भंसाली की हीरामंडी में लाहौर के हिंदू गायब
Heeramandi: आधुनिक लाहौर के निर्माता सर गंगाराम ने लाहौर की हर आधुनिक इमारत डिजाइन की थी, जैसे म्यूजियम, पोस्ट ऑफिस, नेशनल कॉलेज, केमिकल लेबोरेटरी, हॉस्पिटल आदि। लेकिन उसी वक्त के लाहौर को फिल्माते वक्त संजय लीला भंसाली ने अपनी वेब सीरीज 'हीरामंडी' से हिंदुओं को मानो गायब ही कर दिया है।
'हीरा मंडी: द डायमंड बाजार' की कहानी है लाहौर में जिस्म के बाजार हीरा मंडी के एक कोठे की। इस कोठे की हुजूर हैं मल्लिका जान (मनीषा कोइराला)। मल्लिका जान और उसका आशिक नवाब जुल्फिकार (शेखर सुमन) मल्लिका की छोटी बहन (सोनाक्षी सिन्हा) के बेटे की हत्या कर आत्महत्या का रूप दे देते हैं और मल्लिका बहन की सम्पत्ति पर कब्जा कर बन जाती है हीरा मंडी की मल्लिका।

वेब सीरीज की कहानी अपनी जगह, लेकिन सवाल उठते हैं संजय लीला भंसाली के आजादी के पहले के लाहौर को पूरी तरह 'मुस्लिम लाहौर' दिखाने और इतिहास के साथ छोटे से खेल को लेकर। एक तो गलती भी है कि कैसे कहानी भारत छोड़ो आंदोलन के आसपास चल रही है, और आखिरी एपिसोड में अंग्रेज अधिकारी कहता है कि भारतीय फौजें भी अंग्रेजी फौजों के साथ मिलकर लड़ेंगी। जबकि तब दूसरा विश्व युद्ध समाप्ति की ओर था। दूसरे भंसाली ने तब के लाहौर को शायद आज का लाहौर समझ लिया, जहां हिंदू ना के बराबर हैं, केवल उर्दू के अखबार चलते हैं और नवाबों का राज चलता है।
पूरी सीरीज में गिनती के हिंदू किरदार हैं। रिचा चड्ढा शायद इकलौती हिंदू नाम वाली तवायफ होती हैं। उसी तरह क्रांतिकारियों में केवल बलराज नाम का इकलौता हिंदू दिखता है जबकि कोठे के गाड़ीवान इकबाल और क्रांतिकारी गुरूदास को सिख दिखाया गया है। सच्चाई यह है कि जिस दौर के लिए सीरीज बनी है उसमें असहयोग आंदोलन के वक्त लाहौर में 38 प्रतिशत हिंदू सिख थे और भारत छोड़ो आंदोलन के वक्त 35 प्रतिशत।
भंसाली को ये भी पता होना चाहिए कि बीसवीं सदी में अशफाकुल्लाह खान के अलावा कोई भी मुस्लिम क्रांतिकारी चर्चा में नहीं आया था, लड़की तो भूल ही जाइए। आसफ अली, मौलाना आजाद जैसे नेता कांग्रेस के थे। ज्यादातर मुस्लिम उन दिनों या तो जिन्ना के साथ अलग पाकिस्तान की लड़ाई लड़ रहे थे, या उससे पहले खिलाफत आंदोलन के लिए लड़ रहे थे। खास बात यह है कि आजादी के आंदोलन के दौरान चंद्रशेखर आजाद का छद्म नाम बलराज ही होता था।
जिस मुस्लिम लड़की के अंग्रेज अफसर को सभा में भूनने की घटना दिखाई गयी है वो बंगाल की वीरांगना प्रीतिलता वाडेदार की कहानी से प्रेरित लगती है। पूरी सीरीज में कहीं भी गांधी, जिन्ना, नेहरू, लाला लाजपत राय तो छोड़िए भगत सिंह का नाम तक क्रांतिकारी नहीं लेते जबकि लाहौर में ही उन्हें फांसी दी गई थी। ये बात हजम नही होती। अगर भंसाली अपनी कहानी को पूरी तरह काल्पनिक रखना चाहते थे तो फिर आजादी की लड़ाई और लाहौर की हीरामंडी का नाम क्यों लिया गया? वैसे भी लाला लाजपत राय, भगत सिंह और आजाद की मौत के बाद लाहौर में कोई क्रांतिकारी घटना की जानकारी नहीं है। जानकारी मिलती है तो हिंदू मुस्लिम दंगों की जिसकी आग में अभिनेता प्राण का घर फूंक दिया गया था। उसके बाद गुस्से में वो कभी पाकिस्तान नहीं गए।
