OI Defence: भारत में क्यों खरीद रहा चौथा S-400 मिसाइल सिस्टम? अभी कहां-कहां है तैनात? कब तक पहुंचेगी?
OI Defence: भारत की सुरक्षा ताकत को और मजबूत करने के लिए रूस निर्मित S-400 ट्रायम्फ एयर डिफेंस सिस्टम का चौथा स्क्वाड्रन जल्द भारत पहुंचने वाला है। भारतीय वायु सेना इस सिस्टम को "सुदर्शन चक्र" नाम से बुलाती है। मई 2025 में हुए 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान इसकी कथित भूमिका के बाद S-400 सिर्फ एक रणनीतिक रक्षा सिस्टम नहीं रहा, बल्कि अब इसे युद्ध में परखी गई तकनीक माना जा रहा है।
2018 में हुई थी डील
भारत ने अक्टूबर 2018 में रूस के साथ S-400 सिस्टम खरीदने के लिए करीब 5.43 बिलियन डॉलर यानी उस समय लगभग 40,000 करोड़ रुपये का बड़ा रक्षा समझौता किया था। इस डील में कुल पांच स्क्वाड्रन शामिल थे। यह समझौता सरकार-से-सरकार स्तर पर हुआ था।

तीन स्क्वाड्रन पहले से तैनात, चौथा रास्ते में
भारत को अब तक S-400 के तीन स्क्वाड्रन मिल चुके हैं, जिन्हें देश के रणनीतिक इलाकों में तैनात किया गया है। चौथा स्क्वाड्रन रूस से रवाना हो चुका है और इसी महीने भारत पहुंचने की उम्मीद है। वहीं पांचवें और अंतिम स्क्वाड्रन की डिलीवरी इस साल के अंत तक या 2027 की शुरुआत तक हो सकती है।
भारत खरीद सकता है 5 और S-400 सिस्टम
रिपोर्ट्स के मुताबिक, मई 2025 में भारत-पाकिस्तान तनाव और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान S-400 के प्रदर्शन के बाद भारत अब पांच अतिरिक्त S-400 स्क्वाड्रन खरीदने की योजना बना रहा है। इसके साथ लगभग 280 इंटरसेप्टर मिसाइलें भी खरीदी जा सकती हैं। अगर ऐसा होता है तो भविष्य में भारत के पास कुल 10 S-400 स्क्वाड्रन होंगे।
S-400 की अलग-अलग मिसाइलें क्या करती हैं?
40N6E मिसाइल 400 किलोमीटर तक के रणनीतिक एयर टारगेट को मार सकती है।
48N6 इंटरसेप्टर 250 किलोमीटर तक के फाइटर जेट और बैलिस्टिक मिसाइल को रोकता है।
9M96E2 मिसाइल 120 किलोमीटर तक क्रूज मिसाइल और स्टील्थ एयरक्राफ्ट के खिलाफ इस्तेमाल होती है। जबकि 9M96E कम दूरी के ड्रोन और लो-फ्लाइंग मिसाइलों को इंटरसेप्ट करती है।

भारत में कहां-कहां तैनात हैं S-400?
भारत ने S-400 को बेहद रणनीतिक जगहों पर तैनात किया है। एक स्क्वाड्रन सिलीगुड़ी कॉरिडोर यानी चिकन नेक इलाके में लगाया गया है, जो पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्से से जोड़ता है। दूसरा स्क्वाड्रन पठानकोट में तैनात है, जो जम्मू-कश्मीर और पंजाब को कवर करता है। इसके अलावा राजस्थान और गुजरात की पश्चिमी सीमा की सुरक्षा के लिए भी S-400 तैनात किया गया है।
आखिर S-400 इतना खास क्यों है?
रूस की सरकारी रक्षा कंपनी Almaz-Antey द्वारा तैयार किया गया S-400 दुनिया के सबसे एडवांस लंबी दूरी के एयर डिफेंस सिस्टम में गिना जाता है। इसकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह एक साथ कई तरह के हवाई खतरों को पहचान, ट्रैक और खत्म कर सकता है।
भारतीय एयर डिफेंस के लिए क्यों जरूरी है S-400?
