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हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने में गैर हिंदीभाषियों का योगदान

यह संयोग ही है कि जिन दिनों देश हिंदी दिवस मना रहा होता है, उन्हीं दिनों सनातन समाज का श्राद्ध पर्व चल रहा होता है। इसलिए हिंदी पखवाड़े का संजीदा हिंदीप्रेमी उपहास उड़ाने से नहीं चूकते। इस बार देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, लेकिन हिंदी अब भी अपना उचित स्थान पाने के लिए कड़ी मेहनत कर रही है। यह तब हो रहा है, जब हिंदी को देश के स्वाधीनता आंदोलन से लेकर वैचारिक धुरी बनाने के लिए हिंदीभाषियों से ज्यादा अहिंदीभाषियों ने प्रयास किया था।

Contribution of non-Hindi speakers in popularising Hindi

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध को भारतीय इतिहासकार नवजागरण काल कहते हैं। बेशक तब पहला स्वाधीनता आंदोलन नाकाम हो चुका था, लेकिन भारत ने आजादी के सपने देखने शुरू कर दिए थे। आजाद भारत की संपर्क और राजभाषा क्या होगी, इस विषय में भी विचार-विमर्श शुरू हो गया था। तब से ही कमोबेश देश इस बात पर एकमत होने लगा था कि स्वाधीन भारत की संपर्क भाषा हिंदी ही हो सकती है। इस विचार को आगे लाने और इस मुद्दे पर पूरे देश को जागरूक करने में सबसे ज्यादा योगदान गैर हिंदीभाषियों का रहा है। उनमें कुछ प्रमुख लोगों के योगदान की चर्चा करते हैं।

केशवचंद्र सेन

भारत की संपर्क भाषा हिंदी बन सकती है, यह विचार सबसे पहले बंगलाभाषी केशवचंद्र सेन ने दिया था। ब्रह्मसमाज के संस्थापकों में से एक केशवचंद्र सेन इतनी बढ़िया अंग्रेजी बोलते थे कि लंदन में उन्हें सुनने के लिए अंग्रेजों की भीड़ से हॉल भर जाते थे। उन्हीं केशवचंद्र सेन ने सबसे पहली बार 1875 में कहा था कि हिंदी में भावी भारत की संपर्क भाषा बनने की ताकत है।

कलकत्ता के धर्मतल्ला मैदान में आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती से उनकी भेंट हुई थी। उसी भेंट के दौरान सेन ने दयानंद सरस्वती को सत्यार्थ प्रकाश हिंदी में लिखने का सुझाव दिया था। आज हिंदी का विरोध अगर कोई करता है तो उसमें अंग्रेजी बोलने वाले सबसे आगे रहते हैं। ऐसे लोगों के लिए केशवचंद्र सेन उत्तम उदाहरण हो सकते हैं।

नर्मदालाल शंकर दवे

भारत की सांस्कृतिक एकता की बात अक्सर की जाती है। बहुभाषाभाषी और बहुलतावादी समाज की सोच भी कमोबेश प्राचीन काल से समान ही रही है। इसे संयोग कहें या सांस्कृतिक एकता की धारा, जिस वक्त पूर्वी भारत के बांग्लाभाषी केशवचंद्र सेन हिंदी का भविष्य देख रहे थे, उससे हजारों किलोमीटर दूर पश्चिमी भारत में भी ऐसी ही सोच विकसित हो रही थी।

हिंदी को भारत की राजभाषा बनाने का पहला सुझाव उन्नीसवीं सदी के मशहूर गुजराती कवि नर्मदालाल शंकर दवे ने 1880 में दिया था। उन्हें गुजरात नर्मद कवि के नाम से जानता है। हिंदी को राजनीति और स्वाधीनता आंदोलन की केंद्रीय धुरी बनाने की जब भी चर्चा होती है, सबसे पहला नाम गुजराती भाषी महात्मा गांधी का आता है। लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि उनसे कई वर्ष पहले गुजराती भाषी नर्मदालाल शंकर दवे भी रहे, जिन्होंने हिंदी को भारत की राजभाषा बनाने का सुझाव दिया था।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक

आजादी के बाद मुंबई राज्य से गुजरात अलग हुआ। इसके पहले तक वह मुंबई यानी महाराष्ट्र राज्य का ही हिस्सा था। दूसरे शब्दों में कहें तो महाराष्ट्र-गुजरात और इस नाते गुजराती-मराठी भी एक ही रहे हैं। हिंदी की ताकत को एक और गैरहिंदीभाषी ने पहचाना था, वह रहे लोकमान्य बालगंगाधर तिलक। तिलक ने बंगभंग के साल 1905 में वाराणसी की यात्रा की थी। उस दौरान उन्होंने नागरी प्रचारिणी सभा की एक सभा को भी संबोधित किया था। हिंदी के विकास में काशी की नागरी प्रचारिणी सभा का अपना विशेष योगदान रहा है। उसी नागरी प्रचारिणी सभा में तिलक ने 1905 में कहा था कि नि:संदेह हिंदी ही देश की संपर्क और राजभाषा हो सकती है।

