Forced Religious Conversion: जबरन धर्म परिवर्तन देश की सुरक्षा से खिलवाड़

Religion change

Forced Religious Conversion: 'केंद्र की तरफ से जबरन धर्मान्तरण को रोकने के लिये गंभीर प्रयास किये जाने चाहिये वर्ना बहुत कठिन स्थिति आ जायेगी। ऐसे मामलों को रोकने के उपाय बतायें जिनमें प्रलोभन के जरिये धर्म परिवर्तन किया जा रहा है।'

Forced Religious Conversion and security of the country

उपर्युक्त टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय बेंच ने की है। बेंच भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें उन्होंने जबरन धर्म परिवर्तन के मामलों को रोकने के लिए अलग से कानून बनाए जाने की मांग की है या फिर इस अपराध को भारतीय दंड संहिता में शामिल करने की अपील की गई है।

अश्विनी उपाध्याय ने यह भी कहा है कि यह मुद्दा किसी एक जगह से जुड़ा नहीं है बल्कि पूरे देश की समस्या है जिस पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। आखिर अश्विनी उपाध्याय को सुप्रीम कोर्ट में इस याचिका को लगाने की क्या आवश्यकता पड़ी? क्या प्रलोभन द्वारा जबरन धर्म परिवर्तन सच में किया जा रहा है? इन प्रश्नों के उत्तर जानने से पहले कुछ इसी प्रकार के मामलों की पड़ताल कर लेते हैं।

जबरन धर्म परिवर्तन के कुछ मामले

28 अक्तूबर, 2022 को मेरठ के मंगतपुरम बस्ती के 400 से अधिक लोगों ने जबरन या डरा-धमकाकर या प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन करवाने की शिकायत पुलिस से की। सभी का आरोप था कि कुछ ईसाई लोगों ने कोरोना लॉकडाउन के समय उनकी सहायता की थी और अब वे धर्म परिवर्तन का दबाव बना रहे हैं। कईयों के घरों से देवी-देवताओं की मूर्तियाँ हटा दी गईं तो कईयों को मंदिर जाने से भी रोका गया। यह भी आरोप लगा कि ईसाईयों ने बस्ती में चर्च बना दिया है और कई हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन करवा लिया गया है।

2020 में कोरोना महामारी के चलते लगे लॉकडाउन में मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से लगे हुए मंडीदीप में 3 हिन्दू बच्चे अपने माता-पिता से बिछड़ गये। जब वे भोपाल से सटे रायसेन जिले के गौहरगंज में मिले तो वे हिन्दू से मुस्लिम बना दिये गये थे। मामले का खुलासा भी तब हुआ जब शिकायत पर राष्ट्रीय बाल आयोग के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो रायसेन शिशु गृह का निरीक्षण करने पहुंचे।

इंदौर में 9 बच्चों के बाप साकिर मोहम्मद ने एक विधवा पंजाबी महिला को सहारा बनने के सपने दिखाकर लव जिहाद में फंसाया। जब उसका राज खुला तो आरोपी बोला कि धर्मांतरण करवाने और एक से ज्यादा औरतें रखने पर जन्नत मिलती है। महिला ने पुलिस में सुनवाई न होने के चलते मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ से न्याय की गुहार लगाई है।

जबरन धर्म परिवर्तन पर अभी क्या कानून हैं?

स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद भी देश में जबरन धर्म परिवर्तन की गतिविधि को रोकने के लिए कोई एकीकृत कानून नहीं है। 1950 में संविधान सभा में इस बारे में चर्चा की गई थी किन्तु कुछ निर्णय नहीं हुआ। हाँ, कुछ राज्यों ने आवश्यक इस दिशा में कदम उठाते हुये कानून बनाये हैं लेकिन वे नाकाफी हैं।

उड़ीसा में 1967 और मध्य प्रदेश में 1968 से जबरन 'धर्मांतरण' जैसी गतिविधियों को रोकने के लिये कानून बने हैं। उत्तर प्रदेश में फरवरी, 2021 में इसके लिये कानून पारित किया गया वहीं गुजरात सरकार ने गुजरात धर्म की स्वतंत्रता (संशोधन) विधेयक, 2021 को 15 जून से लागू किया। 1978 में अरुणाचल प्रदेश, 2000 व 2006 में छत्तीसगढ़, 2006 व 2019 में हिमाचल प्रदेश, 2017 में झारखंड, 2018 में उत्तराखंड में जबरन 'धर्मांतरण' के विरुद्ध कानून बनाये गए।

