Pandurang Kane Jayanti: भारत को समझना है तो भारत रत्न डॉ. पांडुरंग काणे को जानना होगा
7 मई को एक ऐसे विद्वान मनीषी का जन्मदिन आता है जिनकी विद्वता का सम्मान कभी भारत सरकार ने भारत रत्न देकर किया था।

भारतीय चिंतन, धर्म और अध्यात्म पर हुए कार्यों में अनेक ऐसे मनीषी हुए हैं, जिन्होंने इतिहास खड़ा किया। इनमें डॉ पांडुरंग वामन काणे का नाम अग्रिम पंक्ति में आता है। वे न केवल संस्कृत एवं प्राच्य विद्याओं के विशारद थे बल्कि विधिज्ञ भी थे। डॉ. काणे संस्कृत के आचार्य, मुंबई विश्वविद्यालय के कुलपति तथा सन् 1953 से 1959 तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे। उन्होंने पेरिस, इस्तांबुल तथा कैंब्रिज के प्राचीन विद्या सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया। साहित्य अकादमी ने 1956 ईस्वी में उन्हें 'धर्मशास्त्र का इतिहास' के लिए पहला साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया। भारत सरकार ने 1963 ईस्वी में काणे को भारत रत्न के सर्वोच्च सम्मान से अलंकृत किया।
महाराष्ट्र के रत्नागिरि में 7 मई, 1880 को जन्मे काणे ने भी नहीं सोचा था कि वे भारतीय धर्मशास्त्र का इतिहास लिख डालेंगे। वे तो 'व्यवहार मयूख' की रचना में लगे थे और उस ग्रंथ को रचने के उपरांत उनके मन में आया कि पुस्तक का एक परिचय लिखा जाए, ताकि पाठकों को धर्मशास्त्र के इतिहास की संक्षिप्त जानकारी हो सके।
धर्मशास्त्र की संक्षिप्त जानकारी देने के प्रयास में काणे एक ग्रंथ से दूसरे ग्रंथ, एक खोज से दूसरी खोज, एक सूचना से दूसरी सूचना तक बढ़ते चले गए और पृष्ठ दर पृष्ठ लिखते गए। एक नया विशाल ग्रंथ तैयार होने लगा और इस तरह भारतीय ज्ञान के इतिहास में एक बड़ा काम हो गया।
'धर्मशास्त्र का इतिहास' का पहला खंड 1930 में प्रकाशित हुआ। केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया भर में पुरातन ज्ञान की नई हलचल मच गई। धर्मशास्त्र का इतिहास की प्रस्तावना में डॉ काणे ने स्वयं लिखा है, 'व्यवहार मयूख के संस्करण के लिए सामग्री संकलित करते समय मेरे ध्यान में आया कि जिस प्रकार मैंने साहित्यदर्पण के संस्करण में प्राक्कथन के रूप में अलंकार साहित्य का इतिहास, नामक एक प्रकरण लिखा है, उसी पद्धति पर व्यवहार मयूख में भी एक प्रकरण संलग्न कर दूं, जो निश्चय ही धर्मशास्त्र के छात्रों के लिए पूर्ण लाभप्रद होगा। इस दृष्टि से जैसे-जैसे धर्मशास्त्र का अध्ययन करता गया। मुझे ऐसा दिख पड़ा कि सामग्री अत्यंत विस्तृत एवं विशिष्ट है, उसे एक संक्षिप्त परिचय में आबद्ध करने से उसका उचित निरूपण न हो सकेगा। साथ ही उसकी प्रचुरता के समुचित ज्ञान, सामाजिक मान्यताओं के अध्ययन, तुलनात्मक विधि शास्त्र तथा अन्य विविध शास्त्रों के लिए उसकी जो महत्ता है, उसका भी अपेक्षित प्रतिपादन न हो सकेगा। इसलिए मैंने यह निश्चय किया कि स्वतंत्र रूप से धर्मशास्त्र का एक इतिहास ही लिपिबद्ध करूं। आज धर्मशास्त्र का इतिहास एक ऐसी अनमोल थाती है, जिसमें वैदिक काल से आधुनिक काल तक के न केवल धर्म ग्रंथ बल्कि तमाम विधि-विधान, सामाजिक रीति रिवाज का भी पर्याप्त विवरण है।'