इसी विषय पर बनी फिल्म करण जौहर की 'कलंक' जरुर ये दिखाती है कि तब लाहौर में चौधरी (संजय दत्त) का हीरा मंडी की एक तवायफ से बेटा जफर (वरुण धवन) होता है, जिसे वो नहीं अपनाते। बाद में जब वो बदला लेना चाहता है तो उसका दोस्त अब्दुल शहर को हिंदू मुस्लिम दंगों की आग में झोंक देता है, जो लाहौर के हिंदू मुस्लिम दंगों की कहानियों से साम्य दिखाता भी है। लेकिन संजय लीला भंसाली द्वारा एक झटके में लाहौर के इतिहास से हिंदुओं को गायब सा करना, मुस्लिम लड़के लड़कियों को क्रांतिकारी बनाना, खिलाफत आंदोलन और मुस्लिम लीग के विभाजनकारी एजेंडे की चर्चा तक ना करना, लाहौर में एक भी रईस को हिंदू ना दिखाना आदि दिखाता है कि वेब सीरीज की आड़ में भंसाली कोई और ही सेकुलर एजंडा चला रहे हैं।
हीरा मंडी को डायमंड बाजार क्यों लिखा गया, इसको लेकर भी मन में सवाल हैं क्योंकि हीरा मंडी की स्थापना को लेकर दो ही जानकारियां मिलती हैं। मुगलों ने इसे नाच गाने मनोरंजन के लिए बसाया या फिर महाराजा रणजीत सिंह के करीबी अधिकारी हीरा सिंह डोगरा ने अनाज मंडी के तौर पर। फिर वेब सीरीज के नाम में डायमंड बाजार क्यों? ये भी जान लें कि पाकिस्तान में इस इलाके को लेकर अब तक दो फिल्में बनी हैं। दोनों के ही नाम में हीरा मंडी नहीं है। एक का नाम है 'टक्साली गेट', जो करीब में ही है और दूसरी 'शाही मोहल्ला'। दोनों ही पाकिस्तानी मूवीज में तवायफों को अंग्रेजों से लड़ते नहीं दिखाया, जैसे कि भंसाली दिखा रहे हैं।
लेकिन ऐसा लगता है कि बॉलीवुड की घिसी पिटी मुस्लिम तुष्टीकरण वाली नीति पर चलते हुए भंसाली ने उस समय के लाहौर को हिन्दू विहीन दिखा दिया जब लगभग 38-40 प्रतिशत हिन्दू सिख वहां रहते थे। भंसाली की वेब सीरिज वाली हीरामंडी में वहां आने वाले रईसों में एक भी हिंदू नहीं था जबकि कलंक मूवी में हिंदू रईस की ही कहानी थी।
सीरीज में दिखाया गया है कि दो अंग्रेज अफसरों पर तो मुस्लिम लड़कियों ने भी गोली चलाई थी जिसका इतिहास से कोई लेना देना नहीं लगता। लेकिन आम मुंबईया सेकुलर फिल्मकारों की तरह भंसाली भी इस बात के उस्ताद रहे हैं कि किस तरह से इस्लामिक सिद्धांतों और मुस्लिम योगदान को अपनी फिल्मों में बढा चढाकर दिखाया जाए ताकि वो हिन्दुओं से सुपीरियर दिखाई दें। हीरामंडी में भी उन्होंने यही करने का प्रयास किया है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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