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Congress Meeting: डमी सीडब्ल्यूसी बनाएगी राहुल को पीएम बनाने की रणनीति

कांग्रेस अधिवेशन में राहुल गांधी को विपक्ष का प्रधानमंत्री उम्मीदवार प्रोजेक्ट करके चुनाव मैदान में उतारने का प्रस्ताव पास करने का जोखिम नहीं उठाया जायेगा।

Congress Plenary Session In Raipur Dummy CWC will make strategy to make Rahul gandhi PM

Congress Meeting:कांग्रेस का 85वां अधिवेशन रायपुर में शुरू हुआ, लेकिन गांधी परिवार का कोई भी सदस्य स्टीयरिंग कमेटी की मीटिंग में नहीं गया| मीटिंग शुरू होने से पहले ही बता दिया गया कि मल्लिकार्जुन खड़गे को फ्री हैण्ड देने के लिए गांधी परिवार का कोई सदस्य मीटिंग में नहीं जाएगा| इस पर मुझे वह दिन याद आ गया, जब कांग्रेस मुख्यालय 24 अकबर रोड पर कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हो रही थी| सीताराम केसरी कांग्रेस अध्यक्ष थे, वह अपने कमरे में बैठे थे और कार्यसमिति ने उन्हें हटा कर सोनिया गांधी को अध्यक्ष चुन लिया था| कुछ क्षण के भीतर ही सोनिया गांधी पिछले दरवाजे से कांग्रेस दफ्तर में आ गई थी और उन्होंने कांग्रेस की कमान संभाल ली थी| तो इसलिए गांधी परिवार का किसी बैठक में जाना न जाना मायने नहीं रखता|

Congress Plenary Session In Raipur Dummy CWC will make strategy to make Rahul gandhi PM

स्टीयरिंग कमेटी में लिखी लिखाई स्क्रिप्ट के मुताबिक़ ही फैसले होने थे, जैसे 5 मार्च 1998 को हुआ था| स्टीयरिंग कमेटी का मुख्य मुद्दा यह था कि कांग्रेस कार्यसमिति के चुनाव करवाए जाएं या अध्यक्ष को नियुक्ति के अधिकार का प्रस्ताव पास करवाया जाए| मोटे तौर पर फैसला यह करना था कि पार्टी संविधान के मुताबिक़ एआईसीसी के 1200 सदस्यों को सीडब्ल्यूसी के सदस्य चुनने का अधिकार दिया जाए या नहीं|

मल्लिकार्जुन खड़गे चुनाव करवाना चाहते थे, लेकिन पहले से लिखी स्क्रिप्ट के मुताबिक़ 1200 सदस्यों को सीडब्ल्यू के सदस्य चुनने से वंचित कर दिया गया| अब मल्लिकार्जुन खड़गे ही कार्यसमिति के सभी सदस्यों को मनोनीत करेंगे, यानि गांधी परिवार लिस्ट बनाकर उन्हें थमा देगा| अगर स्टीयरिंग कमेटी में सीडब्ल्यू का चुनाव करवाने का फैसला होता, तो यह संदेश जाता कि सीडब्ल्यूसी के चुनाव तभी होते हैं, जब कांग्रेस का गांधी परिवार का कब्जा नहीं होता, तो यह संदेश भी गलत जाता|

बाकी के दो दिन की बैठकों में राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक विषयों पर वैसे ही छह प्रस्ताव पास करवाए जाएंगे, जैसे राजनीतिक दलों के अधिवेशनों में होते हैं, लेकिन अधिवेशन इसलिए ज्यादा अहम है कि त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड विधानसभाओं के चुनावों के बाद इस साल होने वाले बाकी बची सात विधानसभाओं के चुनावों और अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले कांग्रेस का यह आख़िरी अधिवेशन है| तो मोटे तौर पर यह तय किया जाना है कि विपक्षी गठबंधन की तस्वीर क्या होगी।

