा का विषय बन रहे हैं किंतु इसका चुनावी लाभ कितना होगा यह भविष्य के गर्भ में छिपा है।
क्या वास्तव में जनहित पार्टी भाजपा को नुकसान पहुंचा पाएगी?
मध्य प्रदेश में यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या संघ के पूर्व प्रचारकों द्वारा गठित पार्टी विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा को नुकसान पहुँचाने का दम रखती है? इन सबके बीच एक प्रश्न यह भी उठ रहा है कि क्या यह सारी क़वायद भाजपा में मची भगदड़ को कांग्रेस और आम आदमी पार्टी सहित अन्य राजनीतिक दलों की ओर जाने से रोकने के लिए तो नहीं है?
अब तक का इतिहास देखें तो संघ के किसी भी पदाधिकारी का राजनीतिक चेहरा जनता के बीच चर्चा का केंद्र नहीं बना है। समाजसेवा और हिंदुत्व के विषय पर भले ही संघ को समाज का साथ मिलता है किंतु बात जहां राजनीति की आती है तो वहां मामला उल्टा हो जाता है।
गोवा में सुभाष वेलिंगकर इसका प्रमुख उदाहरण हैं। उन्होंने भी जिस तल्खी के साथ संघ छोड़ा और अपनी राजनीतिक पार्टी का गठन किया, उसे जनता ने ही नकार दिया। फिर अभय जैन के साथ तो विवाद भी जुड़े हैं। उन्होंने ओंकारेश्वर में बन रहे आदि शंकराचार्य केंद्र का भी यह कहकर विरोध किया था कि इससे वह नगरी पर्यटन का केंद्र बन जाएगी। अब जबकि ओंकारेश्वर में आदिगुरु शंकराचार्य की भव्य प्रतिमा का अनावरण हो चुका है तो यह प्रदेशवासियों के लिए गौरव का क्षण है।
जहां तक प्रश्न इस बात का है कि इससे भाजपा को कितना नुकसान होगा तो यह दीगर तथ्य है कि प्रदेश की राजनीति हमेशा से दो-दलीय रही है। बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के आधा दर्जन से अधिक विधायक भी यदा-कदा जीतकर विधानसभा पहुंचे हैं किंतु इससे आगे उनकी राजनीतिक राह भी मुश्किल हुई है। हां, जनता में यह संदेश अवश्य पहुंच रहा है कि भाजपा की अंदरूनी राजनीतिक स्थिति ठीक नहीं है जिसके चलते पार्टी में असंतोष बढ़ा है और जनता इसे भाजपा की घटती लोकप्रियता के रूप में देख रही है।
इससे निःसंदेह कांग्रेस को लाभ मिल रहा है जो यह तथ्य स्थापित करने में सफल रही है कि भाजपा की लोकप्रियता अब नहीं है और उसके अपने साथ छोड़ रहे हैं। इससे पूर्व भी बजरंग सेना का कांग्रेस में विलय यह कहकर प्रचारित करवाया गया कि बजरंगियों का यह संगठन भाजपा से नाराज होकर कांग्रेस में शामिल हुआ है जबकि यह सत्य नहीं है। बजरंग दल और बजरंग सेना में उतना ही अंतर है जितना द्रमुक और अन्ना द्रमुक में।
संघ के जिन पूर्व प्रचारकों का जिक्र करके कांग्रेस व अन्य राजनीतिक दल भ्रम पैदा कर रहे हैं उनका कोई राजनीतिक अनुभव नहीं है और वर्तमान चुनाव में वे कोई प्रभाव छोड़ पाएंगे, ऐसा लगता नहीं। इसके अलावा अभी तक न तो आधिकारिक रूप से पार्टी को चुनाव चिन्ह मिला है और न ही प्रत्याशियों की घोषणा ही हुई है। फिर चुनाव लड़ने के लिए धन के प्रबंधन का मामला भी है। ऐसे में मात्र एक पत्रकार वार्ता के चलते संघ में फूट और भाजपा को चोट जैसा नारा विपक्षी दल कांग्रेस के लिए मीडिया में चर्चा का विषय तो हो सकता है, लेकिन उसका मतदाताओं पर कोई असर पड़ेगा, ऐसा होना मुश्किल है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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