यूपी में कितनी कारगर होगी नीतीश कुमार की मोदी स्टाइल में एंट्री?
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह उत्तर प्रदेश से लोकसभा चुनाव में ताल ठोंक सकते हैं। जदयू की उत्तर प्रदेश इकाई ने नीतीश को राज्य की चार सीटों से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया है। सीट कौन सी होगी, अभी तय नहीं है लेकिन फूलपुर लोकसभा सीट से उनके लड़ने को लेकर चर्चाएं चल रही हैं। मजबूत जातीय समीकरण को देखते हुए माना जा रहा है कि नीतीश इस सीट से लड़ सकते हैं।

प्रयागराज से सटे फूलपुर को देश का पहला प्रधानमंत्री देने का ऐतिहासिक गौरव प्राप्त है। फूलपुर वीआईपी सीट है। संभव है नीतीश पीएम बनने का टोटका यहीं से आजमायें। पंडित जवाहरलाल नेहरू, विजयलक्ष्मी पंडित, जनेश्वर मिश्रा, विश्वनाथ प्रताप सिंह, कमला बहुगुणा जैसे दिग्गजों के साथ अतीक अहमद, कपिल मुनि करवरिया सरीखे कुख्यात भी इस सीट की नुमाइंदगी कर चुके हैं।
नीतीश यूपी में मोदी को टक्कर देने की मंशा तो रखते हैं, लेकिन अरविंद केजरीवाल जैसी सीधे आर पार की टक्कर देने की हिम्मत नहीं दिखा रहे। बहरहाल, कुछ लोग मानते हैं कि फूलपुर की चर्चा को जनता में उछालकर जदयू नरेटिव सेट करने और माहौल बनाने की कोशिश में है। इस पर मिली प्रतिक्रिया के बाद नीतीश यूपी में अपना एजेंडा तय करेंगे।
नीतीश कुमार और नरेन्द्र मोदी में बुनियादी फर्क
नीतीश कुमार और नरेन्द्र मोदी में बुनियादी फर्क है। नीतीश के पास बेचने के लिये ऐसा कोई मॉडल नहीं है, जिसकी जमीन पर वह मजबूत सियासी किला तैयार कर सकें। 17 सालों के शासन के बावजूद बिहार की बदहाली और निरंकुश अपराध नीतीश की क्षमता पर सवालिया निशान है। निवेश के लिहाज से बिहार में कोई बिकाऊ मॉडल नहीं है, जिसे पेश करके नीतीश देश की जनता का भरोसा जीत सकें। नीतीश की बिहार के बाहर स्वीकार्यता न्यून है। मोदी के मुकाबले तो बेहद कम। उनकी छवि सर्वसमाज के समावेशी लीडर की बजाय केवल कुर्मी नेता की है, जो उनके अगला मोदी बनने की राह में सबसे बड़ी बाधा है। साथ ही यूपी में जदयू का संगठन न होना भी कमजोर कड़ी है।
इसके विपरीत गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी जब 2014 में चुनाव लड़ने यूपी आये, तब उनके पास गुजरात के विकास मॉडल की शानदार ब्रांडिंग थी। निवेश का माहौल तैयार करने वाले सीएम की छवि थी। सभी जातियों को एकजुट करने वाले हिंदूवादी नेता का आभामंडल था। विपक्ष के दागे गये आरोपों को जीत का आभूषण बना लेने का हुनर था। यूपी में भाजपा का मजबूत एवं प्रभावी संगठन था। कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार से उबी हुई जनता थी। भ्रष्टाचार से परेशान लोग थे। गोधरा कांड का ध्रुवीकरण था और उसके ऊपर नरेंद्र मोदी के धुंआधार भाषण थे।
भाजपा के प्रदेश मंत्री डा. चंद्रमोहन यूपी से नीतीश के लड़ने और भाजपा की संभावनाओं के सवाल पर कहते हैं, "यूपी में 2014 के बाद से जातीय राजनीति का सफाया हो चुका है। बीते चार चुनावों में यूपी की जनता ने जातियों की राजनीति करने वाले दलों को आईना दिखाया है। नीतीश यूपी में सपा-बसपा से मजबूत गठबंधन के पर्याय नहीं बन सकते हैं। राज्य की जनता जब इन दोनों दलों के गठबंधन को नकार चुकी है तो नीतीश को लेकर मुझे नहीं लगता कि बहुत चिंता करने की बात है। मोदी और योगी के नेतृत्व में सभी वर्ग का विकास हो रहा है इसीलिये जाति की राजनीति और इसी आधार पर काम करने वालों को जनता ने जवाब दे दिया है।"
मंडल और कमंडल की वापसी की उम्मीद
