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MBBS in Hindi: भारतीयता की ओर पहला कदम है हिन्दी में तकनीकी शिक्षा

MBBS in Hindi: हिंदी में तकनीकी शिक्षा को लेकर जब भी चर्चा हुई, तकनीकी विषयों की हिंदी में पुस्तकों की कमी राह में सबसे बड़ी बाधा बनती नजर आती रही। तकनीकी विषयों की हिंदी या भारतीय भाषाओं में किताबों की कमी दूर हो, उनकी शब्दावली विकसित हो, इसके लिए 1960 में वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग की स्थापना हुई, लेकिन दुर्भाग्यवश तकनीकी विषयों पर पाठ्यपुस्तकों की कमी पूरी नहीं हो पाई।

MBBS in Hindi Higher education in Hindi step towards Indianness

स्वाधीनता सेनानियों के सपने के मुताबिक हिंदी और भारतीय भाषाएं तकनीकी विषयों की पढ़ाई का माध्यम नहीं बन पाईं। लेकिन अब यह कमी दूर होने जा रही है। गांधी के सपनों के मुताबिक, भारतीय भाषाओं में पढ़ाई की ओर मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार ने कदम उठाया है।

सबसे पहले किताबें तैयार कराने की दिशा में काम शुरू किया गया। इसके लिए विषय चुना गया चिकित्सा शास्त्र, जिसे आधुनिक दुनिया मेडिकल के नाम से जानती है। 16 अक्टूबर को तालाबों की नगरी भोपाल में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने हिंदी माध्यम की मेडिकल की पुस्तकों के पहले सेट के विमोचन के साथ ही नई शुरुआत कर दी।

हमारा स्वाधीनता आंदोलन सिर्फ राजनीतिक सत्ता की मुक्ति का ही संघर्ष नहीं था। स्वाधीनता संघर्ष का उद्देश्य आजाद भारत को भारतीयता की बुनियाद पर भारतीय मूल्यों के साथ आधुनिक संदर्भ में स्थापित करना था। भारतीयता की यह बुनियाद बिना अपनी शिक्षा के बिना पूरी नहीं हो सकती थी।

हिंदी और भारतीय भाषाओं में शिक्षा का सपना भी इसका ही विस्तार था। लेकिन दुर्भाग्यवश आजादी के बाद ऐसा माहौल बना, जिसमें अपनी संस्कृति और भारतीयता के मूल्य कहीं पीछे छूटते चले गए।

हिंदी और भारतीय भाषाओं में संपूर्ण शिक्षण की व्यवस्था विकसित ही नहीं हो पाई। हालांकि राजभाषा अधिनियम के तहत हिंदी शिक्षण के लिए तमाम तरह की संस्थाएं बनीं, संस्थान स्थापित हुए, सरकारी विभागों, सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं और बैंकों आदि में अलग से हिंदी विभाग स्थापित हुए। लेकिन हालात जस के तस रहे।

हमने हर मौके पर गांधी का नाम लिया, गांधी के बहाने सारी व्यवस्थाएं स्थापित करते चले गए, लेकिन शिक्षा और संस्कृति के संदर्भ में हम गांधी कथन को लगातार भूलते या भुलाते चले गए। गांधी ने कहा था, "सच्ची स्वतंत्रता तभी मिल सकती है, जब पश्चिमी शिक्षा के प्रभाव से हम अपने आपको मुक्त कर सकें। पश्चिमी सभ्यता, संस्कृति और पाश्चात्य जीवन शैली, जो हमारे अंदर बस चुकी है, उससे मुक्ति ही सच्ची स्वतंत्रता है।"

भारत में अंग्रेजी शिक्षण वाले मैकाले के विचार को 1835 में ब्रिटिश सरकार की मंजूरी मिली। तब संचार के आधुनिक साधन नहीं थे। मीडिया भी नहीं था। लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी को इस विचार को लागू करने में पूरे 25 साल लग गए। तब पूरा देश इस शिक्षा के खिलाफ उठ खड़ा हुआ था। अगर 1857 का पहला स्वाधीनता संग्राम सफल हो गया होता तो शायद अंग्रेजी शिक्षण का विचार लागू भी नहीं हो पाता।

ब्रिटिश सरकार की बुनियाद को मजबूत करने और उसे अंग्रेजी शिक्षित क्लर्कों की आपूर्ति के लिए जो अंग्रेजी शिक्षण शुरू हुआ, उसने देखते ही देखते ऐसी जड़ पकड़ ली कि आज तक अंग्रेजी माध्यम पर सवाल उठाने वालों को दकियानूस और मूढ़मति कह दिया जाता है।

हिंदी को राजभाषा बनाने वाले प्रावधान पर जब संविधान सभा में विचार हो रहा था, तब भी अंग्रेजी के समर्थन में कुछ लोग आगे आए थे। हिंदी की क्षमता पर भी सवाल उठाए गए कि वह इतनी क्षमतावान हो पाएगी कि आधुनिक ज्ञान-विज्ञान और तकनीक को अभिव्यक्त करने का माध्यम बन सके।

