Gujarat Election 2022: क्या 'AAP' गुजरात में भाजपा के 27 साल के किले को भेद पाएगी, कुछ खास है इस बार का चुनाव
Gujarat Election 2022: गुजरात में विधानसभा चुनाव की तारीखों का जल्द ऐलान हो सकता है। चुनाव की तारीख करीब आने के साथ ही सियासी दलों के बीच रस्साकस्सी तेज हो गई है। गुजरात में चुनावी समीकरण इस बार पिछले चुनावों की तुलना में काफी अलग होने जा रहा है। दरअसल इस बार प्रदेश में मुख्य राजनीतिक भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के अलावा आम आदमी पार्टी की भी एंट्री हो रही है। जिस तरह से दिल्ली के बाद आम आदमी पार्टी ने पंजाब में जबरदस्त जीत दर्ज की है उसके बाद पार्टी के हौसले काफी बुलंद हैं। माना जा रहा है कि आम आदमी पार्टी गुजरात के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों की मुश्किल बढ़ा सकती है। आम आदमी पार्टी ने गुजरात को लेकर अपनी तैयारियां काफी तेज कर दी है। लगातार पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, राघव चड्ढा समेत कई नेता यहां जनसंपर्क कर रहे हैं, रैलियां कर रहे हैं।

गुजरात में पटेल वोटर्स निर्णायक
गुजरात में पिछले दो दशक से अधिक समय से भारतीय जनता पार्टी सत्ता में काबिज है। एक के बाद एक चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने लगातार जीत हासिल करके अपना वर्चस्व यहां दिखाया है। प्रदेश में विधानसभा की कुल सीटों की बात करें तो इसकी संख्या 182 है। जिसमे से भारतीय जनता पार्टी के पास 111 सीटें हैं, कांग्रेस के पास 62 सीटें हैं। यहां सत्ता बहुमत के लिए किसी भी दल को 92 सीटों की दरकार है। हालांकि आम आदमी पार्टी की प्रदेश में एंट्री ने चुनाव को और भी दिलचस्प बना दिया है। देखने वाली बात यह है कि क्या आम आदमी पार्टी कांग्रेस और भाजपा के सिर्फ वोट कम करने में सफलता हासिल करती है या फिर कुछ बड़ा उलटफेर कर सकती है।
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भाजपा-आप में पटेल वोटर्स को लुभाने की रणनीति
गुजरात चुनाव में पटेल वोटर्स की भूमिका काफी अहम होती है। यही वजह है कि हर दल पटेल वोटर्स को लुभाने की कोशिश करते हैं। आम आदमी पार्टी ने भी इसी कड़ी में गोपाल इटालिया को यहां का संयोजक बनाया है। प्रदेश में पटेल वोटों की बात करें तो उनकी कुल आबादी तकरीबन 15 फीसदी है, सीटों के लिहाज से कुल 70 सीटों पर इनका प्रभाव है। यानि साफ है कि पटेल वोटर्स प्रदेश में सरकार बनाने की कूबत रखते हैं। भाजपा ने पटेल वोटर्स को लुभाने के लिए गुजरात मुख्यमंत्री तक को बदल दिया। विजय रुपाणी रुपाणी ने पिछले साल इस्तीफा दे दिया और अब यहां भूपेंद्र भाई पटेल मुख्यमंत्री हैं। हार्दिक पटेल कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुए, मंत्रिमंडल में कई पाटीदार विधायकों को जगह दी गई।

पटेल वोटों रस्साकस्सी
भाजपा प्रदेश में 1995 के बाद से लगातार सत्ता में बरकरार है। हालांकि 2017 में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीटों का अंतर काफी कम हुआ था ,जिसकी बड़ी वजह हार्दिक पटेल का कांग्रेस में शामिल होना था, लेकिन जिस तरह से अब हार्दिक पटेल भाजपा के साथ आ गए हैं माना जा रहा है कि इस बार समीकरण बदल सकते हैं। मौजूदा मंत्रिमंडल में पटेल समाज से 7 मंत्री हैं। आम आदमी पार्टी भी पटेल वोटर्स की अहमियत को समझती है और यही वजह है कि वह लगातार पटेल समाज की बात अपने चुनावी अभियान, प्रचार में कर रही है। इसी समीकरण को साधने के लिए आप ने निकाय चुनाव में पटेलों को टिकट दिया, सूरत में 27 सीटों पर जीत दर्ज की और गोपाल इटालिया को प्रदेश का अध्यक्ष बना दिया।

समीकरण में पिछड़ती कांग्रेस
वहीं कांग्रेस को जहां मुख्य विपक्षी दल का दर्जा हासिल है लेकिन बावजूद इसके अभी तक गुजरात में कांग्रेस कुछ रफ्तार पकड़ती नहीं नजर आ रही है। पार्टी की ओर से कोई बड़ा नेता गुजरात में नजर नहीं आ रहा है। राहुल गांधी जो कांग्रेस जोड़ो यात्रा निकाल रहे हैं उसमे गुजरात शामिल भी नहीं है। रिपोर्ट की मानें तो पटेल वोटर्स को साधने के लिए कांग्रेस नरेश पटेल को साथ लाने की कोशिश कर रही है जोकि खोडलधाम ट्रस्ट के चेयरमैन हैं। हालांकि उन्होंने राजनीति में आने से इनकार कर दिया है। ऐसे में जिस तरह से कांग्रेस प्रदेश में निष्क्रिय नजर आ रही है माना जा रहा है कि वह दूसरे पायदान से फिसलकर तीसरे नंबर पर आ सकती है।

भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का सवाल
गुजरात भारतीय जनता पार्टी के लिए हमेशा से ही प्रतिष्ठा का सवाल रहा है। यहां खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गृह राज्य है। यही वजह है कि पार्टी के तमाम दिग्गज नेता यहां प्रचार में उतरते हैं। खुद प्रधानमंत्री मोदी, अमित शाह ने यहां प्रचार की कमान संभाल रखी है। दोनों ही नेता प्रदेश में भाजपा के 27 साल के एकछत्र राज को कतई हाथ से निकलने नहीं देना चाहते हैं। हालांकि जिस तरह से आम आदमी पार्टी ने यहां सेंधमारी शुरू की है उसको लेकर भारतीय जनता पार्टी इस बार थोड़ा ज्यादा सक्रिय और सजग नजर आ रही है। बहरहाल देखने वाली बात है कि क्या आम आदमी पार्टी भाजपा के तकरीबन तीन दशक के किले को भेद पाती है या सिर्फ वोट कटवा बनकर रह जाती है।












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