वैसे अधिवेशन शुरू होने से पहले हुई प्रेस कांफ्रेंस और नेताओं के बयानों से तस्वीर उभर आई है कि कांग्रेस नेतृत्व के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं करेगी| विपक्षी नेताओं को यह स्वीकार करना होगा कि अगर 2024 के चुनाव में एनडीए को बहुमत नहीं मिलता, तो वे राहुल गांधी के नेतृत्व में सरकार बनवाएंगे| मुझे जुलाई 2003 का शिमला में हुआ कांग्रेस का चिन्तन शिविर याद आता है, जिसमें सोनिया गांधी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार उखाड़ फैंकने का आह्वान करते हुए 1998 के चिन्तन शिविर का फैसला बदल दिया गया था|

1998 के पचमढ़ी में चिन्तन शिविर में फैसला लिया गया था कि कांग्रेस अकेले चलेगी, किसी के साथ गठबंधन नहीं करेगी| इसे बदल कर शिमला में फैसला हुआ कि एनडीए को सत्ता से बाहर करने के लिए कांग्रेस क्षेत्रीय पार्टियों से गठबंधन करके चुनाव लड़ेगी| इस तरह चुनाव से पहले सीट शेयरिंग और चुनाव के बाद गैर भाजपा दलों ने मिल कर यूपीए बनाया जिसने पांच साल के शासन के बाद 2009 में भी जीत हासिल की थी| लेकिन 2014 के चुनाव में कांग्रेस की इतनी दुर्गति हुई कि लगातार दो बार से लोकसभा को विपक्ष का नेता ही नहीं मिला| इसके बावजूद घमंड ऐसा है कि गठबंधन की पहली शर्त यह है कि प्रधानमंत्री राहुल गांधी ही बनेंगे|

कांग्रेस यह अच्छी तरह जानती है कि बिना गठबंधन के वह अपनी सीटों में इजाफा नहीं कर सकती, इसलिए वह यूपी में सपा से, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस से, आंध्र में टीडीपी से और केरल में सीपीएम से सीट शेयरिंग करना चाहती है| इनमें से कोई भी दल फिलहाल कांग्रेस के साथ चुनाव पूर्व सीट शेयरिंग के लिए तैयार नहीं है| जहां तक बिहार में राजद और जदयू से, महाराष्ट्र में एनसीपी और शिवसेना से, तमिलनाडू में द्रमुक से, कर्नाटक में जेडीएस का सवाल है, ये सभी दल इस समय कांग्रेस के साथ ही हैं|

चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी हवा का रुख देखकर फैसला करेगी, लेकिन यूपी में अखिलेश यादव और बंगाल में ममता बनर्जी सबसे बड़ी रुकावट बनी हुई हैं| यही दोनों बड़ी पार्टियां है, अगर ये दोनों पार्टियां चुनाव पूर्व के किसी गठबंधन या सीट शेयरिंग में शामिल होती हैं तो विपक्षी एकता की संभावना बनती हैं| ये दोनों पार्टियां विपक्षी एकता में सबसे बड़ी बाधा हैं, तृणमूल तो कांग्रेस को कमजोर करने में लगी हुई है।

अभी त्रिपुरा और मेघालय में तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस को कमजोर करने के लिए ही चुनाव लड़ा| यह बात कांग्रेस को खटक रही है, इसलिए राहुल गांधी ने मेघालय में जाकर ममता बनर्जी पर हमला भी बोला| अब अगर कांग्रेस तृणमूल कांग्रेस से कोई अंडरस्टेंडिंग करना चाहती है, तो उसे इस तरह की भाषा से परहेज करना चाहिए, जैसी राहुल गांधी ने इस्तेमाल की| ममता बनर्जी को मेघालय और त्रिपुरा में अपनी पार्टी का विस्तार करने का संवैधानिक हक है, लेकिन राहुल गांधी ने कहा कि ममता बनर्जी कांग्रेस को हराने और भाजपा को जिताने के लिए पूर्वोतर के राज्यों में चुनाव लड़ रही है| कांग्रेस नहीं चाहती कि कोई भी क्षेत्रीय पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर उसका विकल्प बनने की कोशिश करे। पचमढी में इसी घमंड के चलते एकला चलो की रणनीति अपनाई गई थी|