काणे के धर्मशास्त्र के इतिहास के एक के बाद एक पांच खंड प्रकाशित हुए। 1962 में पांचवां खंड आया। यह काम इतना अद्भुत, उपयोगी और अतुलनीय है कि भारत सरकार इसकी अनदेखी नहीं कर सकी। 1963 में उन्हें देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारतरत्न दिया गया। बेहिचक कहना चाहिए कि काणे आज तक अकेले ऐसे 'भारत रत्न' हैं, जो शास्त्र चिंतन व संस्कृत को समर्पित रहे हैं।
जब संस्कृत भाषा को लगातार उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है, ऐसे में काणे को याद करना और याद रखना बहुत जरूरी है। 1930 में जब वे पचास साल के थे, तब धर्मशास्त्र का इतिहास का पहला खंड आया। जब अंतिम खंड आया, तब वे 82 वर्ष के थे। उन्होंने पूरा जीवन धर्मशास्त्र के अध्ययन में समर्पित कर दिया। लगभग 6 हजार पृष्ठों के ऐतिहासिक ग्रंथ के अलावा भी उनके अनेक ग्रंथ प्रकाशित हुए। उत्तररामचरित से लेकर कादंबरी, हर्षचरित, हिंदुओं के रीति-रिवाज तथा आधुनिक विधि और संस्कृत काव्यशास्त्र का इतिहास उनकी कृतियां हैं। उनकी पुस्तकों के बिना आज कोई भी पुस्तकालय पूरा नहीं हो सकता। उनके द्वारा रचा गया ज्ञान कोश अंग्रेजी, संस्कृत और मराठी भाषा में 20,000 से ज्यादा पृष्ठों में उपलब्ध है।
डॉ काणे के बारे में इतिहासकार रामशरण शर्मा ने लिखा हैं: "पांडुरंग वामन काणे, एक महान संस्कृतिविद थे जिन्होंने समाज सुधार के लिए विद्वता की पुरानी परंपरा को जारी रखा। बीसवीं शताब्दी में पांच खंडों में प्रकाशित "धर्मशास्त्र का इतिहास" नामक उनका कार्य प्राचीन सामाजिक कानूनों और रीति-रिवाजों का एक विश्वकोश है। यह हमें प्राचीन भारत में सामाजिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करने में सक्षम बनाता है।"
काणे ने 18 अप्रैल 1972 को शरीर त्याग दिया, लेकिन जो अनमोल ज्ञान वे छोड़ गए हैं, उसका महत्व अपरिमित है। विद्वानों की दुनिया उन्हें भुला नहीं सकती। जब भी भारतीय संस्कृति को लेकर कोई विवाद उठता है तो काणे की रचनाओं से निकालकर उद्धरण दिए जाते हैं। उनकी कल्पना तार्किक थी। उन्होंने लिखा, 'भारतीय संविधान भारतीय संस्कृति के अनुरूप नहीं है, क्योंकि लोगों को अधिकार तो दिए गए हैं, लेकिन जिम्मेदारी नहीं दी गई।' आज कौन उनकी इस बात से इनकार करेगा? भारत में लोगों को हरसंभव अधिकार मिले हुए हैं, लेकिन लोग जिम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं हैं, जिससे समाज में अनेक चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। भारतरत्न डॉ. पांडुरंग वामन काणे के जन्मदिन पर उन्हें याद करना तभी सार्थक है, जब हम भारत और भारतीयता के प्रति अपनी धार्मिक एवं सांस्कृतिक जिम्मेदारियों को समझें।












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