कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव की तुलना दूसरे दलों से करना रफूगीरी है
बहुत दिन पहले किसी ने चर्चा में एक बात कही थी कि बिहार वाले यूपी के साथ तुलना कर अपने राज्य की बदहाली पर चिप्पी साटने की कोशिश करते हैं जबकि यूपी की अर्थव्यवस्था और वहाँ की आर्थिक स्थिति उनकी कल्पना से कहीं ज्यादा अच्छी है। कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव में यही हो रहा है। मीडिया का कांग्रेसी हिस्सा जिसे पत्रकार रंगनाथ सिंह "पालतू मीडिया" कहते हैं, यही कर रहा है। उसका दावा है कि चुनाव तो सपा और भाजपा में भी नहीं होते और ऐसे में आलाकमान से आशिर्वाद लेना क्या बुरा है?

सपा की बात तो अलग है क्योंकि वह पारिवारिक पार्टी है लेकिन बीजेपी में ऐसा नहीं है। वहाँ सर्वसम्मति से चुनाव होने की तुलना "10 जनपथ के आशिर्वाद" से करना उतना ही खराब है जितना शंघाई की तुलना मुंबई से करना। अभी लग सकता है कि मोदी-शाह का जो जलवा है उस वजह से सिर्फ उन्हीं की कृपा से जेपी नड्डा को अध्यक्षी मिली होगी, लेकिन बीजेपी-संघ के सिस्टम में ऐसा नहीं होता। नड्डा का नाम 2014 में भी उछला था जब अमित शाह अध्यक्ष बने थे, लेकिन वो इसलिए बने कि पार्टी ने प्रदर्शन और अनुभव को तरजीह दी।अमित शाह यूपी के प्रभारी थे और उन्होंने वहाँ योग्यता का परिचय दिया था। ये कहना कि बीजेपी में वर्तमान अध्यक्ष पूर्व अध्यक्ष के ही आशीर्वाद से बनता है, वो ठीक नहीं है।
अमित शाह राजनाथ सिंह या गडकरी के आशीर्वाद से अध्यक्ष नहीं बने थे। गडकरी से पहले भी राजनाथ थे, लेकिन गडकरी राजनाथ की कृपा से अध्यक्ष नहीं बने। सब जानते हैं कि संघ का मजबूत समर्थन उन्हें था। हाँ, ऐसा होता है कि जब बीजेपी में विराट कद के नेता आ जाते हैं, तो संघ उनकी बात सुनता ही है।
संघ ने वाजपेयी की भी बात सुनी और मोदी की भी सुन रहा है। लेकिन विचारधारा से जरा सा हिलने पर संघ विराट छवि वाले नेताओं को भी रास्ता दिखा देता है। आडवाणी का किस्सा सभी को पता है जब जिन्ना प्रकरण के बाद उन्हें इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया गया था। एक जमाने में बलराज मधोक के साथ भी ऐसा हुआ। पिछले 22 साल में भाजपा में दस बार अध्यक्ष चुने गये है और नौ लोगों ने इस पद को संभाला है। इसमें विवाद के लक्षण सिर्फ एक बार देखने को मिला जब जिन्ना विवाद पर संघ के दबाव में आडवाणी को 2005 में हटा दिया गया और राजनाथ सिंह अध्यक्ष बने। वो विवाद भी अध्यक्ष के चुनाव का नहीं था, बल्कि एक अध्यक्ष को हटाने को लेकर था।
लेकिन कांग्रेस में ऐसा नहीं हुआ। 1998 से लेकर आज तक एक ही परिवार के पास वो गद्दी है और उसकी तुलना बीजेपी से कर पैबंद को छिपाने की कोशिश की जा रही है। हाँ, ये कहा जा सकता कि बीजेपी के पास भी अपना "10 जनपथ" है जिसका नाम संघ परिवार है लेकिन वह रक्त संबंधों पर आधारित परिवार नहीं है। वहां भी मुखिया बदलते रहते हैं और वह किसी व्यक्ति को दशकों तक बीजेपी अध्यक्ष पद पर नहीं रहने देता। रही बात चुनाव की, तो जहाँ सर्वसम्मति से एक उम्मीदवार होगा, वहाँ डेलीगेट्स के वोट डालने की क्या जरूरत है?
