Jammu and Kashmir: कांग्रेस को 370 से निपटना क्यों नहीं आ रहा?

Gujarat Assembly Elections 2022: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह गुजरात विधानसभा चुनाव में 370 खत्म करने का मुद्दा फिर से उठा रहे हैं। हिन्दू वोट बैंक को याद करवाए रखना उन के लिए जरूरी भी है, क्योंकि कश्मीर भारत के हिन्दुओं की वह दुखती रग है, जिससे वोट हासिल करना बहुत आसान है।

कांग्रेस बार बार भाजपा के एजेंडे में फंस कर खुद ही इस मुद्दे को जीवित कर देती है, वरना उसे पांच अगस्त 2019 के बाद भूल जाना चाहिए था, क्योंकि 370 का वह कलंक धुल गया था। लेकिन अमित शाह ने जैसे ही 13 अक्टूबर को गुजरात में अपने एक कार्यक्रम में नेहरू की उस गलती का फिर से उल्लेख किया, कांग्रेस के महासचिव जयराम रमेश ने अमित शाह को जवाब देने के लिए एक ट्विट किया, जिसमें उन्होंने 370 के साथ नोटबंदी का जिक्र कर के नरेंद्र मोदी पर भी चुटकी ली।
सोशल मीडिया पर की जा रही प्रतिक्रियाएं वोट बैंक पर कोई असर नहीं करतीं, न ही ये चुटकियाँ वोट बैंक घटाती या बढाती हैं।
फिर भी जयराम रमेश ने लिखा- "जवाहर लाल नेहरू नेहरू ने तानाशाही से संविधान में आर्टिकल 370 शामिल नहीं किया। चर्चा हुई थी, जो नोटबंदी के समय नहीं हुई। पटेल, अंबेडकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने आपत्ति नहीं जताई। जम्मू कश्मीर में काम कर चुके अय्यंगार ने ड्राफ्ट तैयार किया। इस पर किसी ने इस्तीफा नहीं दिया। शाह अपने साहब जैसे झूठ के सुपर-स्प्रेडर हैं!"
साहब उन्होंने नरेंद्र मोदी के लिए लिखा है। कांग्रेस देश के नागरिकों की नब्ज पहचानने में लगातार गलती कर रही है। उसे इतिहास की गलतियों से सबक लेना चाहिए और उन मुद्दों पर नहीं बोलना चाहिए, जो भारतीय जनता पार्टी का वोट बैंक बढाने में सहायक होती हैं। इस तरह की प्रतिक्रियाएं गढ़े मुर्दे उखाड़ने के सिवा कुछ नहीं होतीं। नेहरू का बचाव करने वाली प्रतिक्रिया देकर कांग्रेस खुद अपने जाल में फंस गई हैं, क्योंकि इंटरनेट के युग में आज का जागृत युवा तुरंत जानने की कोशिश करता है कि सच क्या था।
यही कारण है कि आम नागरिक भी ट्विटर पर जयराम रमेश को मुहंतोड़ जवाब दे रहे हैं, जैसे एक व्यक्ति ने उन्हें लिखा कि - "हम कांग्रेस के लोकतांत्रिक तरीकों को अच्छी तरह जानते हैं, इन्दिरा गांधी ने रातोंरात आपाकाल लागू कर दिया था, न जयराम रमेश को पूछा, न पी. चिदम्बरम को पूछा था। संसद को पूछने का तो सवाल ही कहाँ था, और ये इमरजेंसी तो निजी कारणों की वजह से लगाई गई थी, इमरजेंसी से जनता का कोई फ़ायदा नही था, सिर्फ तानाशाही ही थी। अगर जयराम रमेश सच्चे नेता है, तो इन्दिराजी की आलोचना करें !!"
