मंदी, महंगाई और बढ़ती ईएमआई की लुकाछिपी का खेल
मंदी आई फिर महंगाई आई। यह सब तो मध्य वर्ग सुनता रहता है लेकिन जब उसे बताया जाता है कि महंगाई की जो मार उस पर पड़ती है उसका प्रभाव कम करने के लिये उसकी ईएमआई बढ़ा दी जा रही है तो वह भ्रमित हो जाता है। एक हाथ से महंगाई यदि कम की जा रही है तो दूसरे हाथ से बढ़ी ईएमआई के रूप में पैसा वापस क्यों ले लिया जा रहा है?

कई जगह दिक्कत वहां हो जाती है जहां घरेलू खर्च बढ़ा तो पांच हजार लेकिन ईएमआई बढ़ गई दस हजार। मंहगाई से लड़ने की जो दवाई दी गई वह फायदा पहुंचाने की जगह नुकसान कर गई।
आइये समझते हैं मंदी से महंगाई फिर बढ़ती ईएमआई का ये भ्रमजाल कैसे काम करता है। प्रथम चक्र है मंदी। मंदी का आशय होता है कि जब लम्बे समय तक बाजार में लोग सामान और सेवाएं खरीदना कम कर देते हैं क्यूंकि उनकी क्रय शक्ति कम हो गई है तो बोला जाता है कि मंदी आ गई।
जब लोग खरीदना कम कर देते हैं तो मांग कम हो जाती है और कंपनियां उत्पादन और सेवाएं कम कर देती हैं। जब वह उत्पादन कम कर देती हैं तो व्यापारी का बेचना भी कम हो जाता है। इस प्रकार सौदों का आकार उद्योग व्यापार से लगाकर उपभोक्ता तक काफी कम हो जाता है। यही जीडीपी के घटे आकंड़ों में परिलक्षित होने लगता है।
मांग कम हुई तो आपूर्ति कम हुई और इसे ही बोलते हैं कि मंदी आ गई। इस मंदी का चौतरफा असर पड़ता है। इससे सिर्फ जीडीपी नहीं घटती, बल्कि आमदनी, रोजगार, औद्योगिक उत्पादन, रिटेल बिक्री सबमें गिरावट आती है।
अब शुरुआत होती है दूसरे चक्र की। इस मंदी का मुकाबला करने के लिए सरकारें अपने अन्य प्रयासों के अलावा केंद्रीय बैंक को भी जिम्मेदारी देती हैं। केंद्रीय बैंक लोगों की क्रय शक्ति बढाने के लिए अपनी मौद्रिक नीति का सहारा लेती हैं और अपना रेपो रेट कम कर देती है। जैसे ही रेपो रेट कम होता है, बैंक बाजार में अपने ऋण पर ब्याज कम कर देते हैं फलस्वरूप ईएमआई की राशि कम हो जाती है। अब चूंकि किश्त कम पड़ती है तो कुछ पैसा पहले की तुलना में हाथ में बच जाता है इससे उसके पास क्रय शक्ति का निर्माण होने लगता है।
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ईएमआई सस्ती होने पर अन्य लोग भी लोन पर सामान खरीदने लगते हैं। चूंकि फैक्ट्रियों में मंदी के कारण उत्पादन कम हुआ था तो कुछ क्षण के लिए स्थिति ऐसी आती है कि बाजार में लोगों के पास किश्त कम होने से क्रय शक्ति तो आ गई लेकिन जितनी मांग बढ़ी उतनी गति से उत्पादन और आपूर्ति नहीं बढ़ सका। उसे बढ़ने में तो समय लगता है।
ऐसे में बाजार में मांग ज्यादा हो जाती है लेकिन आपूर्ति कम। यह स्थिति लम्बी चली तो मांग आपूर्ति के सामान्य नियम के कारण चीजों का मूल्य बढ़ जाता है। इसके बारे में बोलते हैं महंगाई आ गई।
तीसरे चक्र में ऋण से जुड़ी क्रय शक्ति है। मांग के सापेक्ष आपूर्ति की समीक्षा अपनी मौद्रिक नीति कमेटी में केंद्रीय बैंक करते रहते हैं। जब उन्हें लगता है कि जितनी क्रय शक्ति उन्होंने बढ़ाई है उससे लोगों के पास सरप्लस पैसा आ गया है लेकिन उसके सापेक्ष आपूर्ति नहीं बढ़ी है तो ब्याज दर बढ़ा देते हैं।
यदि उसके सापेक्ष आपूर्ति आ गई है या मंदी का खतरा बना हुआ है तो रेपो रेट स्थिर रखते हैं। रेपो रेट अगर बढ़ाते हैं तो लोन महंगे हो जाते हैं। लोग नए लोन लेने से पहले सोचने लगते हैं। ऐसे में बाजार में सरप्लस पैसा जो लोगों के हाथों में था उसे बैंक पुनः अपने पास खींच लेती है। इससे बाजार में खरीददारी कम होने लगती है और वस्तु का मूल्य नीचे आने लगता है। यही कारण है कि मंदी महंगाई और ईएमआई का लुकाछिपी का खेल चलता रहता है।
