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इंडिया गेट से: संगठनात्मक बदलाव के दौर से गुजर रही भाजपा

भारतीय जनता पार्टी 2024 के लोकसभा चुनावों की तैयारी के सिलसिले में बड़े बदलावों के दौर से गुजर रही है। इस बीच जो गलतियाँ हुई हैं, उन्हें सुधारने की कोशिश भी कर रही है। कईयों के पर कुतरे जा रहे हैं, तो कई जगह पर संतुलन बनाने के लिए कांग्रेस जैसी नीति अपना कर एक साथ कई नेताओं को लॉलीपाप भी दी जा रही है।

organisational changes in BJP in view of upcoming elections

यह सारी रणनीति अमित शाह और जे.पी. नड्डा के स्तर पर हो रही है। पार्टी के संगठनात्मक ढर्रे में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। उत्तराखंड में अभी हाल ही में क्षेत्रीय संतुलन बनाने के लिए मैदानी इलाके के मदन कौशिक की जगह गढ़वाल के महेंद्र भट्ट को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। अब अध्यक्ष ब्राह्मण और मुख्यमंत्री ठाकुर के साथ कुमाऊँ और गढ़वाल का संतुलन भी बन गया है, जो राज्य की परंपरा रही है।

इसी तरह कर्नाटक में बोम्मई से कार्यकर्ताओं की बढ़ती नाराजगी को देखते हुए येद्दियुरप्पा को संसदीय बोर्ड में लाया गया है। राजस्थान में उपेक्षित नेताओं को फिर से सक्रिय होने के संकेत दे दिए गए हैं, जो अब तक की नीति में बदलाव के संकेत हैं। इससे पहले जनसंघ के समय और बाद में भाजपा के समय में भी संगठन से जुड़े फैसले मोटे तौर पर केंद्र और राज्यों के संगठन महामंत्रियों की सलाह से लिए जाते थे। अलबत्ता राष्ट्रीय और प्रदेश अध्यक्ष संगठन महामंत्रियों की ओर से लिए गए फैसलों पर मोहर लगाने का काम करते थे। संघ से आए संगठन महामंत्री की भूमिका अहम होती थी, इसलिए संगठन की दृष्टी से लिए जाने वाले फैसलों में गलती नहीं होती थी।

चुनाव में टिकट बंटवारे के समय भी संगठन महामंत्रियों की सलाह अहमियत रखती थी, क्योंकि वे निर्वाचन क्षेत्र के सामाजिक गुणा भाग और कार्यकर्ताओं के फीडबैक के आधार पर सिफारिश करते थे। हालांकि उन की सिफारिश अंतिम नहीं होती थी, लेकिन टिकट का फैसला करते समय उसे ध्यान में रखा जाता था।

भाजपा ने ऐसी प्रणाली दो कारणों से बना रखी थी। पहला कारण था कि दल बदल कर भाजपा में आने वालों को संगठन में अहम पद न दिए जाएं। क्योंकि उनके कभी भी वापस चले जाने का डर बना रहता है, और ऐसा होने पर उसका असर संगठन पर न पड़े। दूसरा, यह प्रणाली संगठन और चुनावी राजनीति में अंतर करने के लिए बना रखी थी। चुनावी राजनीति में कई समझौते करने पड़ते हैं, उस का संगठन पर असर न पड़े। लेकिन अब सब कुछ गड्डमड्ड हो गया है। दलबदल करके भाजपा में आने वालों को संगठन में अहम जिम्मेदारियां दी जा रही हैं और तुरंत पार्टी का उपाध्यक्ष और महामंत्री तक बनाया जा रहा है। दिलीप घोष इसका ताज़ा उदाहरण हैं, वह तृणमूल कांग्रेस से आकर भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बन गए थे और उपाध्यक्ष रहते हुए ही वापस तृणमूल कांग्रेस में चले गए। इसी तरह बीजू जनता दल से आए बिजयंत पांडा भी सीधे राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिए गए, एनटीआर की बेटी पुरंदेश्वरी देवी राष्ट्रीय महामंत्री बना दी गई।

संगठन महामंत्रियों का काम ऊपर से लिए गए फैसलों पर अमल करवाना भर रह गया है। जब से भाजपा कार्यकर्ता आधारित पार्टी न रह कर चुनाव प्रबंधन कंपनियों पर आधारित पार्टी बन गई है, तब से जिस भूमिका के लिए संघ अपने कर्तव्यनिष्ठ पूर्णकालिक कार्यकर्ता देता था और जिस उद्देश्य के लिए भाजपा पूर्णकालिक कार्यकर्ता लेता था, वह कार्य अब लगभग खत्म हो गया है। भाजपा ने उन्हें दूसरे दायित्व देना शुरू कर दिया है।

सितंबर 2020 में जे. पी. नड्डा ने अपनी टीम घोषित की थी, तो उसमें संघ के पूर्णकालिक सौदान सिंह और वी. सतीश पहले की तरह सह-संगठन महामंत्री थे, लेकिन तीन महीने बाद दिसंबर में सौदान सिंह को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और वी. सतीश को संगठक का नया पद सृजित करके दिल्ली कार्यालय में बिठा दिया गया। वी.सतीश के अलावा हृदयनाथ सिंह, श्री प्रधुम्न और प्रशांत अरोड़ा को भी संगठक बनाया गया है। सौदान सिंह और वी. सतीश को हटाए जाने के बाद भाजपा सह-संगठन महामंत्री का पद खत्म करने जा रही है। अब सिर्फ शिव प्रकाश ही एकमात्र सह-संगठन महामंत्री रह गए हैं। उन का मुख्यालय भी लखनऊ से बदल कर मुम्बई कर दिया गया है।

ऊपर से देखने में ऐसा लगता है कि संघ से आए पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं के दिन लद गए, लेकिन ऐसा नहीं है। पार्टी संगठनात्मक दृष्टी से बदलाव के दौर से गुजर रही है। भाजपा के संगठन में भारी बदलाव हो रहा है। जिस तरह संघ में क्षेत्रीय कार्यवाह होते हैं, उसी तरह भाजपा में भी क्षेत्रीय संगठन महामंत्री बनाए जाने की प्रक्रिया शुरू हुई है। जैसे असम से तबादला करके पिछले दिनों अजय जामवाल को मध्य प्रदेश और छतीसगढ़ का संगठन महामंत्री बनाया गया है।

इसी तरह उत्तर प्रदेश के संगठन महामंत्री सुनील बंसल पूर्णकालिक थे, लेकिन उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय महामंत्री बना कर पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और तेलंगाना का प्रभारी बनाया गया है। सौदान सिंह, वी. सतीश की तरह सुनील बंसल भी अभी पूर्ण कालिक संघ के कार्यकर्ता हैं या नहीं, यह साफ़ नहीं है। आने वाले दिनों में देश भर में संघ की तरह भाजपा के क्षेत्रीय संगठन महामंत्री बनाए जाने के संकेत हैं।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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