आजादी के बाद अव्वल तो होना यह चाहिए था कि राष्ट्रीयता की भावना के अनुरूप गांधी समेत अपने स्वाधीनता सेनानियों के विचार को धरातल पर उतारा जाता। लेकिन ऐसा नहीं हो सका।

यह भी पढ़ें: Amit Shah ने भोपाल में मेडिकल की हिंदी किताबों का किया विमोचन, CM Shivraj की जमकर की तारीफ

हिंदी समेत तमाम भारतीय भाषाओं की अभिव्यक्ति की क्षमता पर सवाल उठाए गए। जब भी किसी ने हिंदी समेत भारतीय भाषाओं को आधुनिक तकनीक, ज्ञान-विज्ञान और विचारों की वाहक के तौर पर स्थापित करने का तर्क दिया गया, उस तर्क का उपहास उड़ाया गया। इस वजह से आधुनिक तकनीक और ज्ञान-विज्ञान की भाषा के तौर पर हिंदी समेत भारतीय भाषाओं को पीछे ही रखा गया। उसका असर अब भी दिख रहा है।

हिंदी में मेडिकल की किताबों के विमोचन पर भी लोग सवाल उठा रहे है। उनका मानना है कि यह बेकार की कवायद है। क्योंकि इस पढ़ाई से "अधकचरे" डॉक्टर तैयार होंगे।

हिंदी में मेडिकल की किताबों के विरोधियों का तर्क है कि चूंकि पूरी दुनिया में मेडिकल की पढ़ाई अंग्रेजी में ही होती है, इसलिए इसके महत्वपूर्ण शोध और किताबें आदि अंग्रेजी में ही उपलब्ध हैं। ऐसे तर्क देने वाले भूल जाते हैं कि जर्मनी में मेडिकल की पढ़ाई जर्मन भाषा में होती है, फ्रांस में फ्रेंच में, वहीं रूस में रूसी तो चीन और जापान में चीनी और जापानी भाषा में ऐसा होता है।

कोई भाषा सिर्फ ज्ञान-विज्ञान का ही माध्यम नहीं होती, बल्कि वह अपनी संस्कृति की भी वाहक होती है। क्योंकि हर भाषा का विकास अपनी सांस्कृतिक बुनियाद पर स्थानिक प्रभाव में होता है। शायद यही वजह है कि अंग्रेजी माध्यम से पढ़े-लिखे लोगों का भी भारत, भारतीयता और भारतीय मूल्यों के बारे में हवाई सर्वेक्षण जैसे विचार हैं।

अंग्रेजी पढ़ा-लिखा व्यक्ति भारत को विजिटर भाव में देखता है, आत्मीय भाव से कम जुड़ता है। दुर्भाग्यवश इस तथ्य को भारतीयता के संदर्भ में कभी समझने की कोशिश नहीं की गई।

यही वजह है कि भारत में अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों में अंग्रेजियत का ही असर ज्यादा दिखता है। इसी असर के चलते वे हिंदी या भारतीय भाषाओं में उच्च और तकनीकी शिक्षण को उपहास की नजर देखते हैं।

अंग्रेजी समर्थकों को जानना चाहिए कि ब्रिटेन में 1362 तक अंग्रेजी की हालत अछूत जैसी थी। तब वहां आम बोलचाल की भाषा जहां लैटिन थी, वहीं राजकाज और बौद्धिकता का माध्यम फ्रेंच थी। लेकिन अंग्रेजों ने तय किया कि अंग्रेजी को स्थापित करना है। उन्होंने अंग्रेजी को न सिर्फ ब्रिटेन में स्थापित किया, बल्कि पूरी दुनिया में उसे फैला दिया।

लेकिन यह भी सच है कि उपनिवेशवाद के बाद अंग्रेजी का वर्चस्व ब्रिटेन और अमेरिका के अलावा दक्षिण अफ्रीका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और भारत में ही ज्यादा है।

यहां ध्यान रखने की बात यह है कि न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया एक तरह से ब्रिटेन का ही विस्तार हैं, जबकि कनाडा अमेरिका का पड़ोसी है। यानी ब्रिटिश आभामंडल से बाहर के दो ही देशों दक्षिण अफ्रीका और भारत में ही अंग्रेजी का बोलबाला कहीं ज्यादा है।

लेकिन अब इसके दरकने की शुरूआत हो गई है। मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार ने इस दिशा में साहसी कदम उठाया है। उसकी राह पर उत्तर प्रदेश की सरकार भी चल चुकी है।

अगले साल से उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ की सरकार भी हिंदी माध्यम से इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई शुरू करने जा रही है। उत्तर प्रदेश में इन विषयों की किताबों का हिंदी में अनुवाद कराया जा रहा है।

हिंदी को लेकर पूर्व कैबिनेट सचिव टीएन शेषन कहा करते थे कि शुरू तो कीजिए, इसमें काम करना आसान हो जाएगा। कह सकते हैं कि हिंदी या भारतीय भाषाओं के स्वाभिमान की स्थापना की दिशा में साहस दिखाना भी उसी तरह शुरू करना ही है। क्योंकि शुरूआत ही कठिन होती है, लेकिन अगर शुरूआत हो गई तो राह बन जाती है।

यह भी पढ़ें: हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने में गैर हिंदीभाषियों का योगदान

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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