बीजेपी ने अगर किसी एक नेता को चुन लिया तो उसके लिए वोटिंग करवाना जरूरी नहीं है। हाँ, कभी उस दल में दो-तीन आदमी दावेदार हो जाएँ, तो बात अलग है। लेकिन ऐसा अभी तक हुआ नहीं है। कांग्रेस की आलोचना सर्वसम्मति के लिए नहीं हो रही, उसकी आलोचना एक ही परिवार के पास देश की एक प्रमुख पार्टी की कमान को दशकों तक रखने के लिए हो रही है। ये दिखावा करने के लिए हो रही है कि उसके उम्मीदवार बीजेपी के सर्वसम्मत उम्मीदवार की तुलना में ज्यादा 'लोकतांत्रिक' हैं। हद तो यह है कि सर्वसम्मत उम्मीदवार कांग्रेस के पास नहीं है। वो आपसी झगड़े को लोकतंत्र बताना चाहते हैं और उसके पालतू पत्रकार इसका प्रचार भी करते हैं।
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कांग्रेस की तुलना करनी ही है तो सपा, राजद, डीएमके, शिअद या शिवसेना के परिवारवाद से की जानी चाहिए, न कि बीजेपी के सर्वसम्मति वाले उम्मीदवारों से। ये आधार भी गलत है, संदर्भ भी गलत है और विश्लेषण भी गलत है। कांग्रेस में एक जमाने में सर्वसम्मति सिर्फ नेहरू परिवार के उम्मीदवारों पर होता था, हालाँकि उम्मीदवार कहना उचित नहीं लगता। इंदिरा युग के बाद से पार्टी जिस परिपाटी पर चली है, उस हिसाब से नेहरू परिवार के लोग कांग्रेस के स्वामित्व की स्थिति में हैं और पार्टी उन पर उस तरह से निर्भर होती चली गई है कि वह स्वतंत्र उड़ान भरने के काबिल नहीं प्रतीत होती।
इतिहास में ऐसे उदाहरण जरूर आए जब ये कोशिश की गई या हालात ऐसे बने कि नेहरू परिवार से बाहर कांग्रेस का नेतृत्व गया लेकिन फिर पार्टी में सिरफुटौव्वल ही देखने को आया। नरसिंह राव या सीताराम केसरी का जमाना सभी को याद है और उनकी पार्टी से गरिमाविहीन तरीके से विदाई भी। हालाँकि ये कहना कि नेहरू परिवार हमेशा से सर्वसम्मति हासिल करता रहा, गलत है । इंदिरा गांधी के दौर में भी पार्टी टूटी थी और सोनिया गांधी के समय भी। लेकिन पार्टी सत्ता में वर्चस्व बनाने में सफल रही और जनता की निगाह में वही मुख्य कांग्रेस साबित हुई।
कांग्रेस की आपसी गुटबाजी और अध्यक्षीय चुनाव में ये मुद्दा नहीं है कि अध्यक्ष कौन बनेगा। अध्यक्ष के लिए कई नाम आए और गए, लेकिन कुछ नाम ऐसे थे जो पार्टी की इस ऐतिहासिक गिरावट के दौर में अध्यक्ष बनना नहीं चाहते थे। गहलोत का ही उदाहरण लें तो ऐसा साफ लगा कि उन्हें राजस्थान के मुख्यमंत्री की गद्दी, कांग्रेस अध्यक्ष पद से ज्यादा प्यारी है। स्वाभाविक हैं कि 'कांग्रेस में कई नेता माउंटबेटन नहीं बनना चाहते थे जिसके हाथों ब्रिटिश साम्राज्य के भारतीय हिस्से का अंत हुआ था'।
कांग्रेस के लिए ये सुकून की बात होनी चाहिए कि आखिरी घड़ी में कुछ नेता अध्यक्ष पद के लिए मैदान में आ गए, लेकिन गहलोत प्रकरण के बाद जिस तरीके से उनका अचानक से पदार्पण हुआ, वह संदेह पैदा करता है। कांग्रेस आलाकमान, जिसका अर्थ फिलहाल सोनिया गांधी और राहुल गांधी हैं, उन्हीं की प्रेरणा से कई-कई उम्मीदवार मैदान में आए और कइयों ने नाम वापस लिया है। फिलहाल मैदान में दो उम्मीदवार बचे हुए हैं और ख़बर आती रहती है कि शशि थरूर पर भी दबाव है कि वे नाम वापस ले लें ताकि सर्वसम्मति दर्शाई जा सके। जाहिर है, ऐसे में इस चुनाव की तुलना भाजपा या किसी भी अन्य दल के सर्वसम्मति वाले अध्यक्षों से करना ठीक नहीं है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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