महात्मा गांधी

महात्मा गांधी ने पहली बार 1917 में भरूच में आयोजित गुजरात शैक्षिक सम्मेलन में सार्वजनिक तौर पर हिंदी की ताकत को स्वीकार किया था। उन्होंने कहा था, "भारतीय भाषाओं में केवल हिन्दी ही एक ऐसी भाषा है जिसे राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाया जा सकता है।" हालांकि 1909 में लिखी अपनी पुस्तिका 'हिंद स्वराज' में भी भावी भारत की भाषा के तौर पर हिंदी की महत्ता को स्वीकार कर चुके थे। गांधी जी ने 1918 में इंदौर में आयोजित हिंदी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए हिंदी के लिए पांच दूत दक्षिण भारत में भेजे, जिनमें उनके बेटे देवदास गांधी भी थे।

गांधी जी समझते थे कि हिंदी को बड़ी चुनौती दक्षिण भारत से ही मिलने वाली है। इसीलिए उन्होंने दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की नींव डाली और अपने मित्र उद्योगपति जमनालाल बजाज को जिम्मा दिया। जमनालाल बजाज ने चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की सहायता से दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार की कमान संभाली।

विनोबा भावे

गांधी जी के रचनात्मक कार्यों के शिष्य विनोबा भावे गांधी जी से भी आगे की सोच रखते थे। उन्होंने हर भारतीय भाषा को नागरी लिपि में लिखने के लिए सुझाया था। अगर उनके इस सुझाव को मान लिया गया होता तो शायद भारतीय भाषाओं को पूरे देश के लोग कमोबेश समझ सकते थे।

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के लिए पहले सत्याग्रही के तौर पर गांधी जी ने विनोबा भावे को ही चुना था। विनोबा चाहते थे कि नागरी भारत की एकता का जरिया बन सकती है। लेकिन राजनीति की दुरभिसंधि के चलते हिंदी को तो किनारे रखा ही गया, नागरी को भारतीय भाषाओं की लिपि बनाने के सुझाव को भी नजरंदाज कर दिया गया।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना एक अहिन्दी भाषी केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। वो मूल मराठी भाषी थे और शुरुआत में जो स्वयंसेवक संघ से जुड़े वो भी मराठी भाषी ही थे लेकिन काम काज और संपर्क भाषा के रूप में संघ ने शुरु से ही हिन्दी को अपनी भाषा बनाया। इस तरह व्यक्तियों से इतर संगठन के स्तर पर हिंदी के प्रचार-प्रसार में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी बड़ा योगदान है।

सुदूर पूर्व अरूणाचल प्रदेश का इलाका हो या सिक्किम या फिर कोई जंगली इलाका, हर जगह हिंदी को पहुंचाने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारकों का योगदान बहुत है। प्रचारक चाहे भारत के किसी भी इलाके का मूल निवासी हो, लेकिन उसकी प्राथमिक और कार्यभाषा हिंदी ही होती है। भले ही वह किसी भी इलाके में प्रचारक क्यों ना हो।

संघ की पूरी सैद्धांतिकी 'हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान' पर केंद्रित है। संघ के प्रचारक या कार्यकर्ताओं अपने संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति को अपनी ही भाषा या हिंदी में हस्ताक्षर करने को प्रेरित करते हैं। वे तो खुद ऐसा करते ही हैं। इस तरह वे एक तरह से हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने में वे बड़ी भूमिका निभाते हैं। हिंदी के विकास में संघ के योगदान पर तो अलग से शोध और अध्ययन होना चाहिए।

नरेन्द्र मोदी

देश में भले ही सही मायने में हिंदी राजभाषा या राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई। लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री बनने की एक अघोषित योग्यता हिंदी बोलना भी है। दक्षिण भारतीय राजनेता भी निजी बातचीत में स्वीकार करते हैं कि अखिल भारतीय छवि के लिए हिंदी आना जरूरी है। इसलिए वे ऐसा प्रयास करते भी हैं। इसके बावजूद प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर हिंदी को ताकतवर भाषा बनाने की संस्थानिक कोशिश ज्यादा नहीं हुई।

इस संदर्भ में कह सकते हैं कि देश के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का योगदान बहुत ज्यादा है। अक्सर ऐसा होता रहा है कि राजनीति से जुड़ी शख्सियतें भी नीति की बात करते वक्त या अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बोलते वक्त अगर हिंदी में बोलना पड़ा तो कहीं न कहीं हीनताबोध से ग्रस्त नजर आते थे। लेकिन नरेंद्र मोदी इन अर्थों में अलग नजर आते हैं। चाहे नीतिगत मामले हों या फिर अंतरराष्ट्रीय मंच, हर जगह वे पूरे आत्मविश्वास से हिंदी में खुद को अभिव्यक्त करते नजर आते हैं।

उनके प्रधानमंत्री बनने से पहले उच्च प्रशासनिक स्तर पर अंग्रेजी का बोलबाला होता था। हिंदी को किनारे रखा जाता था। लेकिन अब स्थितियां बदलीं हैं। अब हिंदी को किनारे नहीं रखा जा सकता है। अब हिंदी में भी बातें होती हैं, हिंदी में सूचनाएं प्रसारित करने की कोशिश होती है, अधिकारी भी हिंदी बोलने और लिखने की कोशिश करते हैं।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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