Umar Khalid: 'बहनें कर सकती हैं मां का देखभाल',उमर खालिद की जमानत याचिका खारिज, क्यों नहीं मिली बेल?
Umar Khalid Court Dismisses Interim Bail: दिल्ली दंगों से जुड़े यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम) मामले में जेएनयू (JNU) के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद को अदालत से एक बार फिर बड़ा झटका लगा है। दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने उमर खालिद की 15 दिनों की अंतरिम जमानत याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। यह फैसला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि इसके ठीक एक दिन पहले देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम और बड़ी टिप्पणी की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बिना किसी कड़े सबूत के या ट्रायल शुरू हुए बिना किसी भी आरोपी को बहुत लंबे समय तक जेल की सलाखों के पीछे रखना असंवैधानिक है। सुप्रीम कोर्ट ने गुलफिशा फातिमा और उमर खालिद जैसे आरोपियों की जमानत के फैसलों को लेकर भी नाखुशी जाहिर की थी। लेकिन इस बड़ी टिप्पणी के बावजूद, निचले स्तर की अदालत ने उमर खालिद को किसी भी तरह की राहत देने से साफ इनकार कर दिया है।

मां की सर्जरी और चाचा की रस्म: कोर्ट ने दोनों दलीलों को किया फेल
उमर खालिद ने अदालत के सामने अंतरिम राहत मांगने के लिए दो मुख्य पारिवारिक वजहें सामने रखी थीं। पहली वजह यह थी कि उनके सगे चाचा का हाल ही में इंतकाल हो गया था, और उनकी याद में होने वाली 'चेहल्लुम' रस्म में शामिल होना जरूरी था। दूसरी और सबसे बड़ी वजह यह बताई गई कि 2 जून को उनकी मां की एक सर्जरी होनी है, जिसके पहले और बाद में देखभाल के लिए उनका घर पर रहना बेहद आवश्यक है।
कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समीर बजाज ने इन दोनों दलीलों को पूरी तरह से नाकाफी और असंतोषजनक माना। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर चाचा के साथ इतने ही गहरे और करीबी रिश्ते थे, तो उमर खालिद को उनके निधन के तुरंत बाद जमानत मांगनी चाहिए थी, न कि इतने लंबे समय के बाद। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी साफ किया कि पहले की तारीखों में अंतरिम जमानत मिलने और शर्तों का पालन करने का मतलब यह कतई नहीं है कि आरोपी को हर बार आसानी से जमानत दे दी जाए।
'मां की देखभाल के लिए बहनें और पिता हैं सक्षम'
अदालत ने मां की बीमारी और उनके ऑपरेशन वाले तर्क पर भी अभियोजन पक्ष यानी दिल्ली पुलिस की दलीलों को सही माना। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से लिखा कि मेडिकल रिपोर्ट और जांच के मुताबिक यह एक सामान्य और रूटीन सर्जरी है, जिसमें सिर्फ शरीर की एक सामान्य गांठ (गांठ हटाने की प्रक्रिया) को निकाला जाना है। इस मामूली प्रक्रिया के लिए खुद उमर खालिद की मौजूदगी का होना कोई ठोस मजबूरी नहीं नजर आता।
अदालत की बड़ी टिप्पणी: कड़कड़डूमा कोर्ट ने कहा कि उमर खालिद के परिवार में उनकी अन्य बहनें भी मौजूद हैं जो मां की अच्छे से देखभाल कर सकती हैं।
इसके अलावा उनके पिता भी पूरी तरह से सक्षम हैं और वे अस्पताल से लेकर घर तक की जिम्मेदारियां संभाल सकते हैं। ऐसे में आवेदक की कोई विशेष जरूरत दिखाई नहीं देती, इसलिए मानवीय आधार पर भी यह मांग उचित नहीं है।
दिल्ली पुलिस का कड़ा विरोध और दंगों की वो बड़ी साजिश
इस पूरी सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस ने उमर खालिद की रिहाई का पुरजोर विरोध किया। सरकारी वकील ने दलील दी कि यह पूरा मामला बेहद संवेदनशील है और इसका समाज पर बहुत गहरा असर पड़ सकता है। पुलिस ने आशंका जताई कि अगर उमर खालिद को इस मोड़ पर 15 दिनों के लिए भी बाहर आने दिया गया, तो इससे कानून व्यवस्था और प्रशासन के काम में बड़ी बाधा आ सकती है। पुलिस ने इस याचिका को पूरी तरह से आधारहीन और तत्काल खारिज करने योग्य बताया।
उमर खालिद पर दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश रचने के आरोप में एफआईआर 59/2020 (FIR 59/2020) के तहत मामला दर्ज है। उन पर बेहद कड़े कानून यूएपीए (UAPA) की धारा 13, 16, 17, 18 के साथ-साथ आर्म्स एक्ट और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की गंभीर धाराएं लगाई गई हैं।
इस हाई-प्रोफाइल मामले में आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन, सफूरा जरगर, खालिद सैफी, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान और शरजील इमाम जैसे कई नाम शामिल हैं, जिनके खिलाफ पहले ही मुख्य और सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है। फिलहाल, निचली अदालत के इस कड़े रुख के बाद उमर खालिद के वकीलों के पास अब दोबारा ऊपरी अदालत का दरवाजा खटखटानी की चुनौती होगी।














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