Food Price Rise: न दूध सस्ता रहा, न रोटी, जनता की किस्मत ही खोटी
आम लोगों के लिए दूध रोटी बहुत महंगी हो गई है। पिछले वर्ष इसी अवधि में 26 रूपये प्रति किलो खुले में बिकने वाला आटा अब 36 रुपये का हो गया है, वहीं 56 रूपये प्रति लीटर बिकने वाला अमूल गोल्ड दूध अब 66 रूपये लीटर का हो गया।

Food Price Rise: कीमतों में उतार-चढ़ाव किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए स्वाभाविक स्थिति है। कठिनाई तब ज्यादा होती है जब इस अर्थव्यवस्था पर बाजार का जोर ज्यादा चलता है और आम लोगों के साथ सरकार भी बस मुंह ताकती रह जाती है। देश में इस समय जरूरी खाद्य पदार्थों के दाम जिस तरह आसमान छू रहे हैं, उसने सरकार की चिंता बढ़ाई हो या नहीं पर आम लोगों की तो इसने कमर तोड़ दी है।
पिछले हफ्ते ही वर्ष 2023-24 का आम बजट पेश हुआ। आयकर में छूट, बचत प्रोत्साहन, बुनियादी ढांचे के निर्माण आदि को आगे कर यह दावा किया गया कि संतुलित और समावेशी बजट से आम लोगों की जिंदगी में सुधार आएगा और सहूलियतें बढ़ेंगी। बजट से हर वर्ग के लोगों के जीवन में खुशहाली आएगी।
तमाम आर्थिक विशेषज्ञ भी बजट को सुंदर भविष्य की बुनियाद बता रहे हैं, लेकिन महंगाई को बांधने में विफल बजट आम लोगों के लिए सिर मुंडाते ही ओले पड़ने जैसा है। हर घर की प्रतिदिन की जरूरतों में पिछले एक साल में 40% से अधिक की मूल्य वृद्धि सरकार द्वारा घोषित सारी सहूलियतों पर भारी पड़ रही है। कुछ गृहणियों का तो यहां तक कहना है कि जो महंगाई अभी कुछ दिन पहले तक डायन कही जाती थी अब सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ी है।
मालूम हो कि देश में दूध का कारोबार करने वाली अग्रणी कंपनी अमूल ने महंगाई का एक और झटका देते हुए दूध के दाम में ₹3 प्रति लीटर की बढ़ोतरी की है। बीते कल तक ₹63 प्रति किलो मिलने वाला दूध अब ₹66 प्रति किलो मिल रहा है। कंपनी का कहना है कि कीमतों की यह बढ़ोतरी दूध संचालन व उत्पादन की लागत में बढ़ोतरी के चलते की जा रही है। पिछले साल की तुलना में पशुओं के चारे में लगभग 20% की बढ़ोतरी हुई है, इसलिए दूध का दाम बढ़ाना आवश्यक है। दिल्ली एनसीआर में सबसे अधिक पैकबंद दूध की सप्लाई करने वाली मदर डेयरी ने भी बढ़ोतरी के संकेत दे दिए हैं। एक साल के भीतर दूध के दाम में लगभग ₹10 प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई है।
कमोबेश यही हाल गेहूं के आटे का है। हालांकि सरकार ने बीते शुक्रवार को दावा किया कि गेहूं की बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने के मकसद से खुले बाजार में इसकी बिक्री के फैसले से पिछले एक हफ्ते में गेहूं के दाम 10% घटे हैं। खाद्य मंत्रालय के बयान में यह भी दावा किया गया है कि फ़ूड कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया ने इस सप्ताह आयोजित की गई नीलामी के पहले दो दिन में अब तक थोक खरीदारों को ₹2474 प्रति क्विंटल की औसत दर से 9.2 लाख टन गेहूं बेचा है। लेकिन पैक्ड और ब्रांडेड आटा तो महंगा है ही, खुले बाजार में भी एक किलो आटे की कीमत कम से कम ₹36 हो गई है। मौसमी सब्जियों को छोड़कर घर की जरूरत के हर सामान की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है।
प्रश्न यह है कि महंगाई रोकने के विभिन्न सरकारी प्रयासों और खाद्यान्न मोर्चे पर देश की अच्छी स्थिति के बावजूद मूल्य क्यों बढ़ते जा रहे हैं? वास्तव में इसके लिए वायदा बाजार, जमाखोरी और महंगाई से संबंधित सरकार की अदूरदर्शी नीतियां जिम्मेदार हैं। देश ही नहीं दुनिया के अधिकांश अर्थ विशेषज्ञ कहते सुने जा रहे हैं कि भारत में कृषि जिंसों की कीमतें बढ़ने की मुख्य वजह वायदा कारोबार है। जबसे कृषि जिंसों का कमोडिटी एक्सचेंज द्वारा वायदा व्यापार शुरू किया गया है तभी से खाद्यान्न की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। सरकार ने समय-समय पर गेहूं , उड़द, अरहर, चावल, चना, सोया तेल, आलू, रब्बर आदि के वायदा कारोबार पर अस्थाई रोक लगाई। जब रोक लगती है तब इन वस्तुओं की तेजी से बढ़ती कीमतों पर थोड़ी बहुत लगाम लगती है, लेकिन कृषि जिंसों तथा अन्य वस्तुओं के अन्याय पूर्ण वायदा कारोबार से महंगाई बढ़ रही है और अरबों रुपए के कारोबार का धन कुछ चुनिंदा ऑपरेटरों की तिजोरी में जा रहा है।