संसद में जब 5-6 अगस्त 2019 को 370 खत्म की जा रही थी तब भी कांग्रेस ने नेहरू का बचाव करने की कोशिश की थी। लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने तो यहाँ तक कह दिया था कि कश्मीर क्योंकि विवादास्पद क्षेत्र है, इसलिए भारत की संसद को 370 पर एकतरफा फैसला लेने का अधिकार नहीं। उस बयान पर भी बवाल उठा था।
राज्यसभा में उस समय के विपक्ष के नेता और जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आज़ाद ने कहा था कि 370 के कारण ही जम्मू कश्मीर भारत को मिला था। असल में इसी बात में सारा राज छिपा हुआ है, जम्मू कश्मीर का विलय 370 की शर्त पर नहीं हुआ था, यह वायदा विलय के दस्तावेजों में कहीं नहीं है, बल्कि यह वायदा जवाहर लाल नेहरु ने शेख अब्दुल्ला से किया था, जो मुस्लिम बहुमत के कारण जम्मू कश्मीर का पाकिस्तान में विलय चाहते थे।
गुलाम नबी आज़ाद ने यही कहा कि 370 के वायदे के कारण शेख अब्दुल्ला सहमत हुए थे। उन दो दिनों में संसद के दोनों सदनों में बार बार जवाहर लाल नेहरू का जिक्र आया था। जिसमें कहा गया था कि नेहरू ने अवैध तरीके से राष्ट्रपति से संविधान में 370 को जुड़वा लिया था।
जयराम रमेश ने समुद्र में कंकड़ फैंक कर बहस को फिर से शुरू कर दिया, जिससे कांग्रेस को नुक्सान ही होगा। क़ानून मंत्री किरिन रिजीजू ने सोशल मीडिया पर ही जयराम रमेश से कुछ तीखे सवाल पूछ कर उन्हें उलझा दिया है।
जयराम रमेश ने कहा है कि नेहरू ने 370 को संसद से पास करवाया था और किसी ने विरोध नहीं किया था। उन की बात तथ्यों पर आधारित नहीं है। संविधान निर्माता समिति के चेयरमैन डॉ. भीमराव अंबेडकर जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने के पक्ष में नहीं थे। इसीलिए उन्होंने 370 का ड्राफ्ट तैयार नहीं किया था।
जयराम रमेश ने खुद अपने ट्विट में लिखा है कि ड्राफ्ट अय्यंगार ने तैयार किया था। सच यह है कि संविधान में जम्मू कश्मीर को विशेष अधिकार देने के लिए नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को अंबेडकर के पास भेजा था।
ब्लॉग लॉ कॉर्नर के अनुसार, अंबेडकर ने अनुच्छेद-370 का ड्राफ्ट बनाने से मना कर दिया, क्योंकि उन्हें लगता था कि इसकी जरूरत ही नहीं है। अंबेडकर को लगता था कि अगर जम्मू - कश्मीर राज्य के लिए अलग कानून बनता है तो भविष्य में कई समस्याएं पैदा करेगा, जिन्हें सुलझाना और उनसे निपट पाना मुश्किल हो जाएगा।
अगर अंबेडकर 370 पर सहमत होते तो वह खुद ड्राफ्ट तैयार करते। जयराम रमेश ने कहा है कि नेहरू लोकतांत्रिक थे और उन्होंने 370 पर संविधान सभा में सहमति ली थी। जबकि सच यह है कि संविधान सभा में 370 का कडा विरोध हुआ था, बहस के दौरान 370 के प्रारूप को फाड़ दिया गया था। अनेक सवाल पूछे गए थे, जिनका डा. अंबेडकर ने जवाब नहीं दिया था, वह चुप बैठे रहे, सभी सवालों के जवाब गोपालस्वामी आयंगर ने दिए थे, जो क़ानून मंत्री नहीं, बल्कि रेल मंत्री और संविधान सभा की ड्राफ्ट कमेटी के सदस्य मात्र थे। डा. अंबेडकर की चुप्पी में ही उनका विरोध छुपा था।
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जब डा. अंबेडकर ने 370 (पहले यह अनुच्छेद 306 ए था) का ड्राफ्ट बनाने से इंकार कर दिया था, तो नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को आयंगर के पास भेजा था। तब प्रधानमंत्री के निर्देश पर आयंगर ने ड्राफ्ट तैयार किया था। जयराम रमेश को क्या यह पता नहीं कि जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले इस अनुच्छेद पर कांग्रेस में भी कितने मतभेद थे, कांग्रेस कार्यसमिति ने भी इसे अस्वीकार कर दिया था।
यहीं से नेहरू के अलोकतांत्रिक होने का भंडाफोड़ हो जाता है कि कांग्रेस में असहमति के बावजूद उन्होंने शेख अब्दुल्ला की जिद्द के आगे संविधान सभा पर दबाव बना कर प्रारूप पास करवाया था। गोपालस्वामी आयंगर, पटेल, शेख अब्दुल्ला और उनके साथियों के बीच तीखी बहस हुई थी।
ड्राफ्ट बनाते समय शेख अब्दुल्ला के दबावों से आयंगर भी संतुष्ट नहीं थे। दरअसल आयंगर भी इसको उस तरह बनाने के लिए तैयार नहीं थे, जैसा शेख अब्दुल्ला चाहते थे। यहां तक कि आयंगर ने एक बार आजिज आकर संविधान सभा से इस्तीफा देने की धमकी भी दे डाली थी। 16 अक्टूबर को एक मसौदे पर सहमति बनी थी, लेकिन आयंगर ने बिना शेख अब्दुल्ला को विश्वास में लिए इसकी उपधारा-1 के दूसरे बिंदू में बदलाव कर दिया था।
इसी परिवर्तित रूप को उन्होंने संविधान सभा में पास भी करा लिया। हालांकि शेख अब्दुल्ला इस उप धारा से बेहद नाराज हुए और संविधान सभा से इस्तीफा देने की धमकी दी थी। वही उप धारा 370 खत्म करने के काम आई।
एनडीए सरकार ने 5 अगस्त 2019 को इसी उप धारा के कारण अनुच्छेद-370 को बहुत हल्का कर दिया, बल्कि यों कहें कि इसकी हवा ही निकाल दी।
कांग्रेस 370 पर नेहरू का असफल बचाव करने की बजाए चुप्पी साध कर श्रेय भी ले सकती है कि आयंगर की चतुराई के कारण ही मोदी सरकार 370 को आसानी से खत्म करने में कामयाब हुई। लेकिन नेहरू का मोह कांग्रेस नेताओं के लिए आत्मघाती सिद्ध होता जा रहा है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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