इन राज्यों के अलावा 2002 में तमिलनाडु और 2006 व 2008 में राजस्थान ने भी इस कानून को लागू किया लेकिन बाद में रद्द कर दिया गया। तमिलनाडु में 2006 में ईसाई अल्पसंख्यकों ने इसे रद्द करने के लिए प्रदर्शन किया था जिसके बाद इसे वापस ले लिया गया। वहीं राजस्थान में इस विधेयक को राज्यपाल और राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिल सकी।

जबरन धर्मांतरण पर सजा का प्रावधान

जिन राज्यों ने जबरन धर्मांतरण रोकने के लिये कानून बनाये हैं, लगभग सभी में सजा के प्रावधान एक से हैं जिनमें अपना धर्म/मजहब छिपाकर शादी करने वालों को 10 साल तक की सजा व 15,000 से 50,000 रुपये तक का जुर्माना, शादी के नाम पर धर्म परिवर्तन अवैध, जिलाधिकारी से अनुमति के बाद ही धर्मगुरु करवा सकेंगे धर्म परिवर्तन, धर्म परिवर्तन करने वालों के लिए भी जरूरी है जिलाधिकारी की अनुमति, तथा धर्म परिवर्तन कराने वाले संगठन की रद्द होगी मान्यता इत्यादि प्रमुख हैं। कहीं-कहीं राज्यों ने जुर्माने की रकम और सजा के वर्षों में वृद्धि की है।

संघ भी जता चुका है चिंता

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी जबरन धर्मांतरण से हो रही असमान जनसँख्या वृद्धि पर चिंता जाहिर करते हुये केंद्र सरकार से इस पर नीति स्पष्ट करने का सुझाव दिया था। अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे क्षेत्रों में जबरन धर्मांतरण में तेजी आई है जिससे भारत की संप्रभुता और अखंडता पर खतरा मंडरा रहा है।

वर्तमान में भारत में 9 राज्यों में हिन्दू अल्पसंख्यक हो चुके हैं जिनके संवैधानिक अधिकारों की मांग को लेकर अश्विनी उपाध्याय ने ही एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में लगाई है जिस पर सरकार से जवाब माँगा गया है।

वनवासी बनते हैं धर्मांतरण का सर्वाधिक शिकार

भारत के बड़े पैमाने पर वनवासी समाज को धर्मांतरित करने का कुचक्र दशकों से चल रहा है। प्रकृति पूजक होने के चलते उन्हें 'अहिंदू' पहचान दी जा रही है। इसी 'अहिंदू' पहचान के चलते मुस्लिम और ईसाई संगठन उनका बड़े पैमाने पर धर्मांतरण कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर चिंता व्यक्त की है और केंद्र की तरफ से महान्यायाभिकर्ता तुषार मेहता ने भी स्वीकार किया कि जबरन धर्म परिवर्तन के मामले वनवासी इलाकों में अधिक देखे जाते हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार का पक्ष जानने की बात कही है।

अब केन्द्र सरकार के पाले में गेंद

लोकतंत्र में धर्मनिरपेक्षता सबसे बड़ा छलावा है, खासकर भारत के परिपेक्ष्य में। चूँकि इसी धर्मनिरपेक्षता ने देश को बड़े-बड़े नासूर दिये हैं अतः सुप्रीम कोर्ट की चिंता वाजिब है और केन्द्र सरकार को वोट बैंक की राजनीति से परे इस विषय पर कठोर कानूनी प्रावधानों का मार्ग ढूंढना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में साफ कहा है कि संविधान के तहत धर्मांतरण कानूनी है लेकिन जबरन धर्मांतरण कानूनी नहीं है। अब गेंद सरकार के पाले में है कि वह जबरन धर्मांतरण को रोकने की दिशा में कितने बड़े और कड़े कदम उठाती है। मामले की अगली सुनवाई अब 28 नवंबर को होगी और सरकार का पक्ष भी पता चलेगा।

यह भी पढ़ें: Religious Conversion: यूपी में आर्थिक मदद के बहाने धर्मांतरण का धंधा

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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