भारतीय सैन्य रणनीतिकार S-400 को Layered and Network-Centric Air Defence Environment का अहम हिस्सा मानते हैं। यह सिस्टम दुश्मन के एयरक्राफ्ट और मिसाइलों को भारतीय सीमा के पास आने से पहले ही टारगेट कर सकता है। इससे भारत के संवेदनशील इलाकों के आसपास एक मजबूत सुरक्षा कवच तैयार होता है।
भारत के किन दुश्मनों के पास है S-400?
कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि S-400 ने 314 किलोमीटर दूर एक हाई-वैल्यू एयर टारगेट को इंटरसेप्ट किया। वहीं लगभग 200 किलोमीटर दूर एक JF-17 लड़ाकू विमान को भी निष्क्रिय करने की बात सामने आई। भारत के अलावा ये मिसाइल सिस्टम चीन और बेलारुस के पास भी है। साथ ही दावा किया जाता है कि इसके कुछ छोटे सिस्टम ईरान को भी दिए गए।
400 किलोमीटर तक मार करने की क्षमता
S-400 की सबसे लंबी दूरी वाली इंटरसेप्टर मिसाइल 40N6E लगभग 400 किलोमीटर दूर तक हवाई लक्ष्यों को निशाना बना सकती है। यानी दुश्मन के AWACS विमान, निगरानी एयरक्राफ्ट, रणनीतिक बॉम्बर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम को काफी दूर से ही ट्रैक और इंटरसेप्ट किया जा सकता है।
सिर्फ फाइटर जेट ही नहीं, ड्रोन और मिसाइल भी खतरे में
यह सिस्टम सिर्फ लड़ाकू विमानों के लिए नहीं बना है। S-400 क्रूज मिसाइल, बैलिस्टिक मिसाइल, स्टील्थ एयरक्राफ्ट, ड्रोन (UAV) और सटीक-निर्देशित हथियारों को भी रोक सकता है। इसकी यही मल्टी-रोल क्षमता भारत के लिए इसे बेहद अहम बनाती है।
चीन और पाकिस्तान दोनों के खिलाफ उपयोगी
भारत को पश्चिमी और उत्तरी दोनों सीमाओं पर अलग-अलग तरह के हवाई खतरों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में S-400 की मल्टी-लेयर क्षमता भारत को चीन और पाकिस्तान दोनों के खिलाफ मजबूत सुरक्षा देती है। S-400 अकेले काम नहीं करता। इसे भारत के बड़े एयर डिफेंस नेटवर्क के साथ जोड़ा गया है। यह भारतीय वायु सेना की Integrated Air Command and Control System (IACCS) का अहम हिस्सा है।
कैसे काम करता है भारत का एयर डिफेंस नेटवर्क?
IACCS नेटवर्क सेना और नागरिक दोनों तरह के रडार और सेंसर से रियल-टाइम डेटा जुटाता है। इसमें नेत्रा और फाल्कन जैसे एयरबोर्न वॉर्निंग सिस्टम, ग्राउंड रडार और निगरानी स्टेशन शामिल हैं। डेटा मिलने के बाद तय किया जाता है कि किस खतरे को कौन सा सिस्टम इंटरसेप्ट करेगा।
Saturation Attack में भी असरदार
अगर दुश्मन एक साथ कई ड्रोन और मिसाइलें दागे, तब भी यह मल्टी-लेयर सिस्टम प्रभावी रहता है। छोटे ड्रोन और कम दूरी के खतरे छोटे सिस्टम रोक लेते हैं और S-400 बड़े रणनीतिक खतरों पर फोकस करता है।
ऑपरेशन सिंदूर में क्या थी भूमिका?
6 मई से 10 मई 2025 के बीच भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान हुए 'ऑपरेशन सिंदूर' में S-400 की कथित भूमिका ने दुनिया का ध्यान खींचा। रिपोर्ट्स के अनुसार इस सिस्टम ने पाकिस्तानी एयर एक्टिविटी, ड्रोन और मिसाइलों को ट्रैक और इंटरसेप्ट किया।
भारत में बनेगा S-400 सर्विस सेंटर
रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत अब S-400 के लिए लोकल Maintenance, Repair and Overhaul (MRO) सुविधा बनाने की भी तैयारी कर रहा है। इससे सिस्टम की मरम्मत के लिए रूस पर निर्भरता कम होगी और भारतीय वायु सेना की ऑपरेशनल क्षमता बढ़ेगी।
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