24 फरवरी को कांग्रेस अधिवेशन शुरू होने से पहले विभिन्न राज्यों के कांग्रेसी नेताओं का बयान आया कि विपक्ष की सरकार में राहुल गांधी ही प्रधानमंत्री होंगे, यह बिना सोची समझी रणनीति के नहीं हो सकता| बिहार प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता असित नाथ तिवारी ने कहा कि राहुल गांधी ही विपक्ष के पीएम पद के उम्मीदवार होंगे, उन्हीं के नेतृत्व में महागठबंधन एकजुट होगा| बिहार से ताल्लुक रखने वाले पूर्व केन्द्रीय मंत्री शकील अहमद का भी ऐसा ही बयान आया| उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दो ही राष्ट्रीय दल हैं, कांग्रेस की तीन राज्यों में अपने बूते सरकार है, तीन-चार राज्यों में वह गठबंधन सरकार का हिस्सा है, कम से कम 10 राज्यों में कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल है, इसलिए भाजपा की वैकल्पिक सरकार के प्रधानमंत्री राहुल गांधी ही होंगे|

हालांकि बिहार का मामला थोड़ा अलग है, गठबंधन की सरकार होने के बावजूद जदयू और राजग ने अभी राहुल गांधी के नाम पर सहमति नहीं दी है| इतना ही नहीं 25 फरवरी को होने वाली महागठबंधन की एक रैली के पोस्टरों बैनरों पर राहुल गांधी का फोटो भी नहीं लगाया गया| राजद और जदयू विपक्षी एकता की खिचड़ी अलग पका रहे हैं। वे केजरीवाल, अखिलेश यादव, चन्द्रशेखर राव और ममता बनर्जी को आगे करके नीतीश कुमार का नाम आगे बढा रहे हैं| यानी, जो दो दल अभी कांग्रेस के साथ हैं, वे भी राहुल गांधी के नाम पर सहमत नहीं हैं|

लेकिन कांग्रेस की तरफ से सभी नेताओं ने साफ़ कहना शुरू कर दिया है कि विपक्ष की तरफ से राहुल गांधी ही प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे| ऐसा नहीं है कि सिर्फ बिहार के नेताओं ने स्थानीय राजनीति के चलते यह बयान दिया है| कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी 21 फरवरी को नगालैंड में अपने भाषण में कहा कि अगले साल केंद्र में कांग्रेस की अगुवाई में गठबंधन सरकार बनेगी| हालांकि इसके अगले ही दिन दिल्ली में उन्होंने कहा कि साथी दलों के साथ मिलकर ''सामूहिक रूप से'' सरकार का गठन किया जाएगा|

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    लेकिन यह गठबंधन होगा कैसे? एक ही सूरत बनती है कि अंदरखाते सीट शेयरिंग हो जाए, सरकार बनाने की स्थिति पैदा होगी, तब नेतृत्व के बारे में सोचा जाएगा| इसलिए अधिवेशन में कांग्रेस राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी एकता या उन्हें विपक्ष का प्रधानमंत्री उम्मीदवार प्रोजेक्ट करके चुनाव मैदान में उतारने का प्रस्ताव पास करने का जोखिम नहीं उठाएगी| अलबत्ता कूटनीतिक भाषा का इस्तेमाल करके विपक्षी एकता का प्रस्ताव पास होगा, जिसमें राहुल गांधी की पदयात्रा की तारीफ़ की जाएगी| कई विपक्षी दलों में राहुल गांधी के प्रति रिजर्वेशन के चलते कांग्रेस फूंक फूंक कर कदम आगे बढ़ाएगी|

    यह भी पढ़ें: 2024 में जीत का मंत्र तैयार कर रही कांग्रेस, 5 सूत्रीय फॉर्मूले से बदल सकती है तस्वीर

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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