अब इस तीसरे चक्र के बाद जो चौथा चक्र आता है वह है ग्लोबल ग्रोथ का प्रभावित होना। क्यूंकि लोगों की वास्तविक आमदनी, नेट इन हैंड और कंज्यूमर कॉन्फिडेंस गिरता जाता है, ऐसे में बेरोजगारी और सामाजिक अशांति बढ़ सकती है। इसी कारण सेंट्रल बैंक की प्राथमिकता इकोनॉमिक ग्रोथ को सपोर्ट करने की जगह महंगाई को काबू करना हो जाता है और वह ब्याज दर बढ़ाने लगती है।
अगर वैश्विक स्तर की अब बात करें तो खाद्य और ईंधन बुनियादी जरूरतें हैं और इनके दाम ज्यादा बढ़े हैं। वर्ल्ड बैंक की जुलाई 2022 की रिपोर्ट के अनुसार 125 से अधिक देशों में खाद्य महंगाई 5 फीसदी ज्यादा थी। डॉलर महंगा होने से उन देशों के लिए स्थिति ज्यादा खराब होगी जो खाद्य का आयात ज्यादा करते हैं। पहले कोरोना बाद में रूस यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक सप्लाई चेन की कमर तोड़ दी है। भारत ही नहीं अमेरिका और यूरोप भी रिकॉर्ड महंगाई से जूझ रहे हैं।
इंग्लैंड यूरो जोन से बाहर है, फिर भी वहां अक्टूबर में महंगाई 13 फीसदी के पार कर जाने का अंदेशा है। वहां असंतोष लगातार बढ़ रहा है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के सर्वे में शामिल अर्थशास्त्रियों का कहना है कि 2022 के बचे महीनों और 2023 में ग्लोबल ग्रोथ रेट कम रहेगी। महंगाई ऊंची बनी रहेगी और इस वजह से महंगाई को समायोजित करने के बाद की वास्तविक आमदनी जिसे रियल वेज कहते हैं घटती रहेगी, गरीबी बढ़ती रहेगी। इसे नीचे लाने में दो साल लग सकते हैं। वास्तविक आमदनी घटने पर गरीबी बढ़ती है।
इसलिए विश्व बैंक का अनुमान है कि गरीबी के लिहाज से साल 2022 इस सदी में दूसरा सबसे बुरा साल होगा। इससे बुरा सिर्फ 2020 का कोरोना वर्ष था। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के सर्वे में 60 फीसदी अर्थशास्त्रियों ने उच्च आय वाले देशों और 90 फीसदी ने कम आय वाले देशों में गरीबी बढ़ने का अंदेशा जताया है। अमेरिका इसे कम करने हेतु सितंबर तक पांच बार में ब्याज में 3 फीसदी की बढ़ोत्तरी कर चुका है। यूरोपियन सेंट्रल बैंक ने पिछले महीने ब्याज दर 0.75 फीसदी बढ़ाए हैं। इससे पहले वह जुलाई में 0.5 फीसदी बढ़ा चुका था। इधर भारत भी वही कर रहा है।
भारत की बात करें तो कोरोना काल के बाद रूस यूक्रेन युद्ध ने सप्लाई चेन की कमर तोड़ दी है, तेल गैस की डिमांड ज़्यादा और सप्लाई कम होने की वजह से दाम बढ़े हैं। इसी वजह से रोजमर्रा के ज़रूरी सामान की कीमतें भी बढ़ीं हैं। बाजार में गैर-जरूरी डिमांड भी है, जो महंगाई को और ऊपर लेकर जा रही है। महंगाई से पार पाने के लिए इसे नियंत्रित करना सबसे पहला उपाय है।
हालांकि सरकार मान रही है की ब्याज दर बढ़ने से डिमांड कम होगी और इसके कम होने से कमोडिटी और क्रूड के दाम कम होंगे तो महंगाई भी कम होगी, लेकिन इससे नेट इफेक्ट निगेटिव हो सकता है। क्योंकि दूसरे देशों में मंदी के कारण निर्यात भी कम होगा।
अभी जो महंगाई बढ़ी है उसका सीधा संबंध जनता के हाथ में आने वाले पैसे से कम और वैश्विक परिस्थितियों से अधिक है। फिर भी सरकार को इसे नियंत्रित करने के उपाय करने होंगे, नहीं तो हताशा और निराशा का एक और दौर जारी हो सकता है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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