नीतीश कुमार मंडल की राजनीति के सहारे कमंडल और विकास की सियासत को पटखनी देना चाहते हैं। वह भी तब, जब यूपी में बीते आठ सालों में चार बार जातीय राजनीति का प्रयोग फेल हो चुका है। वर्ष 2014, 2017, 2019 और 2022 के चुनाव में यूपी ने मंडल सियासत से उभरी जातीय राजनीति की ताबूत में कई कीले ठोंकी है। यूपी में चुनावी लिहाज से भाजपा के सामने सपा-बसपा से मजबूत विपक्षी जातीय गठबंधन दूसरा कोई नहीं है। 2019 में नरेंद्र मोदी एवं योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा इस मजबूत गठबंधन को धूल चटाकर अपना दल के साथ 64 सीटें हासिल की। बीते उपचुनाव में भाजपा ने आजमगढ़ और रामपुर जैसी सपा की परंपरागत सीटें भी छीन ली। पिछड़ों की जिस राजनीति के सहारे नीतीश मोदी को हराने निकले हैं, बीते आठ सालों में वही भाजपा की सबसे बड़ी ताकत है।
समाजवादी पार्टी ने नीतीश कुमार के यूपी से लड़ने को लेकर अपनी कोई स्पष्ट राय जाहिर नहीं की है, पर माना जा रहा है कि मोदी को हटाने के लिये अखिलेश यादव विपक्षी एकता और पिछड़े समाज को एकजुट करने के नाम पर नीतीश को चार से पांच सीट दे सकते हैं। सपा मान कर चल रही है कि यूपी में यादव और मुस्लिम के साथ कुर्मी वोटरों की ताकत मिलने पर भाजपा के लिये कई सीटों पर मुश्किल खड़ी हो सकती है। यूपी में भाजपा को कम सीटों पर समेटकर खेल बिगाड़ा जा सकता है। बीते चार चुनावों से कुर्मी वोटरों का बड़ा हिस्सा एनडीए गठबंधन के साथ है।
सपा के वरिष्ठ नेता एवं विधान परिषद सदस्य आशुतोष सिन्हा नीतीश के यूपी आने के सवाल पर कहते हैं, "अब तक देश के अधिकांश प्रधानमंत्री यूपी से बने हैं, संभव है कि नीतीश भी इसी को चरितार्थ करने का प्रयास कर रहे हैं। भाजपा सरकार से गरीब, अमीर, दलित, पिछड़ा, अगड़ा सब दुखी है। महंगाई और बेरोजगारी से परेशान जनता बदलाव चाहती है। नीतीश के साथ आने से निश्चित ही समीकरण बदलेंगे। मोदीजी गुजरात से आकर यूपी से चुनाव लड़ सकते हैं तो नीतीश कुमार यहां क्यों नहीं आ सकते?"
केवल नीतीश का सपा के साथ आना भाजपा की हार की गारंटी नहीं है। भाजपा के सामने दिक्कतें जरूर हैं, लेकिन उसके पास अपना दल की ताकत है। वरिष्ठ पत्रकार मनोज श्रीवास्तव कहते हैं, "यूपी में अनुप्रिया पटेल के बदले यहां का कुर्मी वोटर नीतीश को अपना नेता मान लेगा, ऐसा मान लेना भी सियासी अपरिपक्वता है। नीतीश को फूलपुर जैसी कुर्मी बाहुल्य सुरक्षित सीट की तलाश है। यही नीतीश की मानसिक हार है। डर की मानसिकता के साथ जीत का प्रभाव पैदा करना मुश्किल होता है।"
नीतीश के प्रहार की ढाल बनेगी अनुप्रिया पटेल?
नीतीश का यूपी आना बड़ा प्रभाव पैदा करता भले ही नहीं दिख रहा हो, लेकिन भाजपा की सबसे बड़ी मुश्किल है कि उसके पास जनाधार वाला कुर्मी लीडर नहीं है। भाजपा ने संतोष गंगवार, ओम प्रकाश सिंह, अनुराग सिंह पटेल, मुकुट बिहारी वर्मा, विनय कटियार, राम कुमार वर्मा, शशांक वर्मा, रुद्रसेन चौधरी, पदमसेन चौधरी, प्रेमलता कटियार, नीलिमा कटियार, राजलक्ष्मी वर्मा, कौशलेंद्र पटेल से लेकर स्वतंत्रदेव सिंह समेत कई कुर्मी नेताओं को आगे बढ़ाया, लेकिन ये अपने जिलों के नेता बन कर रह गये। भाजपा ने इनको पिछड़ों की लीडरशिप के रूप में आगे बढ़ाया, लेकिन ये अपनी जाति के लीडर भी नहीं बन पाये।
योगी सरकार के कैबिनेट मंत्री तथा प्रदेश अध्यक्ष रहे स्वतंत्रदेव सिंह का नेतृत्व होने के बावजूद भाजपा ने चुनाव में अपना दल का सहारा लिया। इस संदर्भ में डा. चंद्रमोहन कहते हैं, "भाजपा जातीय राजनीति पर भरोसा नहीं करती है। पार्टी सभी वर्ग के लोगों को साथ लेकर चलने में विश्वास करती है। सभी वर्ग के लोगों को साथ लेकर चलने वाले दल को जाति की राजनीति करने की आवश्यकता नहीं है।" डा. चंद्रमोहन भले ही जातीय राजनीति की बात से इनकार करते हों, लेकिन नीतीश के सामने यूपी में ढाल अनुप्रिया पटेल ही बनेंगी, क्योंकि भाजपा का कोई अपना कुर्मी क्षत्रप नहीं है।
यह भी पढ़ेंः इंडिया गेट से: बिहार, महाराष्ट्र और यूपी में दलित वोटर भाजपा के साथ क्यों?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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