गेहूं की बात करें तो यूपीए शासन के दौरान वर्ष 2007 में जब गेहूं के भाव आसमान छू रहे थे तब गेहूं की फ्यूचर ट्रेडिंग पर प्रतिबंध लगाया गया था, लेकिन जल्दी ही निष्कर्ष आया कि इससे कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि फ्यूचर कारोबारी वर्तमान और भविष्य की स्थितियों के विश्लेषण के बाद अपने फैसले लेते हैं और बाजार में हमेशा वस्तुओं की तरलता बनी रहती है। सैद्धांतिक तौर पर भी यही बताया जाता है की फ्यूचर ट्रेडिंग का उद्देश्य वस्तु के बाजार में हमेशा तरलता उपलब्ध कराना है ताकि हर समय उसके खरीदार और बिकवाल उपलब्ध हो। मोटे तौर पर यह उद्देश्य बहुत पवित्र भी लगता है, पर कई बार मामला उल्टा होता है और वास्तविक बाजार के भाव में भारी उठापटक हो जाती है। जिस तरह तेल का बाजार कुछ गिने-चुने खिलाड़ियों के हाथ में पहुंच गया है ठीक उसी तरह अब गेहूं का बाजार भी शेयर के कारोबार की तरह होता जा रहा है। हमें यह समझना होगा कि गेहूं का ताल्लुक लगभग सभी उत्तर भारतीयों से है, गेहूं का सीधा रिश्ता भूख से है।
पहले कोरोना फिर रूस यूक्रेन का युद्ध, साथ ही साथ पेट्रोल डीजल के बढ़ते दामों ने महंगाई की लपटों को भड़का दिया है। महंगे परिवहन की लागत जोड़ने से खाद्य वस्तुएं भी महंगी होती गई है। अनाज, खाद्य तेल, फल सब्जी सभी का परिवहन होता है, ऐसे में डीजल की बढ़ती लागत इन रोजमर्रा की जरूरी चीजों को और महंगी कर रही है। ऊंचे आसन पर बैठी खुदरा महंगाई दर की मार सभी वर्गों पर पड़ रही है। लॉकडाउन के बाद से ही आय घट जाने के कारण लोग जरूरी चीजों की खपत में या तो कटौती कर रहे थे या उसकी क्वालिटी से समझौता। अब दूध और आटा के दाम बढ़ जाने के कारण पशोपेश में पड़ गए हैं। जाहिर है कि महंगाई दर घूम फिर कर उपभोक्ता की ही जेब पर डाका डालती है, क्योंकि उत्पादक तो बढ़ी हुई लागत ग्राहकों से वसूल लेते हैं।
बेशक कोई सरकार नहीं चाहेगी कि महंगाई रोक पाने में नाकामी के नाम पर उसे घेरा जाए। लेकिन महंगाई अनेक कारकों का दुष्चक्र जैसा होता है, जिसमें किसी एक कारक को साध लेने से बात नहीं बनती।बेरोजगारी, कम उत्पादन, वस्तुओं की मांग आपूर्ति को साधे रखने में कारगर व्यवस्था आदि तमाम ऐसे कारक हैं, जिन पर गौर करना होता है। सरकारें इसके लिए प्रयास भी करती हैं, लेकिन थोड़ी बेपरवाह भी हो जाती हैं। क्योंकि हाल के वर्षों में देखा गया है महंगाई अधिकांशत राजनीति का मुद्दा नहीं बन पाती। जज्बाती हो चले राजनीतिक मुद्दों के बीच बेरोजगारी, महंगाई, आर्थिक बेहतरी जैसी बातें चुनाव के समय अपने मायने खो बैठती हैं।
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देश के लोगों को महंगाई की पीड़ा से बचाने के लिए हमें तुरंत कुछ जरूरी कदम उठाने होंगे। हमें यह समझना होगा कि केवल रिजर्व बैंक की कठोर मौद्रिक नीति से महंगाई नहीं रुकेगी। अमृत काल के अपने पहले बजट में सरकार ने अगले 25 सालों में बेहतर विकास की संकल्पना प्रस्तुत की है, इसकी सराहना भी हो रही है लेकिन आम आदमी की अपेक्षा यह भी है कि बच्चों के लिए जरूरी और बिना दांत के बुजुर्गों को मजबूरी में परोसे जाने वाले दूध-रोटी को महंगाई डायन की आंख ना लगे।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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